‘सूर्यनमस्कार’ : व्यक्ति के जीवन के सभी अंगों के लिए लाभदायक !

‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ द्वारा ‘बायो-वेल जी.डी.वी. (Bio-well GDV)’ नामक उपकरण से किया गया वैज्ञानिक परीक्षण

‘सूर्यनमस्कार करने से व्यक्ति के कुंडलिनी चक्र सक्रिय एवं संतुलित बनते हैं’, ऐसा योगशास्त्र (हठयोग और पातंजल योग), तथा आयुर्वेद में बताया गया है। सूर्यनमस्कार करते समय मेरुदंड के ऊपर और नीचे होने वाली गतिविधियों के कारण मेरुदंड के मूल में स्थित मूलाधार चक्र में सुप्त कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर वह सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊपर की दिशा में खिंचने में सहायता मिलती है। सूर्यनमस्कार के १२ आसन करते समय सूर्य के १२ नामों से संबंधित मंत्रों का उच्चारण करने से यह प्रक्रिया अधिक गहन और तीव्र होती है।

२१ जून संपूर्ण विश्व में ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस निमित्त सूर्यनमस्कार के व्यक्ति के कुंडलिनी चक्रों पर होनेवाले प्रभाव के विषय में यह लेख प्रकाशित किया जा रहा है। ‘सूर्यनमस्कार करने का साधक के कुंडलिनी चक्रों पर क्या प्रभाव हुआ?’, इसका महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय की ओर से अध्ययन किया गया। इसके लिए ३१.१२.२०२५ को ‘बायो-वेल जी.डी.वी.’ (टिप्पणी १) नामक वैज्ञानिक उपकरण द्वारा डॉ. भिकाजी भोसले (आयु ७० वर्ष) के ‘सूर्यनमस्कार करने से पहले तथा संबंधित मंत्रोच्चार सहित १२ सूर्यनमस्कार करने के बाद’ की रीडिंग ली गईं। इस उपकरण द्वारा व्यक्ति के कुंडलिनी चक्रों की स्थिति का अध्ययन किया जा सकता है।

टिप्पणी १: ‘बायो-वेल जी.डी.वी. (Bio-well GDV)’ उपकरण की जानकारी :

Bio-well GDV

रूस के डॉ. कॉन्स्टेंटिन कोरोटकोव के नेतृत्व में शोधकर्ताओं द्वारा ‘गैस डिस्चार्ज विज़ुअलाइज़ेशन’ तकनीक पर आधारित ‘बायो-वेल’ उपकरण विकसित किया गया है। व्यक्ति की ऊर्जा का परीक्षण करने हेतु एक प्रकार का कैमरा और कंप्यूटर प्रणाली इसमें प्रयुक्त होती है। इस उपकरण से परीक्षण करते समय व्यक्ति की हथेली की प्रत्येक उंगली को एक पीड़ारहित हल्का विद्युत् झटका एक सेकंड से भी कम समय के लिए दिया जाता है। इससे त्वचा से ‘फोटॉन’ और ‘इलेक्ट्रॉन’ जैसे अत्यंत सूक्ष्म कणों के उत्सर्जन को प्रोत्साहन मिलता है। प्रत्येक उंगली से निकलने वाले ‘फोटॉन’ कणों के उत्सर्जन की छवियाँ ‘बायो-वेल जी.डी.वी.’ उपकरण के कैमरे द्वारा ली जाती हैं और उसके आधार पर कंप्यूटर प्रणाली के माध्यम से व्यक्ति के ऊर्जा क्षेत्र तथा उसके कुंडलिनी चक्रों की जानकारी प्राप्त होती है।

१. ‘बायो-वेल जी.डी.वी.’ उपकरण से प्राप्त चित्र में सप्तचक्रों के आकार और स्थिति को समझने के लिए उपयोगी सूत्र

१ अ. चक्र का आकार :

‘बायो-वेल जी.डी.वी.’ उपकरण से प्राप्त कंप्यूटर चित्र में किसी चक्र का आकार उचित होना, अर्थात उस चक्र से संबंधित अंगों को उस चक्र से पर्याप्त मात्रा में सूक्ष्म ऊर्जा का आपूर्ति होना।

१ आ. चक्र की स्थिति :

चित्र में चक्र का मध्य रेखा पर या उसके निकट होना, अर्थात चक्र की स्थिति ‘संतुलित’ होना।

 

१ इ. चक्रों का कार्य :

सामान्यतः मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपूर ये नीचे के ३ चक्र शारीरिक कार्यों हेतु सूक्ष्म ऊर्जा प्रदान करते हैं, जबकि अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार ये ऊपर के ४ चक्र मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक कार्यों हेतु सूक्ष्म ऊर्जा प्रदान करते हैं।

१ ई. व्यक्ति की बाईं और दाईं दिशा का कार्य :

योगशास्त्र के अनुसार व्यक्ति के बाईं ओर इड़ा या चंद्र नाड़ी तथा दाईं ओर पिंगला या सूर्य नाड़ी होती है। चंद्र नाड़ी शीतल होती है, जबकि सूर्य नाड़ी प्रखर होती है। व्यक्ति की बाईं दिशा सूक्ष्म कार्यों हेतु, तथा दाईं दिशा स्थूल कार्यों हेतु पूरक होती है।

१ ए. चक्र का मध्य रेखा के बाएं या दाएं होना :

चित्र में यदि कोई चक्र मध्य रेखा के बाएं हो, तो वह चक्र अकार्यरत (निर्गुण अवस्था) या अंतर्मुखता का संकेत देता है। तथा यदि कोई चक्र मध्य रेखा के दाएं हो, तो वह चक्र कार्यरत (सगुण अवस्था) या बहिर्मुखता का संकेत देता है।

२. सूर्यनमस्कार का प्रत्येक चक्र पर प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन

इस प्रयोग में साधक के कुंडलिनी चक्रों की स्थिति सूर्यनमस्कार करने से पहले और १२ सूर्यनमस्कार करने के बाद ‘बायो-वेल जी.डी.वी.’ उपकरण के माध्यम से प्राप्त चित्रों द्वारा देखी गई।

इन चित्रों में ऊपर से नीचे क्रमशः :

१. सहस्रार, २. आज्ञा, ३. विशुद्ध, ४. अनाहत, ५. मणिपूर, ६. स्वाधिष्ठान, ७. मूलाधार चक्र दर्शाए गए हैं।

सूर्य नमस्कार करने से पहले                                                          सूर्य नमस्कार करने के उपरान्त

३. शोधात्मक अध्ययन से प्राप्त सार एवं आध्यात्मिक विश्लेषण

३ अ. १२ सूर्यनमस्कार के बाद कुंडलिनी चक्रों में हुए परिवर्तन

३ अ १. छह चक्रों का आकार बढना :

साधक द्वारा मंत्रोच्चार सहित १२ सूर्यनमस्कार करने से सभी चक्रों को ऊर्जा प्राप्त हुई। परिणामस्वरूप सहस्रार, आज्ञा, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान और मूलाधार — इन ६ चक्रों का आकार बढा। इससे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक कार्यों में सुधार होने की संभावना बढती है।

३ अ २. विशुद्ध चक्र का आकार घट जाना :

सूर्य के १२ नामों का उच्चारण मुख से करने के कारण विशुद्ध चक्र पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। उसमें स्थित कष्टदाय ऊर्जा कम हुई, इसलिए उसका आकार घट गया और वह अकार्यरत स्थिति में आ गया।

३ अ ३. चार चक्रों का मध्य रेखा के निकट आना :

सहस्रार, मणिपुर, स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्र मध्य रेखा के निकट आ गए। मणिपुर और स्वाधिष्ठान सीधे मध्य रेखा पर आ गए। इससे वे ईश्वरीय तत्त्व ग्रहण के लिए अनुकूल बन गए।

३ अ ४. तीन चक्रों का अकार्यरत होना :

आज्ञा, विशुद्ध और अनाहत चक्र अकार्यरत हो गए, जिससे वे अंतर्मुख अवस्था में चले गए। यह साधना में मनोलय हेतु अनुकूल स्थिति है।

४. निष्कर्ष :

सूर्यनमस्कार करने से शारीरिक कार्यों से संबंधित मणिपुर, स्वाधिष्ठान और मूलाधार, तथा उच्च मानसिक-आध्यात्मिक कार्यों से संबंधित सहस्रार, आज्ञा और अनाहत चक्रों का आकार बढा। चार चक्र ईश्वरीय तत्त्व ग्रहण हेतु अनुकूल बने तथा तीन चक्र अंतर्मुख हुए। मंत्रोच्चार सहित सूर्यनमस्कार करने से विशुद्ध चक्र पर विशेष आध्यात्मिक प्रभाव पड़ा और उसका आकार घटा। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिणाम है।

इस प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि ‘सूर्यनमस्कार करना व्यक्ति के जीवन के सभी अंगों के लिए लाभदायक है।’

— डॉ. (श्रीमती ) नंदिनी दुर्गेश सामंत, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा (०१.०6.२०२6)

सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।