‘कलियुग में अधिकांश व्यक्तियों में ‘पूर्वाग्रह होना’ यह स्वभावदोष अल्पाधिक मात्रा में होता है । व्यक्ति में ‘पूर्वाग्रह होना’ यह स्वभावदोष केवल उसकी साधना के लिए ही नहीं, अपितु वह जिन क्षेत्रों में कार्यरत है, उनमें से प्रत्येक क्षेत्र में घातक सिद्ध होता है । इस लेख में हम ‘पूर्वाग्रह होना’, इस स्वभावदोष का स्वरूप, पूर्वाग्रह उत्पन्न होने के कारण, उसके परिणाम तथा उसपर हम कैसे विजय प्राप्त कर सकते हैं ?’, इस विषय में समझ लेते हैं ।

१. व्याख्या
‘पहले घटित कुछ प्रसंगों के कारण किसी व्यक्ति के विषय में अथवा कुछ व्यक्तियों के विषय में स्वयं ही निष्कर्ष निकालकर उन व्यक्तियों के प्रति अपने मन पर नकारात्मक विचार बिंबित करना’, ऐसी पूर्वाग्रह की व्याख्या की जा सकती है ।

२. व्यक्ति में ‘पूर्वाग्रह’ इस स्वभावदोष की निर्मिति कैसे होती है ?
२ अ. कोई व्यक्ति हमें प्रत्युत्तर नहीं करता, तो उसके प्रति पूर्वाग्रह उत्पन्न होना तथा उसके कारण उसके साथ बात करना टालना : कोई व्यक्ति हमारे द्वारा ‘बताई गई बातें, चल-दूरभाष पर भेजे गए संदेश, ‘पोस्ट’ अथवा ‘प्रत्यक्ष बात करना’, इसका प्रत्युत्तर नहीं करता, तब हम ‘यह व्यक्ति कभी की प्रत्युत्तर नहीं करता, इसके उपरांत भी नहीं करेगा तथा वह ऐसा ही है’, यह निष्कर्ष निकालते हैं । हम उस व्यक्ति के साथ अथवा ऐसे कुछ व्यक्तियों के साथ प्रतिक्रियात्मक बात करते हैं अथवा अन्य व्यक्तियों से उसके विरोध में बात करते हैं तथा उपाय के रूप में उनके साथ बात नहीं करते अथवा उनके साथ बात करना टाल देते हैं । उस व्यक्ति के संदर्भ में हमारे ध्यान में आनेवाले प्रसंग प्रतिदिन घटित होते रहते हैं तथा उससे हमारे मन में उस व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह में वृद्धि होती है; परंतु बहुत बार वह व्यक्ति इस संबंध में अवगत नहीं होता ।
२ आ. किसी व्यक्ति के विषय में निरंतर प्रतिक्रियाएं आती हों, तो उससे पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है ।
२ इ. हमारे जिस व्यक्ति के साथ निकट के संबंध होते हैं, ऐसा व्यक्ति यदि अन्य व्यक्ति के विषय में निरंतर नकारात्मक बोलता है, तो उससे हमारे मन में भी उस व्यक्ति के विषय में पूर्वाग्रह के विचार बढते हैं ।
२ ई. ‘पूर्वाग्रह रखना’ इस स्वभावदोष को बढानेवाले अन्य स्वभावदोष तथा अहं के पहलू : ‘तीव्र अपेक्षा करना; ‘सामनेवाला व्यक्ति मेरी इच्छा के अनुसार ही आचरण करे’, ऐसा लगना; बहिर्मुखता, सुनने की वृत्ति न होना, परिस्थिति का स्वीकार न करना, सेवा में रुचि-अरुचि होना, कर्तापन होना, प्रतिमा संजोना, अतिचिकित्सकता, निरंतर सिखाने की भूमिका में रहना, निष्कर्ष निकालना, तुलना करना’, जैसे कुछ स्वभावदोष तथा अहं के पहलू ‘पूर्वाग्रह’ उत्पन्न होने का कारण बनते हैं ।
३. पूर्वाग्रह किसके विषय में उत्पन्न होता है ?
परिवार के कुछ सदस्य, विशेषकर पति-पत्नी, सास- बहू, कुछ संबंधी, जो व्यक्ति निरंतर संपर्क में होता है, उसके प्रति; कुछ सहसाधक, पडोसी, कार्यालयीन सहयोगी, पदाधिकारी अथवा किसी के भी विषय में पूर्वाग्रह उत्पन्न हो सकता है ।
४. ‘पूर्वाग्रह’ स्वभावदोष के कारण होनेवाली हानि
अ. स्वभाव चिढचिढा बनता है ।
आ. मन पर पूर्वाग्रह का संस्कार होता है । अनेक व्यक्तियों के विषय में पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है ।
इ. साधना का अमूल्य समय व्यर्थ जाता है ।
ई. साधना की हानि होती है ।
उ. पिरवार के सदस्य के विषय में यदि पूर्वाग्रह हो, तो उसके कारण घर के स्पंदन दूषित हो जाते हैं ।
ऊ. किसी भी कार्य से आनंद लेना संभव नहीं होता ।
ए. मन पर निरंतर तनाव बना रहता है ।
ऐ. ‘बिंब-प्रतिबिंब’ न्याय के अनुसार जिस व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह उत्पन्न हुआ है, उसके भी मन में उसी प्रकार से पूर्वाग्रह का संस्कार उत्पन्न होता है ।
५. ‘पूर्वाग्रह रखना’, इस स्वभावदोष पर विजय प्राप्त करने हेतु कुछ उपाय
५ अ. ‘पूर्वाग्रह रखना’ इस स्वभावदोष को बढानेवाले अन्य स्वभावदोष/अहं के पहलुओं पर विजय प्राप्त करने हेतु आवश्यक प्रयास
१. निरपेक्ष भावना से कृति करें ।
२. जैसे मेरा कुछ मत है, वैसे उस व्यक्ति का भी कुछ मत हो सकता है, यह जानकर उस व्यक्ति पर अपना मत न थोपें ।
३. प्रत्येक कृति अंतर्मुख होकर करें ।
४. स्वयं में सुनने की वृत्ति बढाएं ।
५. ‘प्रत्येक परिस्थिति के निर्माता ईश्वर हैं’, इसका भान रखकर परिस्थिति स्वीकार करें ।
६. साधना में कोई भी सहसाधक के रूप में मिले, उसके साथ मिल-जुलकर ही रहेंं । चाहे कोई भी सेवा क्यों न मिले, तब भी ‘वह गुरुसेवा ही है’, यह भाव रखें ।
७. स्वयं श्रेय लेने की वृत्ति टालें । ‘यह सेवा गुरुदेवजी ने दी है तथा वे ही उसे पूरा करवानेवाले हैं’, यह भाव रखें । उसके लिए स्वयं में कृतज्ञभाव बढाएं ।
८. प्रतिमा न संजोकर, संबंधित बात खुले मन से बताएं ।
९. अतिचिकित्सक न रहकर जितना आवश्यक है, उतना ही जान लें ।
१०. हमारे गुरुदेवजी (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी) जैसे प्रत्येक प्रसंग से हमें सिखाते हैं, वैसे ही निरंतर सीखने की भूमिका में रहें ।
११. किसी भी प्रसंग में अपने मन से निष्कर्ष न निकालकर आश्वस्तता रखें ।
१२. ‘जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां’, गुरुदेवजी द्वारा दी गई इस सीख को सदैव ध्यान में रखकर प्रत्येक व्यक्ति से मिल-जुलकर रहें ।
५ आ. अन्य उपाय
१. जिस व्यक्ति के विषय में मन में पूर्वाग्रह है, उस व्यक्ति के साथ प्रत्यक्ष बात कर जिन कारणों से पूर्वाग्रह उत्पन्न हुआ है, उस प्रसंग को खुले मन से बताकर वास्तविकता जान लें ।
२. जिस व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह है, उसके विषय में स्वसूचना दे सकते हैं कि उस व्यक्ति को ‘उसके स्वभावदोषों सहित मुझे स्वीकार करना है; क्योंकि मुझमें स्वभावदोष होते हुए भी गुरुदेवजी ने मुझे स्वीकार किया है ।’
३. किसी साधक के विषय में पूर्वाग्रह हो, तो अपने मन पर ‘प्रत्येक साधक में गुरुरूप देखने’ का संस्कार कर सकते हैं । किसी अन्य के विषय में पूर्वाग्रह हो, तो ‘वह भी ईश्वर का रूप है’, यह भाव स्वयं में निर्माण कर सकते हैं ।
४. पूर्वाग्रह की तीव्रता अधिक हो, तो अपने कान पकडकर उस व्यक्ति से प्रत्यक्ष क्षमा मांगें । यदि वैसी तैयारी न हो, तो कुछ दिन मानस रूप में अपने कान पकडकर उसकी क्षमा मांगें तथा उसके कुछ दिन उपरांत प्रत्यक्ष क्षमा मांगें ।
५. जिस व्यक्ति के प्रति पूर्वाग्रह है उसके गुणों की सूची बनाकर, वह गुण आत्मसात करने का प्रयत्न करें ।
६. जिस व्यक्ति के विषय में हमें पूर्वाग्रह होता है, यदि उस व्यक्ति ने कोई अच्छी कृति की, तो उसकी प्रशंसा करें ।
७. ‘जिन स्वभावदोषों के कारण पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है, उस प्रत्येक स्वभावदोष का निरीक्षण कर, प्रसंग के अनुसार स्वसूचना देना’, यह सबसे प्रभावी उपाय है ।
८. सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि ‘स्वयं में प्रेमभाव जागृत करें ।’ उससे कालांतर में हम प्रीति के स्तर तक पहुंच सकते हैं ।
‘गुरुदेवजी द्वारा सुझाए गए ये सभी सूत्र मैं कृतज्ञभाव से उनके चरणों में समर्पित करता हूं ।’
– (पू.) अशोक पात्रीकर (आयु ७४ वर्ष), अमरावती, महाराष्ट्र. (१५.१२.२०२४)
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