( और इनकी सुने …) ‘क्या सरकार अब भा.ज.पा. की ही भूमिका अपना रही है ?’ – Udhayanidhi Stalin

मंदिर की धनराशि केवल धार्मिक कार्यों के लिए व्यय करने की तमिलनाडु सरकार की नीति पर हिंदूद्वेषी उदयनिधि स्टालिन की आलोचना

बाएँ से: उदयनिधी स्टॅलिन और सी. जोसेफ विजय

चेन्नई (तमिलनाडु) — तमिलनाडु में सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा मंदिरों के कोष का उपयोग केवल मंदिरों के धार्मिक कार्यों के लिए करने के निर्णय के उपरांत, डी.एम.के. के विधायक एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने विधानसभा में इसका विरोध किया । उन्होंने प्रश्न उठाया, “क्या सरकार अब भा.ज.पा. की ही भूमिका अपना रही है ?”

उदयनिधि ने कहा, “जब मैं सरकार की नीति देखता हूं, तो मुझे यह शंका होती है कि क्या सरकार अब भा.ज.पा. की ही भूमिका अपना रही है, जिसके अनुसार धर्मादाय विभाग का अस्तित्व होना ही नहीं चाहिए ! भा.ज.पा. एवं विभिन्न दक्षिणपंथी संगठनों की यह पुरानी धारणा रही है कि धर्मादाय विभाग को विद्यालय एवं महाविद्यालय संचालित नहीं करने चाहिए, यह ठीक वैसा ही है । इस आधार पर न्यायालयों में परिवाद भी प्रविष्ट किए गए हैं । अत: हम जानना चाहते हैं कि क्या यह नई नीति केवल विवाह भवन एवं व्यावसायिक परिसर पर लागू है या क्या यह शैक्षणिक संस्थाओं पर भी लागू की जाएगी ?”

उदयनिधि की इस टिप्पणी पर धर्मादाय विभाग के मंत्री रमेश ने उत्तर देते हुए कडा पलटवार किया 

रमेश ने कहा:

१. हमारी नीति का अर्थ यह है कि मंदिर की आय केवल मंदिरों एवं दर्शनार्थियों के लिए ही व्यय की जाएगी । दर्शनार्थियों के लिए आवास, शौचालय एवं अन्य बुनियादी सुविधाओं में सुधार करने के स्थान पर गत सरकार (उदयनिधि की डी.एम.के. सरकार) ने केवल विवाह भवन एवं व्यावसायिक परिसरों का निर्माण कर राजस्व अर्जित करने के उद्देश्य से ऐसे प्रकल्प प्रारंभ किए थे । अत: हमने उनका पुनरावलोकन कर उन्हें निरस्त किया । कई प्रकल्पों के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद एवं निलंबन आदेश भी जारी हुए थे, जिसके कारण वर्तमान सरकार के इस निर्णय का समर्थन होता है ।

२. कुणूर स्थित अरुलमिगु विनायक परम्परागत मंदिर में भूत पूर्व मंत्री द्वारा मंदिर कोष का उपयोग कर लगभग १० करोड़ रुपये के व्यय का ‘मल्टी-लेवल कार पार्किंग’ प्रोजेक्ट घोषित किया गया था; परंतु उस मंदिर में औसतन प्रति माह केवल ५०० भक्त आते हैं । उस मंदिर में साधारण शौचालय की सुविधा भी नहीं है । न केवल यह, कुणूर, उदगमंडलम (ऊटी) एवं आसपास के लगभग ५० मंदिरों में बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं का अभाव है । जब ऐसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तब मंदिर कोष का उपयोग करके ‘मल्टी-लेवल कार पार्किंग’ की क्या आवश्यकता थी ? क्या यह कोई व्यावसायिक परियोजना नहीं थी ? हमने उन परियोजनाओं को रोक दिया; क्योंकि हम मंदिर कोष का व्यावसायिक प्रयोजनों के लिए उपयोग करने के विरोधी हैं । इसके स्थान पर, जैसा कि सरकारी आदेश में स्पष्ट किया गया है, हम वैकल्पिक परियोजनाएं प्रमाणित करेंगे जिनका सीधा लाभ मंदिरों एवं भक्तों को पहुंचता है ।

३. हमने कहीं भी यह नहीं कहा कि हम सार्वजनिक हित की शैक्षणिक संस्थाएं या स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं स्थापित करेंगे । केंद्र सरकार पलानी में एक चिकित्सालय के लिए राशि आवंटित कराने को तैयार थी; परन्तु ‘अन्य व्यय वहन नहीं कर पाएंगे’ कहकर गत सरकार ने उस प्रस्ताव को स्थगित कर दिया था । हमने अब उस परियोजना को पुनः आरम्भ कर दिया है एवं इसे आगे बढाने के लिए अध्ययन चल रहा है ।

४. मुख्यमंत्री विजय एवं’ तमिळगा वेत्री कल्घम्’ पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार को मंदिर के कोष का व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं है । मंदिर के कोष का कभी भी व्यावसायीकरण नहीं होना चाहिए, ऐसा रमेश ने अंत में कहा ।

संपादकीय भूमिका

  • उदयनिधि स्टालिन, जो हिन्दू धर्म को ‘डेंगू, मलेरिया’ जैसा बताकर उसे समाप्त करने का आवाहन करते हैं, क्या उन्होंने कभी मंदिरों को एक पैसा भी दान किया है ?
  • क्या मंदिरों की धनराशि मंदिरों के धार्मिक कार्यों के लिए व्यय नहीं की जानी चाहिए ? तो क्या मस्जिदों एवं चर्चों पर व्यय की जानी चाहिए ?