सनातन के ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधकों की भांति सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधक पृथ्वी पर अत्यल्प होने के कारण

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

प्रश्न :

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी :

‘‘कु. मधुरा भोसले, श्री. निषाद देशमुख और श्री. राम होनप जैसे सनातन के ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधकों की भांति सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधक पृथ्वी पर कितने हैं ? यदि उनकी संख्या विशेष नहीं है, तो उसके क्या कारण हैं ?’’

उत्तर :

श्री. राम होनप

१. सनातन के ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधकों की भांति सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधक पृथ्वी पर कुल १०० हैं । यह संख्या अत्यल्प होने के कारण निम्नलिखित हैं ।

१ अ. वर्तमान कलियुग में ज्ञानयोग के अनुसार साधना करना कठिन होना : कलियुग के प्रतिकूल समय और नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव के कारण ईश्वरप्राप्ति के लिए साधना करना कठिन है । ऐसी स्थिति में कर्मयोग और भक्तियोग के अनुसार साधना करना साधकों के लिए सरल है; परंतु ज्ञानयोग के अनुसार साधना करना कठिन और दुर्लभ है ।

श्री. राम होनप

सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करना, ज्ञानयोग के अनुसार साधना है । इसके लिए साधक में ईश्वर के ज्ञान को समझने और उसे शब्दों में व्यक्त करने की सूक्ष्म क्षमता आवश्यक होती है । कलियुग के कारण ऐसी क्षमतावाले साधक पृथ्वी पर बहुत अल्प हैं । इसलिए सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधकों की संख्या सीमित है ।

१ आ. निष्काम साधना करनेवाले साधकों की अल्पता : सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधक का निष्काम होना और सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करना ही गुरुसेवा है, इस भाव से सेवा करना आवश्यक

है । ऐसे साधक पर ही ईश्वर की कृपा होती है और उसे सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त होता है । ऐसा सेवाभाव उत्पन्न होना और टिके रहना कठिन है; क्योंकि कलियुग में साधक के मन में सूक्ष्म ज्ञान के माध्यम से धन और प्रसिद्धि प्राप्त करने की इच्छा सहजता से उत्पन्न हो सकती है ।

१ इ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा अध्यात्म में सूक्ष्म ज्ञान को महत्त्व देना तथा शिष्यों से ऐसा कार्य करवानेवाले गुरु अत्यल्प होना : डॉ. आठवलेजी ने सनातन धर्म के ज्ञान का महत्त्व समझा है । वर्तमान में जिज्ञासुओं और साधकों के मन में यह प्रश्न उठता है कि ‘अध्यात्म में ऐसा क्यों कहा गया है ?’ अथवा ‘किसी विषय के पीछे का आध्यात्मिक कारण क्या है ?’

इन प्रश्नों के उत्तर अनेक ग्रंथों में उपलब्ध नहीं हैं । यदि इनके उचित उत्तर मिले, तो साधकों की साधना और अच्छी होगी तथा उनकी ईश्वर के प्रति श्रद्धा बढेगी । इसलिए डॉ. आठवलेजी अध्यात्म से संबंधित अनेक प्रश्न सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधकों से पूछते हैं । गुरुकृपा से उन्हें इन प्रश्नों के उत्तर सूक्ष्म से प्राप्त होते हैं ।

डॉ. आठवलेजी का ज्ञानकार्य समयानुसार और दूरदृष्टि के साथ हो रहा है । उनके आध्यात्मिक सामर्थ्य के कारण सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधकों को सही दिशा मिलती है । ऐसा अद्भुत कार्य करनेवाले गुरु पृथ्वी पर अत्यल्प हैं । परिणामस्वरूप सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधकों का निर्माण दुर्लभ हो गया है ।

– श्री. राम होनप (सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करनेवाले साधक), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (ज्ञानप्राप्ति की तिथि : १०.१.२०२६, समय : सवेरे १०.३०, अवधि : २० सेकेंड)

  • सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।
  • इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक
  • सूक्ष्म-परीक्षण : कुछ घटना अथवा प्रक्रिया के विषय में चित्त को (अंतर्मन को) जो अनुभव होता है, उसे ‘सूक्ष्म परीक्षण’ कहते हैं ।