युवा वेदमूर्ति ‘दंडक्रम विक्रमादित्य’ देवव्रत महेश रेखे का नाम आज भारत में सनातन धर्म को मानने वाले लगभग प्रत्येक भारतीय को पता है, और वह भी उनकी अत्यंत दुर्लभ ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए ! केवल १९ वर्ष की आयु में, अर्थात सामान्य भारतीयों की भाषा में ‘जेन जी’ (१९९६ से २०१० के मध्य जन्मी पीढी) ने शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिन शाखा का दंडक्रम पारायण पूरा किया, वह भी देवभूमि काशी में !

१. वेदाध्ययन की इस कठिनतम परीक्षा को पूर्ण करने वाले वेदमूर्ति देवव्रत रेखे !
अहिल्यानगर (अहमदनगर) के वेदब्रह्मर्षि महेश चंद्रकांत रेखे के सुपुत्र वेदमूर्ति देवव्रत ने बिना पुस्तक देखे शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिन शाखा के लगभग २००० मंत्रों का पाठ किया ।
(परीक्षण की गुणवत्ता) : इस पूरी परिक्रमा की गुणवत्ता की जांच वेदमहर्षि रामचंद्र गढीकर ने की, यहां यह विशेष उल्लेख करना इसलिए आवश्यक है कि ५० दिनों के इस पारायण में उच्चारण अथवा पाठ में केवल ३ गलतियों की अनुमति थी । देवव्रत ने एक भी गलती किए बिना दंडक्रम पारायण पूरा किया एवं इस प्रकार यह परीक्षा उत्तीर्ण की । यह पारायण ५० दिनों से अधिक समय तक अखंड चला । श्रृंगेरी मठ कहता है, ‘दंडक्रम को उसकी जटिल स्वर पद्धति एवं जटिल ध्वन्यात्मक क्रमपरिवर्तन के कारण वैदिक पाठ का ‘मुकुटमणि’ माना जाता है !’ वर्तमान ज्ञात इतिहास में यह केवल ३ बार ही इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है ! इसमें भी विशेष बात यह कि युवा देवव्रत का पाठ दोषरहित एवं अल्पतम अवधि में पूर्ण हुआ है । इस प्रकार, देवव्रत ने वेदाध्ययन की सबसे कठिन यह परीक्षा अल्पतम आयु में पूर्ण की !
२. आदिशंकराचार्य के कुल के युवा वेदमूर्ति
पिछले कुछ दिनों में इस विषय से संबंधित वेदाध्ययन क्षेत्र के कुछ आधिकारिक वेदमूर्तियों के सूचनाप्रद वीडियो और लेख पढे एवं अकस्मात ही हाथ जुड गए ! यह कितनी बडी उपलब्धि है ? जिन्हें इस क्षेत्र की थोडी-बहुत जानकारी है, निश्चित रूप से उन्हें इसका आभास होगा ।आदिशंकराचार्य के कार्य एवं उनकी महानता का अनुमान तो सभी को है । केरल में ‘कालडी’, जो उनका जन्मस्थान है, वहां होनेवाली दिव्याभूति भी देखी गई है । इसकी कहीं भी तुलना नहीं है, ना ही वह संभव है; परंतु आदिशंकराचार्य को न देखने वाली हमारी पीढी ने लगभग ११०० वर्षों के उपरांत उनके कुल के युवा वेदमूर्ति को देखा, यह हमारी पीढी का सौभाग्य है !
वेदमूर्ति ‘दंडक्रम विक्रमादित्य’ देवव्रत महेश रेखे द्वारा किया गया पाठक्रम !
अहिल्यानगर के वेदशास्त्रसंपन्न देवव्रत महेश रेखे ने वेद मौखिक परंपरा में अत्यंत कठिन मानी जाने वाली ८ विकृतियों में से दंडक्रम पारायण का इतिहास काशी में रचा । देवव्रत की आयु केवल १९ वर्ष है । उन्होंने काशी विश्वनाथ क्षेत्र में शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिन शाखा का दंडक्रम पारायण किया । पिछले ५० दिनों से निरंतर १६५ घंटों से अधिक समय में उन्होंने यह दंडक्रम पारायण पूर्ण किया । मूलतः दंडक्रम पारायण इतना कठिन क्यों है ? इसकी जानकारी के लिए यह प्रयास है !
वेदों का पाठ्यक्रम क्रम !
प्रकृति पाठ
१. संहिता पाठ, २. पदपाठ, ३. क्रमपाठ
विकृति पाठ
४. जटापाठ, ५. मालापाठ, ६. शिखापाठ, ७. लेखपाठ, ८. दंडपाठ, ९. ध्वजपाठ, १०. रथपाठ, ११. घनपाठ
– श्री. प्रसाद देशपांडे
३. संस्कारों का परिपाक (उत्कृष्ट परिणाम)
एक और परिक्रमा पूर्ण होने पर देवव्रत के भाव, बैठक में उनका व्यवहार और उनके चेहरे पर विद्यमान तेज अतुलनीय एवं अवर्णनीय था ! निश्चित ही यह इस जन्म का नहीं है । अनेक जन्मों के पुण्यसंचय होने पर ही यह संभव हो पाता है और निश्चित ही उनके गुरु, अर्थात उनके पिता वेदब्रह्मर्षि महेश गुरुजी, दादा वेदब्रह्मर्षि चंद्रकांत गुरुजी एवं देवव्रत की माताजी के संस्कार – यह इन सबकी परिपाक उपलब्धि थी !
४. वेदाध्ययन के लिए सरकार को सहयोग करने की आवश्यकता !
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन जैसे राजनीतिक क्षेत्र के शिरोमणियों ने और सनातन हिन्दू धर्म के धर्म शिरोमणियों ने देवव्रत की प्रशंसा की ही है । इस अवसर पर एक बात ध्यान में आती है कि सरकार, चाहे वह केंद्र हो अथवा राज्य सरकार, उन्हें वेदशालाओं को प्रोत्साहन देना चाहिए । चाहे वह अनुदान के रूप में हो अथवा अन्य स्वरूप में; परंतु युवा वेदमूर्ति देवव्रत से प्रेरणा लेकर उनके जैसे युवा विद्वान तैयार हों, तो सनातन हिन्दू संस्कृति, वेद एवं मौखिक ज्ञान परंपरा बनी रहेगी और समृद्ध होगी । इसके लिए यदि सरकारी समर्थन मिले, तो उसमें सरकार का भी सहयोग होगा !
– श्री. प्रसाद देशपांडे
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