Tuljapur Temple Land Scam : मंदिर की भूमि वापस दिलाने एवं करोडों श्रद्धालुओं की आस्था की रक्षा के लिए हम अंत तक संघर्ष करेंगे ! – अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णी

भूमि घोटाले के साक्ष्य केवल शासन के पास हैं, तो मंदिर प्रशासन किसका साथ दे रहा है ? - मंदिर महासंघ का प्रश्न

बाईं ओर से: श्री हिरालाल तिवारी, अधिवक्ता सतीश गाजुल, अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णी, श्री अरविंद पानसरे एवं श्री विनोद रसाळ

धाराशिव — महाराष्ट्र सरकार के आधिकारिक अन्वेषण के अनुसार, निजाम शासन ने श्री तुळजाभवानी मंदिर संस्थान को १,६६८ हेक्टेयर (अर्थात् ४१२२.०७ एकड) भूमि दी थी, जबकि इसका विवरण तुळजापूर मंदिर संस्थान के पास न होना प्रशासन के अक्षम कार्यप्रणाली का सटीक उदाहरण है । मंदिर प्रशासन केवल ४०० एकड भूमि होने का कथन करके अपनी ही अक्षमता को ढक रहा है । मंदिर प्रशासन ४०० एकड का आंकडा प्रस्तुत कर वास्तव में किसका साथ दे रहा है ?, ऐसा प्रश्न उठता है । मंदिर की भूमि वापस दिलाने एवं करोडों भक्तों की श्रद्धा की रक्षा के लिए हम अंतिम श्वास तक संघर्ष करेंगे, इस दृढ संकल्प को महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के कानूनी सलाहकार तथा तुळजापूर मंदिर घोटाले के प्रकरण में परिवाद लड रहे अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णी ने धाराशिव में आयोजित पत्रकार वार्ता में व्यक्त किया ।

धाराशिव में हुई पत्रकार वार्ता में मंदिर महासंघ के सोलापूर-धाराशिव जिला संयोजक श्री विनोद रसाळ, हिन्दू जनजागृति समिति के श्री अरविंद पानसरे, ‘राष्ट्रभक्त अधिवक्ता समिति’ के जिला संयोजक अधिवक्ता सतीश गाजुल एवं सनातन संस्था के श्री हिरालाल तिवारी उपस्थित थे ।

अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णी आगे कहते हैं कि,

१. हमने हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से जब मुंबई उच्च न्यायालय के औरंगाबाद खंडपीठ में जनहित याचिका (क्र.२१/२०१८ ) प्रविष्ट की थी, तब हमने राजस्व एवं वन विभाग, गृह विभाग, विधि एवं न्याय विभाग, जिलाधिकारी तथा ‘श्री तुळजापूर देवस्थान न्यास’- कुल ५ पक्षों को पक्षकार बनाया था । उसी समय धाराशिव के जिलाधिकारी ने तुळजापूर भूमि घोटाले का एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था । उसमें विधि एवं न्याय विभाग के प्रधान सचिव एम.एन. गिलानी (जो भविष्य में मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने) का १,६६८.१४ हेक्टेयर भूमि घोटाले का पत्र भी संलग्न था । तब पक्षकार रहे तुळजापूर मंदिर प्रशासन ने आपत्ति कर के न्यायालय में शपथ पत्र (अफिडेविट) क्यों नहीं दिया ?

२. मंदिर की भूमि में घोटाले हुए हैं, यह केवल मंदिर महासंघ का कथन नहीं है, अपितु राज्य शासन ने इसे आधिकारिक प्रपत्र में स्वीकार किया है । नीचे विधि व न्याय विभाग के प्रधान सचिव एवं मंत्री के हस्ताक्षर हैं । प्रतिवादी के रूप में उपस्थित मंदिर प्रशासन को यह कैसे ज्ञात नहीं था ? कुल मिलाकर मंदिर प्रशासन किस तरह एवं कितनी गंभीरता से मंदिर का प्रबंधन कर रहा है, यह इसी से स्पष्ट होता है । जनता को मंदिर प्रशासन से उत्तर मांगना चाहिए ।

श्री तुळजापूर मंदिर के ४१२२.०७ एकड भूमि घोटाले का विवरण

१. तुळजाभवानी न्यास के नाम पर १,३४७.८७ हेक्टेयर (लगभग ३३९७ एकड) भूमि का स्वामित्व अधिकार होते हुए भी उसका वास्तविक नियंत्रण ४ मठों के निजी व्यक्तियों के पास है एवं इसका कोई कानूनी स्पष्टीकरण प्रशासन के पास नहीं है । वास्तव में उन ४ मठों को विभिन्न प्रकार की मंदिर सेवा के लिए उस समय ‘सनद’ के रूप में भूमि दी गई थी; पर आज उन मठों की भूमियों पर भी बड़े प्रमाण पर अतिक्रमण हुआ है ।

२. ‘जगदंबा न्यास’ के नाम पर प्रविष्ट १६३.८७ हेक्टेयर (लगभग ४०३ एकड) भूमि को तत्कालीन उपजिल्हाधिकारी ने मंदिर न्यास को अंधकार में रखकर अवैध रूप से निजी व्यक्तियों के नाम कर दिया ।

३. देवस्थान की भूमि पर ‘कुळ कानून’ लागू नहीं होता, तदापि २५.५१ हेक्टेयर में से ३.०४ एकड भूमि को ‘संरक्षित कुल’ घोषित कर क्रय प्रपत्रो (दिनांक २१.०७.१९८१ ) के माध्यम से विक्री किया गया ।

४. एक उच्चस्तरीय लिपिक ने अपने अधिकार से बाहर जाकर कुल १०५.६४ हेक्टेयर (लगभग २६१ एकड) भूमि ७३ व्यक्तियों के नाम अवैध रूप से प्रविष्ट करवा दी ।

५. अपसिंगा (ता. तुळजापूर) की खसरा संख्या ३५७/३ एवं ३५७/४ की भूमि १५ अक्टूबर १९७५ एवं १९७९ की अवैध परिवर्तित प्रपत्र दिखाकर हस्तांतरित की गई । उफळा (जि. धाराशिव) की खसरा संख्या १०७ में कुल ६४ हेक्टेयर (१५८ एकड) भूमि अवैध रूप से बांटी गई ।

ये सभी जानकारी राज्य शासन एवं जिल्हा प्रशासन के आधिकारिक प्रपत्रमें उपलब्ध होने के उपरांत भी जनता को यह सच सार्वजनिक करने की आवश्यकता क्यों पडी, इससे बडा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है ?

क्या एक उच्चस्तरीय लिपिक अपने पद का दुरुपयोग कर मंदिर की २६१ एकड भूमि अन्य व्यक्तियों को दे सकता है ?

भूमि घोटाला करने वाले संबंधित उच्चस्तरीय लिपिक एवं अन्य कनिष्ठ कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई कर उन्हें नौकरी से हटा दिया गया था; पर कुछ समय उपरांत उन्हें पुनः सरकारी सेवा में ले लिया गया । यदि प्रशासन ऐसे ढंग से काम करता है, तो लूट ली हुई सहस्त्रों एकड भूमि मंदिर को कैसे वापस मिलेगी ? क्या एक उच्चस्तरीय लिपिक अपने अधिकार में मंदिर की २६१ एकड भूमि किसी अन्य व्यक्ति को दे सकता है ? यह एक बडा प्रश्न है । इसमें राजनीतिक एवं बडे प्रशासनिक हस्तक्षेप के बिना यह संभव नहीं दिखता ।

कुल मिलाकर ‘तुम मारो मैं रोऊं’ जैसा खेल चलाकर करोडों भक्तों के साथ विश्वासघात निरंतर किया जा रहा है । मंदिर की सैकडो एकड़ भूमि के सरकारी अधिकारी, कर्मचारी एवं भूहडप गुंडों ने मिलकर घोटाला कर अवैध रूप से अन्य व्यक्तियों के नाम कर देने से श्री तुळजाभवानी मंदिर को भारी आर्थिक क्षति हुई है । क्या वह मंदिर प्रशासन, जो केवल कानूनी कार्रवाई के बडे नारे लगाता है, उन भूमि चोरों से मंदिर की सभी भूमि वापस दिलाने के लिए वास्तविक कानूनी लडाई लड पाएगा ? – यही एक प्रश्न है ।

भू-हडप गुंडों से भूमि मुक्त होकर मंदिर की वापसी सुनिश्चित न होने तक हमारी यह कानूनी लडाई निरंतर की जाएगी ! – अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णी

अधिवक्ता (पू.) सुरेश कुलकर्णी

तुळजापूर प्रकरण में भी मंदिर की भूमि लूटने वालों व दान पेटी पर डाका डालने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने के लिए हम सर्वोच्च न्यायालय तक गए हैं । ४,१२२,.०७ एकड भूमि मंदिर की होने के उपरांत केवल ४०० एकड होने का संदर्भ देकर क्या मंदिर प्रशासन उन भूमि चोरों का ही समर्थन कर रहा है ?, ऐसा संदेह उत्पन्न होता है । जब तक ये सभी भूमि अतिक्रमण मुक्त होकर मंदिर के नाम पर वापस नहीं आ जातीं, तब तक हमारी यह कानूनी लडाई निरंतर चलती रहेगी ।

क्या मंदिर प्रशासन वास्तव में मंदिर का समुचित प्रबंधन कर पाएगा ?

सरकारी तंत्र एवं नियंत्रण होते हुए भी कई वर्षों तक मंदिर प्रशासन अपनी सहस्त्रों एकड भूमि वापस पाने में क्यों असफल रहा ? वह व्यवस्था जो मंदिर की संपत्ति सुरक्षित नहीं रख सकती एवं भ्रष्टाचारियों को दण्ड देने में अक्षम है, क्या वह वास्तव में मंदिर का प्रबंधन ठीक ढंग से कर पाएगी ?

पंढरपूर देवस्थान की १,२०० एकड भूमि वापस दिलाई गई !

ऐसा ही प्रकरण ‘पश्चिम महाराष्ट्र देवस्थान प्रबंधन समिति’ के संदर्भ में भी देखा गया था । वहां देवस्थान के स्वामित्व वाली २५,००० एकड भूमि में से लगभग ८,००० की आधिकारिक प्रविष्ट गायब पाई गई । पंढरपूर देवस्थान के पास लगभग १२,०० एकड भूमि होने के उपरांत उससे मंदिर को एक रुपया भी आय नहीं होती थी । अन्ततः हिन्दू जनजागृति समिति एवं हिन्दू विधिवेत्ता परिषद ने कानूनी लडाई लडकर वह १,२०० एकड भूमि मंदिर को वापस दिलवाई ।