
ईंधन, सोना आदि के आयात के लिए होनेवाला प्रचंड खर्चा, उसके कारण विदेशी मुद्रा देश के बाहर जाने के कारण उसका देश की अर्थव्यवस्था पर होनेवाला परिणाम एवं विश्वयुद्ध की स्थिति; इन सभी बातों को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिन पहले देशवासियों से कुछ आवाहन किए । अनावश्यक खर्च टालना, राजनेताओं के काफिले के वाहन कम करना, सार्वजनिक वाहनों का उपयोग करना, तेल का अल्प उपयोग करना, बैठकों के लिए ‘वीडियो कॉन्फरेंस’ का उपयोग करना, घर पर रहकर कार्यालयीन काम करना आदि आवाहनों का इसमें समावेश है । उस पर पूरे देश में संमिश्र प्रतिक्रियाएं व्यक्त हुईं । प्रधानमंत्री के आवाहन के उपरांत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस मंत्रीमंडल की बैठक के लिए ‘बुलेट’ से मंत्रालय आए । केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पालकी के मार्ग का निरीक्षण करने के लिए बस से यात्रा की । सत्ताधारी एवं विपक्ष के कुछ नेता पैदल चलकर कार्यालय गए । अन्य राज्यों में भी वहां के मंत्रियों ने स्वयं के काफिले के वाहनों की संख्या कम की, दोपहिया वाहन से यात्रा आदि कृतियां की तथा माध्यमों ने इन सभी को प्रसिद्धि दी । परिवार चलाते समय बच्चों की शिक्षा, विवाह, साथ ही भविष्य की समस्याओं का विचार कर हम आर्थिक संतुलन साधते रहते हैं । उसमें हम आवश्यकता के अनुसार मितव्ययिता करते हैं । राष्ट्र भी एक परिवार ही है । इसलिए वर्तमान युद्धजन्य स्थिति को देखते हुए हमें अभी से कुछ बातों से अभ्यस्थ होना होगा । इसके पीछे एक राष्ट्रीयता की भावना है । उसे किसी ‘इवेंट’ का स्वरूप देने का प्रयास नहीं होना चाहिए ।
छोटी-छोटी बातों से राष्ट्रहित !
सडक पर चलते समय अथवा रेल से यात्रा करते समय हम खाद्यपदार्थाें के आवरण बडी सहजता से सडक पर अथवा गाडी के बाहर फेंक देते हैं । इस प्रकार की अनुचित आदतों के कारण ही सार्वजनिक स्थानों पर कचरा जमा होता है तथा यह कचरा स्वच्छ करने के लिए नगर परिषद, महानगरपालिका, रेल प्रशासन आदि विभागों को पैसे देकर स्वच्छताकर्मी नियुक्त करने पडते हैं । इस प्रकार से हम न जाने कितनी अनुचित कृतियों से ज्ञात-अज्ञातवश राष्ट्र की संपत्ति का बडी मात्रा में व्यय करते रहते हैं । राष्ट्र के लिए यदि त्याग करना ही है, तो उसे कुछ कार्यक्रमों तक ही सीमित करना पर्याप्त नहीं है, अपितु उसका अपने मन पर गहन संस्कार होना आवश्यक है । प्रधानमंत्री के आवाहन के उपरांत अनेक लोग सामाजिक माध्यमों पर उपहास उडा रहे हैं; परंतु विरोधी के रूप में एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा का काम अनुचित लगना; यह भूमिका त्यागकर एक राष्ट्र के रूप में भी इस पर विचार होना चाहिए; क्योंकि हम चाहे ‘सत्ताधारी हों, विरोधी हों, साम्यवादी अथवा दक्षिणपंथी हों; परंतु सर्वप्रथम हम एक भारतीय हैं’, यह विचार हममें दृढ हो, तो कौन-सी बात पर राजनीति करनी चाहिए तथा किस बात की आलोचना करनी चाहिए, इसमें सुस्पष्टता आती है; परंतु राजनीति के लिए राष्ट्रहित को ही छोडा जाए, तो जनता को ऐसे राजनीतिक दलों को ही छोड देना चाहिए ।
राजनीति के आदर्श के रूप में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का जीवन अनुकरणीय है । व्यक्तिगत उपयोग के लिए उन्होंने कभी भी सरकारी सुविधाओं का अनुचित लाभ नहीं उठाया । उनके बेटे का शिक्षाशुल्क भरने के लिए विद्यालय से उन्हें स्मरणपत्र भेजा गया । उस समय ‘प्रधानमंत्री का बेटा होने के कारण उसे विशेष सुविधा के रूप में शिक्षा शुल्क में छूट मिल सकती है’, ऐसा सरकारी अधिकारियों द्वारा बताने पर भी उन्होंने छूट लेने से मना कर दिया । वर्ष १९६५ में देश में अन्न का अभाव था, उस समय उन्होंने देशवासियों को प्रतिदिन एक बार उपवास रखने का आवाहन किया तथा उन्होंने स्वयं भी इसका अचूकता से पालन किया । राष्ट्र के प्रति दायित्व का भान रखनेवाला व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है । ‘राजा राष्ट्र का अर्थात जनता का सेवक है’, इस भाव से ही यह कृति हो सकती है । प्राचीन भारतीय परंपरा में जनता के लिए सर्वस्व त्यागनेवाले अनेक राजाओं के उदाहरण देखने को मिलते हैं; परंतु वर्तमान स्थिति में त्याग का स्थान स्वार्थ ने ले लिया है । जनता के लिए त्याग करने की क्षमता न रखनेवाले नेता पैसे देकर चुनाव जीतते हैं । अत: राष्ट्र के लिए त्याग केवल आपातकाल तक सीमित नहीं रह सकता । राष्ट्र के लिए त्याग करने की भावना शासनकर्ता एवं नागरिक, इन दोनों में भी सदैव ही जागृत रहनी चाहिए ।
त्याग में ही राष्ट्रहित !
सामान्य नागरिक जब सामान्यतः २० वर्ष सरकारी नौकरी करता है, तब उसे पेंशन मिलती है । पार्षद, विधायक, सांसद आदि को एक बार चुने जाने पर भी पूरे जीवन पेंशन मिलती है । कुछ जनप्रतिनिधि पार्षद, विधायक एवं सांसद, इन तीनों पदों की पेंशन लेते हैं । विधायक बनने पर पार्षद के रूप में मिलनेवाली पेंशन बंद नहीं होती तथा ‘सांसद’ बन जाने पर विधायक के पद की पेंशन बंद नहीं होती । इस प्रकार से एक ही व्यक्ति को २ अथवा ३ पेंशन मिलना भी सरकारी धन का अपव्यय ही है । इसके अतिरिक्त पद पर रहते समय २ लाख रुपए तक का वेतन लेनेवाले, चुनाव जीतने के उपरांत अपनी मूल संपत्ति को ४-५ गुना अथवा उससे अधिक बढानेवाले ऐसे जनप्रतिनिधि लालबहादुर शास्त्री के बाल के भी बराबर नहीं हैं तथा छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम लेने की तो उनकी योग्यता भी नहीं है । इसलिए जनप्रतिनिधि के रूप में चुने जाने के लिए प्रत्याशी चुनाव में कितना खर्च करेगा, जैसे समाजघातक मापदंड रखने की अपेक्षा, प्रथम ‘राष्ट्र के लिए त्याग’ का मापदंड रखा जाना चाहिए । जब सभी राजनीतिक दल यह मापदंड सुनिश्चित करेंगे, तभी चुने हुए जनप्रतिनिधियों को त्याग का भान रहेगा । पैसे बांटकर चुनाव जीतनेवाले तथा चुनाव जीतने के उपरांत अपनी जेब भरनेवालों से राष्ट्र के लिए त्याग कभी भी संभव नहीं है । ‘राष्ट्राय स्वाहा, राष्ट्राय इदं न मम्’ अर्थात ‘जो कुछ भी है, वह राष्ट्र का है । उसमें मेरा कुछ नहीं है’, यह भारतीय संस्कृति की उच्च भावना ही राष्ट्रहित की बलशाली नींव है । सरकारी कार्यालय में कोई न होते हुए भी दिनभर पंखे चलाना एवं बिजली के दीप जलते रहना, नागरिकों को सरकारी कार्यालय के अनावश्यक चक्कर काटने पर बाध्य करना, काम के लिए पैसे मांगना जैसी कृतियां भले ही सामान्य लगती हों, तब भी राष्ट्र की संपत्ति का अपव्यय यहीं से होता है । ‘आर्य चाणक्य राज्य का काम करते समय सरकारी पैसों से दीप जलाते थे तथा व्यक्तिगत काम करते समय अपने पैसों से तेल का दीप जलाते थे’, ऐसा बताया जाता है । राष्ट्र की संपत्ति का उपयोग कितनी मितव्ययिता से करना चाहिए, इसका यह उत्तम उदाहरण है । अतः प्रधानमंत्री द्वारा किए गए आवाहन का कार्यान्वयन केवल दिखावे के लिए न कर, अपितु उसका अनुकरण कर राष्ट्रहित का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
मुंबापुरी में सहस्रों के समष्टि संकल्प से राष्ट्ररक्षा हेतु प्राप्त हुआ आध्यात्मिक बल !
Bangladesh Hindus : पिछले ४ महीनों में १०० हत्याएं, २८ बलात्कार एवं ९५ मंदिरों में तोडफोड
मथुरा (उत्तर प्रदेश) में रामराज्य की स्थापना हेतु की गई सामूहिक प्रार्थना !
नोएडा (उत्तर प्रदेश) के विद्यालय में ‘लव जिहाद’ विषय पर व्याख्यान
हरियाणा के पलवल शहर में विद्यार्थियों के लिए तनाव नियंत्रण एवं व्यवस्थापन विषय पर मार्गदर्शन