
१. कुम्भ पर्व अत्यंत पुण्यदायी होने के कारण उस समय प्रयाग, हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिक में स्नान करने से अनंत पुण्यलाभ होता है । इसीलिए करोडों श्रद्धालु एवं साधु-संत इस स्थान पर एकत्रित होते हैं ।
२. कुम्भ पर्व की अवधि में अनेक देवी-देवता, मातृका, यक्ष, गंधर्व तथा किन्नर भी भूमंडल की कक्षा में कार्यरत रहते हैं । साधना करने पर इन सबके आशीर्वाद मिलते हैं तथा अल्पावधि में कार्यसिद्धि होती है ।
३.‘गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी एवं क्षिप्रा’, इन नदियों के क्षेत्र में कुम्भ पर्व होता है । उस समय अनेक देवता, पुण्यात्मा, ऋषि-मुनि, कनिष्ठ गण जागृत रहते हैं । इससे उनके आशीर्वाद मिलते हैं ।
४. इस काल में किए पुण्यकर्म की सिद्धि अन्य काल से अनंत गुना अधिक होती है । इस काल में कृत्य कर्म के लिए पूरक होता है तथा कृत्य को कर्म की सहमति मिलती है ।
५. कुम्भ पर्व के काल में सर्वत्र आप तत्त्वदर्शक पुण्य तरंगों का भ्रमण होता है । इससे मनुष्य के मन की शुद्धि होती है तथा उसमें उत्पन्न विचारों द्वारा कृत्य भी फलदायी होता है, अर्थात ‘कृत्य एवं कर्म’ दोनों की शुद्धि होती है ।’
६. पितृतर्पण : गंगाजी का कार्य ही है ‘पितरों को मुक्ति देना’ । इस कारण कुम्भ पर्व में गंगास्नान सहित पितृतर्पण करने की धर्माज्ञा है । ‘वायुपुराण’ में कुम्भ पर्व श्राद्धकर्म के लिए उपयुक्त बताया गया है ।
७. संतसत्संग : कुम्भ मेले में भारत के विविध पीठों के शंकराचार्य, १३ अखाडों के तपोनिष्ठ साधु, महामंडलेश्वर, शैव तथा वैष्णव संप्रदाय के अनेक विद्वान, संन्यासी, संत-महात्मा एकत्रित आते हैं । इस कारण कुम्भ मेले का स्वरूप अखिल भारतवर्ष के संतों के सम्मेलन के समान भव्य-दिव्य होता है । कुम्भ मेले के श्रद्धालुओं को संतसत्संग का सबसे बडा अवसर उपलब्ध होता है ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘कुम्भ पर्व की महिमा’)
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