‘एफसीआरए’ के कडे प्रतिबंधों के कारण अमेरिका के रिपब्लिकन एवं डेमोक्रेटिक दोनों ही दलों के राजनेताओं को हुई असहजता (बदहजमी) !

न्यूयार्क (अमेरिका) – भारत सरकार द्वारा विदेशी अंशदान नियमन कानून (‘एफसीआरए’ यानी ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट’) के नियमों में परिवर्तन किए जाने से धर्मांतरण करनेवाली विदेशी संस्थाओं पर कार्रवाई होगी । इससे अमेरिकी राजनेता बौखला गए हैं । न केवल डेमोक्रैट्स, अपितु सत्ताधारी रिपब्लिकन भी इसके विरुद्ध विष (जहर) उगल रहे हैं । दोनों दलों के सांसदों का कहना है कि भारत में ‘एफसीआरए’ के नियमों में किए जा रहे नए सुधारों के कारण भारतीय समाज एवं गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के कामकाज पर नकारात्मक असर पडेगा । अमेरिकी सीनेट की ‘फॉरेन रिलेशंस कमेटी’ के प्रमुख इव रिपब्लिकन पार्टी के सांसद जेम्स रिश ने कहा, ‘यह अत्यंत चिंताजनक है । ईसाई एवं अन्य धार्मिक समूहों के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवाधिकारों का उल्लंघन करनेवाले देशों की आलोचना करने से अमेरिका पीछे नहीं हटेगा ।’
रिश ने आगे कहा कि भारत का ‘एफसीआरए’ कानून विदेशी आर्थिक सहायता प्राप्त करनेवाले समूहों पर अत्यधिक एवं अस्पष्ट प्रतिबंध लगाता है । इससे संस्थाओं का दैनिक कामकाज संभालना लगभग असंभव हो जाता है । यदि इसका उपयोग अमेरिका से जुडी ईसाई संस्थाओं के विरुद्ध उत्पीडन बढाने या उनकी संपत्ति एवं फंड को अधिग्रहित करने के लिए किया गया, तो यह अत्यंत चिंताजनक होगा । डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा एवं धार्मिक स्वतंत्रता को अपनी सरकार की प्राथमिकता बनाया है । (हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रता का क्या? – संपादक)
नाम न छापने की शर्त पर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के एक सांसद ने कहा कि ‘एफसीआरए’ के नियमों के कारण भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खडे होंगे । एक दृढ नागरिक समाज ही भारत-अमेरिका के मजबूत संबंधों की असली नींव है ।
भारत का दोटूक उत्तर !
इस पर भारतीय राजनयिक अधिकारियों ने भी अत्यंत कडा एवं स्पष्ट प्रत्युत्तर दिया है । भारतीय पक्ष ने यह साफ कर दिया है कि प्रस्तावित सुधारों के कारण देश में कानूनी एवं वैध तरीके से काम करनेवाली किसी भी संस्था को भयभीत होनेकी तनिक भी आवश्यकता नहीं है । उन पर इसका कोई अनुचित प्रभाव नहीं पडेगा । यह कानून केवल पारदर्शिता सुनिश्चित करने एवं विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए ही है ।
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