सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

क्या विज्ञान किसी एक भी क्षेत्र में धर्मशास्त्र से आगे है ?

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

कहां प्रत्येक क्षेत्र में सर्वाेच्च स्तर का ज्ञान देनेवाला हिन्दू धर्म, तो कहां आंगनबाडी की भांति शिक्षा देनेवाले पाश्चात्य देश !

‘सभी क्षेत्रों में ऐसी स्थिति है । उसके कुछ उदाहरण यहां दिए गए हैं ।

वास्तुशास्त्र (परिणाम, ज्योतिष एवं उपाय)

वास्तु के व्यक्ति पर दिन-रात परिणाम होते रहते हैं, यह ज्ञात न होने के कारण आधुनिक वास्तुवैज्ञानिक केवल हवा, प्रकाश एवं दिखने में वास्तु कैसी दिखाई देगी ?, इतना ही विचार करते हैं । इसके विपरीत, हिन्दू धर्म में वास्तु कैसी होनी चाहिए, जिससे कष्ट नहीं होगा, अपितु उसके कारण साधना के लिए पूरक वातावरण मिलेगा, इसका विचार दिखाई देता है ।


‘किसी का पति भ्रष्टाचारी है, यह ज्ञात होने पर उसकी धर्मपत्नी एवं निकट संबंधियों को उसे भ्रष्टाचार के पाप से बचाने के लिए उसे समझाना, उसका पाप का पैसा स्वीकार न करना इत्यादि प्रयास करें । उससे भी उसमें परिवर्तन नहीं आया, तो उसके विरुद्ध शिकायत करें, जिससे उसके पाप में सहभागी होने का पाप उन्हें नहीं लगेगा ।’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले