‘अखाडा’ शब्द का अर्थ, उत्पत्ति व व्याप्ति । ‘अखाडा’ शब्द ‘अखण्ड’ शब्द का अपभ्रंश है । अखण्ड (अखाडा) अर्थात निरन्तर व एकजुट संगठन ।
जैन, बौद्ध तथा इस्लाम पंथों का भारत में उदय होने पर धर्म का अस्तित्व संकट में पड गया । इसलिए मठों ने ज्ञानोपासना के कार्य के साथ ही इन विदेशी आक्रमणों को प्रत्युत्तर देने हेतु शस्त्रधारी दल बनाए एवं उन्हें ‘अखाडे’ की संज्ञा दी ।
उत्तर भारत से गोदावरी नदी तक निवास करनेवाले सर्व पंथीय साधु कुल १३ संघों में रहते हैं । ये १३ संघ ही १३ ‘अखाडे’ माने जाते हैं । उनके विषय में संक्षिप्त जानकारी हमारे पाठकों के लिए यहां दी है !
१. अखाडे
अ. शैव (दशनामी) अखाडे : इसमें कुल सात अखाडे हैं – महानिर्वाणी, अटल, निरंजनी, आनन्द, जुना (भैरव), आह्वान एवं अग्नि ।
आ. वैष्णव अखाडे : तीन प्रमुख वैष्णव अखाडे हैं – दिगम्बर, निर्मोही, निर्वाणी । (इनमें १८ उपअखाडे एवं खालसा भी होते हैं ।)
इ. उदासीन अखाडे : इसमें दो अखाडे हैं । उदासीन पंचायती बडा अखाडा एवं उदासीन पंचायती नया अखाडा । इसके अतिरिक्त सिखों का निर्मल अखाडा भी उदासीन है और सिखों का यह अखाडा गुरु गोविंदसिंह की (सिखों के धर्मगुरु की) प्रेरणा से स्थापित हुआ ।
२. साधुओं के सर्व अखाडे उत्तर भारत के ही क्यों ?
कुम्भ मेले में एकत्र होनेवाले सर्व अखाडे उत्तर भारत के हैं । दक्षिण भारत में साधुओं का एक भी अखाडा नहीं है । हिन्दू धर्म पर हुए आक्रमणों का सबसे अधिक प्रभाव उत्तर भारत में हुआ । इसकी तुलना में दक्षिण भारत शांत रहा । परिणामस्वरूप दक्षिण में ज्ञानमार्गी विद्वत्ता, जबकि उत्तर में बलोपासनामार्गी भक्ति है ।
३. अखाडों की विशेषताएं
३ अ १. शास्त्र एवं शस्त्र में पारंगत साधु : अखाडों से सम्बन्धित अधिकांश सभी साधु-संन्यासी शास्त्र एवं शस्त्र पारंगत होते हैं ।
३ अ २. अखाडों का विशेषतापूर्ण अन्तरंग !
अ. कुम्भ मेले में एक अखाडे से सम्बन्धित सभी साधु एक ही स्थान पर रहते हैं । वहां वे आपस में चर्चा कर आगामी योजना निर्धारित करते हैं ।
आ. कुम्भ मेले के समय अटल अखाडे एवं निर्वाणी अखाडे के साधु एकत्र रहते हैं, आनंद अखाडे तथा निरंजनी अखाडे के साधु भी एकत्र रहते हैं ।
इ. न्यूनतम १२ वर्ष साधना किए अथवा विशिष्ट सिद्धि प्राप्त संन्यासी-बैरागियों को पन्थीय सम्प्रदाय की रचना में उच्च पद दिए जाते हैं ।
ई. अखाडों में साधु की आध्यात्मिक योग्यता तथा मानसिक धैर्य, इन गुणों के आधार पर ही उसका स्थान निश्चित किया जाता है । स्थान निश्चित करते समय कोई भी जातिभेद अथवा ऊंच-नीच नहीं माना जाता ।
उ. अखाडों में अनुशासन का पालन किया जाता है । आज्ञा का पालन न करनेवाले को कठोर शारीरिक/आर्थिक दण्ड दिया जाता है ।
ऊ. प्रत्येक अखाडे में महामण्डलेश्वर, मण्डलेश्वर, महन्त जैसे कुछ प्रमुखों की श्रेणी होती है । अत्यन्त नम्र, विद्वान तथा परमहंस पद प्राप्त ब्रह्मनिष्ठ साधु का चयन इस पद के लिए किया जाता है ।
३ अ ३. कुम्भमेलों में राजयोगी (शाही) स्नान हेतु अखाडों का अग्रक्रम ! : पूर्वकाल में धर्मरक्षा का कार्य करते समय अखाडों के साधु-सन्तों द्वारा (आक्रमणकारियों की) हत्या होना अपरिहार्य था । गंगास्नान से पापक्षालन होता है । इसलिए अखाडों के शस्त्रधारी साधु-सन्तों को पर्वकाल के ‘राजयोगी (शाही) स्नान’ के समय अग्रक्रम दिया गया । आज भी यह परम्परा चल रही है । इन सशस्त्र साधु-सन्तों का स्नान, यही कुम्भ मेले की एक महत्त्वपूर्ण विधि मानी जाती है । साधुओं द्वारा स्नान किए बिना श्रद्धालु स्नान नहीं करते ।
३ इ. शैव पन्थीय अखाडे : आदि शंकराचार्य ने शैव परम्परा के संगठित संन्यासियों का दस गुटों में वर्गीकरण किया – १. गिरी, २. पुरी, ३. भारती, ४. तीर्थ, ५. बन, ६. अरण्य, ७. पर्वत, ८. आश्रम, ९. सागर तथा १०. सरस्वती । इन संगठित गुटों को ही ‘दशनामी अखाडे’ के रूप में जाना जाता है । इन अखाडों के ७ प्रकार हैं । प्रत्येक अखाडे के देवता व ध्वज भिन्न होते हैं । शैव पन्थीय संन्यासियों के अखाडों में धार्मिक तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा दी जाती है ।
३ ई. वैष्णव पन्थीय अखाडे : जगद्गुरु श्री रामानन्दाचार्यजी के कुछ शिष्य तथा श्री भावानन्दाचार्यजी के शिष्य श्री बालानंदजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्र को अपना आराध्यदेवता माना है । उन्होंने चारों वैष्णव सम्प्रदायों को संगठित कर तीन बैरागी (वैष्णव) अखाडों की स्थापना की । वैष्णवों के अखाडों में भी शस्त्र एवं शास्त्र का कठोर अभ्यास किया जाता है । अन्य वैष्णव अखाडों के नाम हैं निरालम्बी, सन्तोषी, महानिर्वाणी तथा खाकी । ये साधु ‘बैरागी’ अथवा ‘अलख’ कहलाते हैं । अन्य धर्मीय आक्रमणकारियों से हिन्दू धर्मीय तथा उनके देवालयों की रक्षा करना, यही इन अखाडों का प्रमुख कर्तव्य है ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘कुम्भपर्व की महिमा’)
अखाडों द्वारा किया धर्मरक्षा का कार्यहिन्दुओं पर अनन्त अत्याचार करनेवाले इन इस्लामी आक्रमणकारियों का प्रतिकार करने में तत्कालीन हिन्दू राजसत्ता कुछ असमर्थ सिद्ध हुई । इसलिए साधु-संन्यासियों ने धर्मरक्षा हेतु दण्ड उठाया । नागा सम्प्रदाय एवं दशनामी संन्यासी एकत्र हुए । उन्होंने शक्ति का प्रतीक ‘भाला’ शस्त्र के रूप में धारण किया । मल्लविद्या तथा तलवार आदि शस्त्रों का प्रशिक्षण दिया जाने लगा । नागा-दशनामी संन्यासियों में ‘प्राचीन आध्यात्मिक परम्परा का संरक्षण करनेवाला शास्त्रधारी’ तथा ‘धर्मरक्षा हेतु लडनेवाला शस्त्रधारी’, ऐसे दो भाग किए गए । इन संन्यासियों ने धर्मरक्षा हेतु निम्नलिखित प्रकार से ऐतिहासिक कार्य किया । १. वर्ष १६६६ में हरिद्वार के कुम्भ मेले में साधुओं और श्रद्धालुओं पर औरंगजेब ने आक्रमण किया । उस समय संन्यासियों ने इस आक्रमण का उत्तर दिया । संन्यासियों के भगवे धर्मध्वज देखकर मुगल सेना के मराठे सैनिक साधुओं के पक्ष में लडे, जिसके कारण मुगल सेना पराजित हुई । २. वर्ष १७४८ में अहमदशाह अब्दाली का आक्रमण तथा १७५७ में मथुरा पर हुआ आक्रमण असंख्य साधुओं ने वीरगति स्वीकार कर समाप्त किया । ३. राजेंद्रगिरी नामक नागा साधु के नेतृत्व में १७५१ से १७५३ के मध्य झांसी के निकट के ३२ गांवों की मुगल सत्ता उखाड फेंकी और वहां स्वतन्त्रता का ध्वज फहराया । ४. वर्ष १७५१ में फर्रुखाबाद के बंगश अफगान सरदार अहमद खान ने प्रयाग में हिंसाचार और लूटपाट कर चार सहस्र उच्चकुलीन स्त्रियों का अपहरण किया । उस समय त्रिवेणी संगम पर कुम्भ पर्व के निमित्त आए छः सहस्र नागा संन्यासी संगठित हुए । उन्होंने बंगश अफगान सरदार की सेना पर आक्रमण किया तथा अपहृत स्त्रियों को मुक्त कराया । इस संघर्ष में अनेक अफगान सरदार मारे गए । ५. वर्ष १८५५ में हरिद्वार के कुम्भ मेले में औमाननन्दजी (आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी के गुरु) तथा उनके गुरु पूर्णानन्दजी ने अंग्रेजों के विरुद्ध हुए १८५७ के स्वतन्त्रता संग्राम की रूपरेखा बनाई तथा देशभर से आए संन्यासियों के माध्यम से पूरे भारत में उसे फैलाया । वर्ष १८५८ के प्रयाग कुम्भ मेले में दशनामी संन्यासियों के शिविर में दस्तबाबा की साक्षी में नानासाहेब धुंधूपंत, बाळासाहेब पेशवे, तात्या टोपे, अजमुल्ला खान तथा जगदीशपुर के राजा कुंवरसिंह ने ब्रिटिश शासन को भारत से भगाने की प्रतिज्ञा की । इस प्रतिज्ञा के समय सैकडों साधु-सन्त उपस्थित थे । संन्यासियों ने ही नहीं; अपितु बैरागियों ने भी इसी प्रकार अन्य धर्मीय आक्रमणकारियों के विरुद्ध अनेक बार सशस्त्र युद्ध कर धर्मरक्षा का महत्कार्य किया । ज्ञानसम्पन्न होकर भी सशस्त्र हुए शैव एवं वैष्णव अखाडों के साधुओं के कारण ही शस्त्रहीन शान्तिप्रिय हिन्दू समाज को सांत्वना मिली तथा इस्लाम का आक्रमण सिन्ध की सीमा पर एक सीमा तक रुक गया, यह ऐतिहासिक सत्य है । |



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