Pandharpur Shri Vitthal-Rukmini : श्री विठ्ठल की मूर्ति को क्षति पहुंचने पर मंदिर समिति एवं पुरातत्व विभाग के विरुद्ध आपराधिक अभियोग प्रस्तुत (दाखल) करेंगे !

  • पंढरपूर स्थित श्री विठ्ठल की मूर्ति पर की जाने वाली रासायनिक लेपन की घटना

  • मंदिर महासंघ तथा वारकरी संगठन की चेतावनी !

बाएं से श्री. विनोद रसाळ, श्री. चंद्रकांत रमणशेट्टी, सम्भाषण करते हुए ह.भ.प. रामकृष्ण हनुमंत महाराज वीर, श्री. सुनील घनवट, श्री. प्रसाद पंडित तथा श्री. राजन बुणगे

पंढरपूर – पंढरपूर स्थित करोड़ों हिन्दुओं के आराध्यदेव ‘स्वयंभू’ श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मूर्ति पर पुरातत्व विभाग द्वारा २३ तथा २४ जून को नियोजित रासायनिक वज्रलेपन प्रक्रिया (इपॉक्सी / सिलिकॉन) का वारकरी संप्रदाय एवं महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने तीव्र विरोध किया है ।

प्रशासन ने दावा किया था कि ‘कोरोना महामारी की अवधि में किया गया लेपन आगामी १० वर्षों तक टिकेगा’ ; परंतु मात्र ४-५ वर्षों में ही मूर्ति को पुनः लेपन की आवश्यकता पडना, इस रासायनिक प्रक्रिया की असफलता को सिद्ध करता है । २८ युगों से ईंट पर सुरक्षित खडे पांडुरंग की मूर्ति के चरणों में कोरोना तालाबंदी (लॉकडाउन) की अवधि में गर्त (गड्ढा) कैसे हो गया ? तथा श्री रुक्मिणीमाता के चरण क्यों क्षरणग्रस्त हुए ?, इसका कोई भी शास्त्रीय उत्तर अभी तक मंदिर समिति अथवा पुरातत्व विभाग नहीं दे पाया है । कृत्रिम रसायनों के कारण पाषाण का प्राकृतिक श्वसन अवरुद्ध होकर मूर्ति के भीतर से खोखली (भुरभुरी) होने का गंभीर संकट है । इसलिए वारकरी संत-महंतों तथा मूर्तिशास्त्रियों को विश्वास में लिए बिना प्रशासन ने अपने मन का कदम उठाया, तो संपूर्ण महाराष्ट्र में लोगों में आक्रोश उत्पन्न होगा । इसके उपरांत भी यदि मूर्ति पर रासायनिक लेपन प्रक्रिया थोपने का प्रयास किया गया, तो हम ‘श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर समिति’ तथा पुरातत्व विभाग के विरुद्ध न्यायालय में याचिका प्रस्तुत करेंगे, ऐसी चेतावनी मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री. सुनील घनवट ने पत्रकार परिषद में दी । इस संदर्भ में निवेदन मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, जिलाधिकारी तथा मंदिर समिति को दिया गया है ।

पंढरपूर – श्री विठ्ठल एवं रुक्मिणीमाता

इस अवसर पर ‘वारकरी पाईक संघ’ के ह.भ.प. रामकृष्ण हनुमंत महाराज वीर, ‘प्रज्ञापुरी ज्ञानपीठ अक्कलकोट’ के पीठासीन धर्माधिकारी श्री. प्रसाद पंडित, ‘हिन्दू राष्ट्र समन्वय समिति’ के जिला संयोजक श्री. चंद्रकांत रमणशेट्टी, महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के श्री. विनोद रसाळ तथा हिन्दू जनजागृति समिति के श्री. राजन बुणगे उपस्थित थे ।

१० वर्ष पूर्व कोल्हापुर स्थित श्री महालक्ष्मीदेवी की मूर्ति पर जैविक लेपन प्रक्रिया का उपयोग कर वज्रलेप किया गया, तो पंढरपूर स्थित मूर्ति पर रासायनिक लेपन का अट्टाहास क्यों ?

१० वर्ष पूर्व कोल्हापुर स्थित श्री महालक्ष्मीदेवी की मूर्ति पर केंद्रीय पुरातत्व विभाग के अधिकारी एम.आर. सिंह ने २२ जुलाई से ६ अगस्त २०१५ की अवधि में वज्रलेप किया था । उस समय श्री महालक्ष्मीदेवी की मूर्ति जिस पाषाण से निर्मित थी, उसी पाषाण के चूर्ण का निश्चित मात्रा में सम्मिश्रण मूर्ति में उपयोग किया गया था । इस प्रक्रिया में मूर्ति पर बहेड़ा, दूर्वा का अर्क तथा भिलावे (बिब्बा) का तैल उपयोग कर जैविक मिश्रण का प्रयोग किया गया था । उस काल में यदि श्री महालक्ष्मीदेवी की मूर्ति पर जैविक लेपन प्रक्रिया का उपयोग कर वज्रलेप किया गया था, तो अब पंढरपूर स्थित श्री विठ्ठल की मूर्ति पर रासायनिक लेपन कर अनादर क्यों ? उस समय की गई कृति यदि उचित थी, तो वर्तमान कृति को अनुचित ही कहना होगा । अत्यंत कम धन में होने वाले जैविक लेपन के स्थान पर व्ययसाध्य रासायनिक तथा अशास्त्रीय लेपन का आग्रह कर पुरातत्व विभाग के अधिकारी विलास वहाणे क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? इस रासायनिक प्रक्रिया द्वारा व्यय होने वाली अधिक निधि के लिए तो यह षड्यंत्र नहीं रचा जा रहा है ना ?, ऐसी शंका करने के लिए निश्चित ही यहां स्थान है ।

मूर्ति पर रासायनिक लेपन करना त्रुटिपूर्ण ! – श्री स्वामी जगद्गुरु शंकराचार्य पीठ, करवीर

इस संदर्भ में करवीर पीठ के श्री स्वामी जगद्गुरु शंकराचार्य का मत पूछने पर उन्होंने कहा, ‘‘‘यथा देहे तथा देवे’ इस उक्ति के अनुसार रासायनिक वज्रलेप करने से, जिस प्रकार कोई भी रसायन हमारे शरीर को जलन पहुंचाता है, उसी प्रकार उस मूर्ति को भी दाह होता है । इसलिए ‘रासायनिक वज्रलेप नहीं करना चाहिए’, ऐसा हमारा स्पष्ट मत है’’ । अतः शंकराचार्य जैसे आध्यात्मिक अधिकारी व्यक्ति की तुलना में क्या पुरातत्व विभाग के अधिकारियों को अधिक बोध है ?, ऐसा प्रश्न इस निमित्त उपस्थित होता है ।

प्रक्रिया से पूर्व उसका वैधानिक उत्तरदायित्व निश्चित हो ! – ह.भ.प. रामकृष्ण हनुमंत महाराज वीर

वारकरी पाईक संघ के ह.भ.प. रामकृष्ण हनुमंत महाराज वीर ने कहा, ‘‘विगत कुछ वर्षों में मूर्ति पर ४ से ५ बार रासायनिक प्रयोग किए गए हैं । इसके परिणामस्वरूप मूर्ति की क्षति होना स्पष्ट दिखाई दे रहा है । किसी भी प्रक्रिया से पूर्व उसका दीवानी (सिविल) तथा आपराधिक (क्रिमिनल) उत्तरदायित्व निश्चित होना आवश्यक है ; इसलिए इस प्रक्रिया में विठ्ठल अथवा रुक्मिणीमाता की मूर्ति को कोई भी क्षति पहुंचने पर संबंधित अधिकारी एवं मंदिर समिति के विरुद्ध धार्मिक भावनाएं आहत करने के प्रकरण में तथा राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुंचाने के प्रकरण में सीधे आपराधिक अभियोग पंजीकृत करने के लिए वारकरी एवं हिन्दू संगठन न्यायालय की शरण लेंगे ।’’

संपादकीय भूमिका

प्रशासन देवताओं की मूर्तियों के संदर्भ में कोई भी निर्णय धर्माचार्यों से परामर्श किए बिना क्यों लेता है ? अन्य पंथों के श्रद्धास्थानों के संदर्भ में उनकी ऐसी मनमानी करने का साहस हुआ होता क्या ?