सहस्रों भक्तगण और साधु-संतों को बिना बुलाए एकत्रित करनेवाला हिन्दुओं का कुंभ मेला विश्व का सबसे बडा धार्मिक पर्व है । सतयुग के इतिहास की महान आध्यात्मिक और पौराणिक पृष्ठभूमि वाला यह कुंभ मेला सहस्रों वर्षों से चला आ रहा है । आज हम हरिद्वार के अतिरिक्त अन्य कौन से तीर्थक्षेत्रों पर कुंभ मेले होते हैं, यह समझ लेंगे । साथ ही कुंभ मेले में धार्मिक दृष्टि से स्नान का क्या महत्त्व है, यह भी समझ लेंगे ।

१. मोक्षदायी प्रयाग क्षेत्र की महानता
उत्तर प्रदेश के प्रयाग में यह गंगा, यमुना एवं सरस्वती (यह नदी अदृश्य है ।) के पवित्र ‘त्रिवेणी संगम’ पर बसा तीर्थस्थान है । इस पवित्र संगम के कारण ही इसे ‘प्रयागराज’ अथवा ‘तीर्थराज’ कहा जाता है । सर्व प्रकार के यज्ञों के लिए प्रयाग सर्वोत्तम स्थान है । खोए हुए चारों वेद पुनः मिलने पर प्रजापति ने यहां एक महायज्ञ किया था; अतः प्रयाग को ‘प्रजापतिक्षेत्र’ भी कहा जाता है । ब्रह्मदेव की, कुरुक्षेत्र, गया, विराज, पुष्कर एवं प्रयाग, इन पांच यज्ञवेदियों में से प्रयाग मध्यवेदी है । काशी, प्रयाग एवं गया, इस त्रिस्थली यात्रा में एक प्रयाग का स्थान धार्मिक दृष्टि से अद्वितीय है । इस क्षेत्र का माहात्म्य बताते हुए कहा गया है कि महाप्रलय के समय संपूर्ण विश्व डूब जाए, तब भी प्रयाग नहीं डूबेगा । ऐसा कहा गया है कि प्रलय के अंत में श्रीविष्णु यहां के अक्षयवट पर शिशुरूप में शयन करेंगे । इसी प्रकार सर्व देव, ऋषि एवं सिद्ध यहां वास कर इस क्षेत्र की रक्षा करेंगे । पुराणों में इसे सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कहा गया है । महाभारत में भी तृतीय पर्व में वर्णन है कि ‘इस क्षेत्र की मिट्टी का शरीर पर लेप करने से मनुष्य पापमुक्त होता है ।’ प्रयागराज की तीर्थयात्रा करते समय त्रिवेणी संगम का पूजन, केशमुंडन, गंगास्नान, पितृश्राद्ध, सुहागिन स्त्रियों द्वारा वेणीदान एवं देवताओं के दर्शन करना आदि आवश्यक विधियां करनी होती हैं । जहां सात्त्विक नदियों का संगम होता है, उस स्थान पर अधिक सात्त्विकता होती है । गंगा एवं यमुना, दोनों ही नदियां सात्त्विक होने के कारण, उनके संगमस्थल पर विद्यमान स्पंदन (शक्ति, चैतन्य इत्यादि) लाभदायी होते हैं । उनसे अधिक मात्रा में सात्त्विकता प्रक्षेपित होती है ।

प्रयाग के यमुनातट पर स्थित अक्षयवट का महत्त्व
अक्षयवट यह प्राचीन एवं पवित्र वटवृक्ष प्रयाग के यमुनातट पर है । समस्त देवताओं का निवासस्थान अक्षयवट की जडें पाताल तक हैं । वायु, मत्स्य, कूर्म, पद्म, अग्नि एवं स्कंद पुराणों में कहा गया है, ‘अक्षयवट के निकट देहत्याग करने से मोक्ष प्राप्त होता है । सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में मुगल बादशाह अकबर ने प्रयाग में यमुनातट पर सुरक्षा हेतु किला बनाने का कारण बताकर अक्षयवट एवं उस परिसर के देवालयों को नष्ट किया । जहां अक्षयवट था, वहां उसने किले में ‘रानीमहल’ बनवाया । कुछ समय पश्चात वहां पुनः अक्षयवट उग आया । तब अकबरपुत्र जहांगीर ने अनेक बार उसे जलाकर नष्ट करने का प्रयत्न किया । जहांगीर ने गरम तवा रखकर उस वृक्ष को जडसहित नष्ट करने का भी प्रयास किया; परंतु प्रत्येक बार इस अक्षयवट में नई कोंपलें निकलतीं एवं आगे वे वृक्ष का रूप धारण करतीं । वर्ष १६९३ में ‘खुलासत उत्वारीख’ ग्रंथ में प्रमाण है, ‘जहांगीर के अक्षयवट काटने पर भी वह पुनः उग आया ।’
आज भी यमुना नदी के किनारे इस किले में यह प्राचीन वृक्ष खडा है । हिन्दुओं को मोक्ष न मिले, इस उद्देश्य से मुगल बादशाहों ने उसके दर्शन करने पर प्रतिबंध लगाया । आगे अंग्रेजों ने भी यह प्रतिबंध जारी रखा । स्वतंत्रता के उपरांत इस किले में भारतीय सेनादल का शस्त्रागार बनने पर वहां की सुरक्षा व्यवस्था बढ गई । वर्ष में एक बार माघ मेले में तथा कुंभ मेले में इस अक्षयवट के दर्शन करने की अनुमति मिली । अन्य समय श्रद्धालुओं को किले में स्थित वृक्ष का तना दूर से ही दिखाया जाता था । वर्ष २०१३ के कुंभ मेले में हिन्दुओं को पूरे वर्ष अक्षयवट के दर्शन कराने हेतु प्रयास किया गया । इस कारण अब हिन्दू प्रतिदिन वहां के दुर्ग में जाकर पातालपुरी मंदिर, सरस्वती कूप (कुआं) और अक्षयवट के दर्शन कर सकते हैं ।
प्रयाग के गंगा, यमुना तथा सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर प्रत्येक १२ वर्ष में कुंभ मेले का आयोजन होता है, जिसे ‘महाकुंभ मेला’ कहते हैं । प्रत्येक ६ वर्ष पश्चात लगनेवाले कुंभ मेले को ‘अर्धकुंभ मेला’ कहते हैं । इस पवित्र त्रिवेणी संगम पर प्रतिवर्ष माघ मास में मेला लगता है । इसे ‘माघ मेला’ कहा जाता है । माघ मास की अमावस्या के दिन संन्यासियों का विशाल समुदाय स्नान करने के लिए जुटता है । पद्मपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मपुराण, मत्स्यपुराण एवं महाभारत में यहां स्नान करने के कई लाभ बताए हैं । यहां रहकर श्रद्धालु कल्पवास का व्रत करते हैं ।
२. उज्जैन तीर्थक्षेत्र की महानता

उज्जैन तीर्थक्षेत्र मध्य प्रदेश में क्षिप्रा नदी के तट पर बसा है । अवन्तिका जैसे अनेक नामों से यह पवित्र नगरी प्रसिद्ध है । पृथ्वी की कर्करेखा यहां से निकलती है । पुराणकाल में भगवान शंकर ने यहां त्रिपुरासुर को पराजित किया था । इसलिए इस स्थान का नाम ‘उज्जयिनी’ पडा । अयोध्या, मथुरा, माया आदि सात मोक्षदायी पुरियों में अवंतिका अर्थात उज्जैन नगरी का समावेश है । यहां द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल नामक ज्योतिर्लिंग है ।
भक्तों की ऐसी श्रद्धा है कि महाकाल के दर्शन से अकालमृत्यु टल जाती है तथा मुक्ति मिलती है । यहां ५१ शक्तिपीठों में से एक ‘हरसिद्धिदेवी’ का प्राचीन मंदिर है । यहां श्री मंगलनाथ मंदिर का विशेष महत्त्व है । पुराणों में उल्लेख है, ‘उज्जैन’ मंगल ग्रह काजन्मस्थान है । सिंह राशि में गुरु एवं मेष राशि मेंसूर्य होने पर उज्जैन में सिंहस्थ कुम्भ पर्व होता है ।वैशाख पूर्णिमा को पर्वकाल होता है तथा उस दिनमुख्य राजयोगी (शाही) स्नान किया जाता है । साथही चैत्र पूर्णिमा, चैत्र अमावस्या, अक्षय तृतीया,एकादशी इत्यादि के दिन भी पर्वस्नान किया जाताहै । उज्जैन की क्षिप्रा नदी में वैशाख मास का स्नानविशेष पुण्यदायी है । प्रयाग क्षेत्र में माघ मास में,पुष्कर क्षेत्र में कार्तिक मास में तथा उज्जयिनी मेंवैशाख मास में स्नान करने से पाप दूर हो जाते हैं ।
३. त्र्यंबकेश्वर तथा नासिक क्षेत्र की महनता

ये पुण्यक्षेत्र महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के तटपर स्थित हैं । जिसके तीन नेत्र हैं, ऐसे शंकरजीजिस स्थान के ईश्वर हैं, वह स्थान त्र्यंबकेश्वरहै । यह १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है । लक्ष्मण नेयहां शूर्पणखा के नाक-कान काटे थे । इसलिए यहक्षेत्र ‘नासिक’ नाम से प्रसिद्ध हुआ । भिन्न-भिन्न युगोंमें इसके भिन्न-भिन्न नामों के उल्लेख मिलते हैं ।
अ. गौतम ऋषि ने पापमुक्ति के लिए घोर तप कियाएवं अपने तपोबल से गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लानेके लिए भगवान शंकर से याचना की । तब, मां गंगा‘त्र्यंबकेश्वर’ में ‘गौतमी’ अर्थात ‘गोदावरी’ के रूपमें अवतरित हुईं । उस समय गुरुग्रह सिंह राशि मेंथे । जिस समय पृथ्वी पर केवल ७ देवता, ७ ऋषि
एवं ७ मानव थे, उस समय केवल गौतमी थी ।इसलिए, आद्य एवं श्रेष्ठ नदी होने का सम्मानगोदावरी को प्राप्त हुआ । कहा जाता है कि कुरुक्षेत्रमें दान करने पर, नर्मदा के तट पर तप करने परतथा गंगा के तट पर मृत्यु होने पर विशेष पुण्य प्राप्तहोता है । किंतु उपयुर् क्त तीनों कृत्य गोदावरी नदी केतट पर करने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है
आ. गोदावरी का दक्षिणी प्रवाह दुर्लभ एवं मोक्षदायीहै । अतः इस क्षेत्र में किए दान-पुण्य का फलमिलता है, ऐसा इस क्षेत्र की महिमा में कहा गयाहै । यहां ब्रह्मगिरि नामक शिवरूप पर्वत है ।पापमुक्त करेनवाला कुशावर्त नामक तीर्थ यहां है ।कुशावर्त तीर्थ में स्नान करने पर मनुष्य सर्व पापों सेमुक्त हो जाता है तथा उसके पितर भी तृप्त होते हैं ।
इ. रामतीर्थ : ‘पंचवटी क्षेत्र में वनवास के समयशिवजी के दर्शन होने पर श्रीराम ने उनसे प्रार्थनाकी, ‘‘हे शंभो, जिनके पितर नरक में हैं, वे यदियहां पिंडदान करें, तो उनके नरकवासी पितर स्वर्गमें जाएं । उसी प्रकार जन्मभर किए मानसिक,वाचिक तथा शारीरिक पाप यहां स्नान करने से नष्टहो जाएं ।’’ यह प्रार्थना सुनकर शिवजी ने प्रसन्नहोकर श्रीराम को वैसा वर दिया । तबसे यह स्थल‘रामतीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।’
– सद्गुरु नीलेश सिंगबाळ, धर्मप्रचारक, हिन्दूजनजागृति समिति
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