कुछ दिन पूर्व बंगाल के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार हुई । इस पृष्ठभूमि पर वहां की वास्तविक स्थिति पर भाष्य करनेवाला लेख…
कुछ ही दिन पूर्व बंगाल विधानसभा चुनाव में १५ वर्ष सत्ता में रही तथा कट्टर हिन्दूद्वेषी राजनीतिक दल तृणमूल कांग्रेस की अर्थात ममता बनर्जी की करारी हार हुई । बंगाल के लोगों ने २९४ में से २०६ सीटों पर अर्थात ७१ प्रतिशत सीटों पर भाजपा को जिताया । इस पृष्ठभूमि पर बंगाल में हिंसा की वर्तमान स्थिति, वहां के नागरिकों की मानसिकता तथा भाजपा को इतनी सीटें कैसे मिली ? इन विषयों पर बंगाल के एक प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ नेता ने ‘सनातन प्रभात’ को जो जानकारी दी, वह यहां प्रकाशित कर रहे हैं ।
१. बांग्ला मतदाताओं की विशेषताएं
‘बंगाल के चुनावों की एक विशेषता यह है कि जब यहां के लोग सत्तापरिवर्तन करने का मन बताते हैं, तब वे पूर्ण रूप से शांत रहते हैं । वे किसे मतदान करेंगे, यह बिल्कुल भी नहीं बताते । इस चुनाव में भी उन्होंने शांत रहना ही पसंद किया तथा बिल्कुल भी अपना मुंह नहीं खोला । इसलिए उनके मन में क्या है, यह समझ में नहीं आ सका । बंगाल के लोगों ने जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट दल (साम्यवादियों) को सत्ता सौंपी थी, तब भी उन्होंने बहुत ही शांति से काम किया था । वास्तव में देखा जाए, तो उस समय बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट दल (माकपा) का संगठन उतना प्रबल नहीं था; परंतु तब भी लोगों ने उन्हें मतदान किया । बंगाल की एक अन्य विशेषता यह कि वे जिसे एक बार चुनते हैं, उन्हें पुनः १० अथवा १५ वर्षाें के लिए बनाए रखते हैं । वे उन्हें विकास के लिए पर्याप्त समय देते हैं । इसीलिए बंगाल के मतदाताओं ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट दल को ३४ वर्ष तथा तृणमूल कांग्रेस को १५ वर्ष तक सत्ता में रखा ।
२. ‘भाजपा को यदि सत्ता में नहीं बिठाया,तो राज्य में मुसलमानों का वर्चस्व स्थापित होगा’, यह भय था हिन्दुओं में !
इस बार बंगाल के मतदाताओं का झुकाव कुछ अलग ही था । उन्होंने किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम की ओर (‘एजेंडा’) देखकर मतदान नहीं किया । बंगाल के लोगों की समझ में यह आ चुका था कि इस बार यदि हम भाजपा को सत्ता में नहीं लाएंगे, तो बंगाल में मुसलमानों का वर्चस्व स्थापित होगा, जो पहले से ही बढा हुआ है । मान लीजिए कि किसी गांव में मुसलमानों की जनसंख्या भले ही १५ से २० प्रतिशत ही हो, तब भी वहां तृणमूल कांग्रेस के पदाधिकारियों के सभी कार्यकर्ता मुसलमान होते हैं, यह वास्तविकता है । लोगों ने इस बात को धार्मिक दृष्टिकोण से देखा । इसीलिए लोगों ने हिन्दुत्व को बचाने के लिए भाजपा को सत्ता में बिठाया । पिछले ४० वर्ष के मेरे सामाजिक जीवन में मैंने इस प्रकार का हिन्दू-संगठन नहीं देखा । भाजपा भी जिसकी कल्पना नहीं कर सकता था, उस प्रकार हिन्दुओं ने संगठित होकर धार्मिक दृष्टिकोण से मतदान किया ।
हिन्दुत्वनिष्ठ राजनीतिक दल के पीछे साधु-संतों की आध्यात्मिक शक्ति

इस चुनाव में हिन्दुत्वनिष्ठों के साथ बंगाल के संतों ने भी बडा कार्य किया । उनके अनेक समूहों ने बंगाल के गांव-गांव जाकर प्रचार किया । वहां बैठकें ली तथा लोगों को समझाया, ‘यह अंतिम अवसर है । अब यह नहीं हुआ, तो पुनः कभी नहीं होगा । बंगाल का बांग्लादेश बन जाएगा । उन्होंने बहुत ही गुप्त रूप से यह कार्य किया । संतों का समाज पर बहुत बडा प्रभाव है; इसलिए इस बार बंगाल ने संपूर्णत: हिन्दुत्व को सामने रखकर मतदान किया ।
– एक प्रखर हिंदुत्वनिष्ठ नेता, बंगाल
३. महिलाओं पर होनेवाले अत्याचारों के कारण लोगों में आक्रोश
तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के १५ वर्ष के कार्यकाल में न जाने कितने अत्याचार हुए । अत्याचार करनेवाले अधिकांश धर्मांध मुसलमान थे । कुछ घटनाओं में हिन्दुओं का भी समावेश था । बंगाल में अनेक लोगों की हत्याएं की गईं तथा महिलाओं पर अत्याचार हुए । इन सभी घटनाओं को दबाने का प्रयास हुआ । इन घटनाओं के संदर्भ में प्राथमिकियां पंजीकृत नहीं की गईं । उस पर मानो प्रतिबंध ही था । शिकायत करने के लिए जानेवाले लोगों को पुलिस थाने में बिठाकर वापस भेजती थी । ‘आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज’ की महिला डॉक्टर पर हुआ अत्याचार एवं उसकी हत्या बंगाल के लोग सहन नहीं कर पाए । बांग्ला हिन्दू भावनाप्रधान होते हैं । उन पर इतने अत्याचार हुए कि उससे बंगाल में प्रचंड जनआक्रोश भडक गया । जब अवसर मिलेगा, तब अपनी शक्ति दिखाने का मतदाताओं ने मन बना लिया था ।
४. ‘ममता राज’ में भ्रष्टाचार !
तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सामान्य नागरिकों की नौकरियां छीन लीं । जिन नागरिकों ने सरकारी नौकरी के लिए परीक्षाएं दीं, उन्हें नौकरी मिलने की घोषणा हुई । सूची में उनके नाम भी थे; परंतु तृणमूल के लोगों ने रिश्वत लेकर सूची ही बदलकर तृणमूल के कार्यकर्ताओं को नौकरियां दीं । उसके विरोध में नागरिकों का बडा आंदोलन हुआ । शिक्षकों सहित विभिन्न व्यावसायियों ने भी जोरदार आंदोलन किया । तृणमूल के जो पदाधिकारी अथवा कार्यकर्ता पहले झोपडियों में रहते थे, वे अब बडे आलीशान घरों में रह रहे हैं । लोगों ने इसे शांति से देखा; परंतु उन्होंने कुछ नहीं बोला । यदि वे इस पर बोलते, तो वे तृणमूल कांग्रेस के लोगों के शत्रु बन जाते । इसीलिए यह चमत्कार हुआ ।

५. राजनीतिक विचारों पर चलनेवाली बांग्ला जनता
बंगाल के लोग राजनीतिक दृष्टिकोण से बहुत विचार करते हैं, यह यहां की सबसे बडी समस्या है । अन्य राज्यों के चुनावों को देखा जाए, तो उन्हें समझने में ३-४ दिन लगते हैं; परंतु उसके उपरांत चुनाव समझ में नहीं आते । बंगाल के लोग प्रतिदिन राजनीति का खेल खेलते हैं । यह उन्हें लगा एक रोग ही है । पहले बंगाल में माकपा सत्ता में थी, तब इस राजनीति का प्रभाव अधिक था । माकपा के कार्यकाल में बंगाल के लोग नास्तिक बन गए । जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई, तब लोग पुनः धर्म की ओर मुडने लगे । इस समय लोग यह भली-भांति समझ चुके थे कि अब कुछ न कुछ परिवर्तन लाना ही होगा; परंतु उस विषय में किसी को कुछ ज्ञात नहीं था । वे लोग अपने घर के लोगों के साथ चर्चा करते भी होंगे; परंतु बाहर वे किसी से कुछ नहीं बोलते थे । इसी कारण यह चमत्कार होता हुआ दिखाई दे रहा है ।
६. बंगाल में चुनाव के उपरांत हिंसा
इस चुनाव में एक बात अच्छी हुई । चुनाव से पूर्व महिलाओं पर अत्याचार अथवा उनकी हत्याएं नहीं हुईं । आश्चर्य की बात यह थी कि चुनाव के उपरांत एवं मतगणना के उपरांत ६ लोगों की हत्याएं हुईं, जिनमें से ४ लोग भाजपा के थे । भाजपा के यहां के मुख्य नेता तथा बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ जब चारपहिया वाहन से जा रहे थे, तब हत्यारों ने उन्हें घेर लिया तथा उन पर १० से १६ गोलियां चलाईं । इसमें उनकी मृत्यु हो गई तथा उनका ड्राइवर गंभीर रूप से घायल हुआ । इसके पीछे व्यावसायी हथियारे होने की बात कही जा रही है । उत्तर २४ परगणा में ही शुभेंदु अधिकारी के निकट के व्यक्ति पर ३ गोलियां चलाई गईं; परंतु वह बच गया । हिन्दुओं ने जिस दृष्टिकोण से मतदान किया, वह अकल्पनीय है । इस बार कदाचित मुसलमानों के कुछ मत बंट गए होंगे; क्योंकि वे भी थोडे अप्रसन्न थे ।
७. … अब हिन्दुओं का बलशाली संगठन आवश्यक !
अब हिन्दुत्व का विषय समाजमानस में और शक्तिशाली पद्धति से फैलाया जाना चाहिए । अब लोग हिन्दुत्व की ओर मुड रहे हैं; इसलिए उन्हें धर्म के पथ पर लाना सुलभ है । दक्षिण २४ परगना के पानीहाटी शहर में अन्य लोगों की भांति ही धर्मांध मुसलमानों ने हिन्दू बस्ती में बिर्यानी की दुकान खोल रखी थी, जिसे हिन्दुओं ने तोड दिया । दक्षिण २४ परगना क्षेत्र में एक मुसलमान नेता ने एक हिन्दू के आलीशान घर पर नियंत्रण कर रखा था, जिसे ७ मई को मुक्त किया गया । तृणमूल कांग्रेस के कार्यकाल में आसनसोल का दुर्गा मंदिर बंद किया गया था, उसे पुनः खोला गया । अब लोग हिन्दुत्व की ओर मुड गए हैं; इसलिए उन्हें और संगठित किया जाना चाहिए । जहां कहीं धर्मांधों ने हिन्दुओं की संपत्ति पर कब्जा किया है, वहां प्रत्येक हिन्दू को उसका विरोध करने का साहस दिखाना चाहिए तथा हिन्दू ऐसा कर भी रहे हैं । अन्यथा हिन्दुत्व की लहर कहीं दब न जाए, इसकी ओर ध्यान देना और आवश्यक है ।
बंगाल के हिन्दुओं के लिए यह परिवर्तन ‘न भूतो न भविष्यति’ अर्थात ‘पहले ऐसा कभी नहीं हुआ तथा आगे भी नहीं होगा’, इस प्रकार का है । मैं स्वयं गांव-गांव जा रहा हूं । उसमें मुझे ऐसा दिखाई दिया कि हिन्दुओं पर धर्मांधों का वर्चस्व स्थापित हो जाता । वैसा न हो; इसके लिए उन्होंने यह परिवर्तन किया । बंगाल में अब हिन्दुत्व के लिए पोषक वातावरण है; इसलिए उन्हें अधर्म के विरोध में संगठित करना आवश्यक है ।’
– एक प्रखर हिंदुत्वनिष्ठ नेता, बंगाल (७.५.२०२६)
| बंगाल ने इस बार पूर्णत: हिन्दुत्व को सामने रखकर मतदान किया ! |

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