मैं अपने गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी को वंदन कर आज का विषय प्रारंभ करता हूं ।
इस समारोह में सूक्ष्म से उपस्थित महर्षियों, देवी-देवताओं, ग्रामदेवता और स्थानदेवता को वंदन करता हूं । उनके आशीर्वाद से आज यह समारोह संपन्न हो रहा है । यहां उपस्थित ब्राह्मतेज के प्रतीक सभी संतों और पुरोहितों को वंदन करता हूं । साथ ही इस कार्यक्रम में उपस्थित देशों और राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व को भी मेरा नमस्कार ! साथ ही यहां उपस्थित सभी सनातन धर्म के भक्तों और साधकों को भी नमस्कार !
सनातन संस्था के २५ वर्षों के कार्य के फल के रूप में आज हम सभी यहां एकत्रित हुए हैं । यह महोत्सव हिन्दू राष्ट्र अर्थात रामराज्य की स्थापना का है, जिसकी नींव धर्म और अध्यात्म है । इसलिए मैं मुख्य रूप से अध्यात्म, साधना और हिन्दू राष्ट्र विषय पर बात करूंगा ।

१. मेरे (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के) साधना की ओर बढने का एकमात्र कारण है – आध्यात्मिक कष्टों का एकमात्र उपाय ‘साधना’ !
डॉक्टर बनने के कुछ वर्षों बाद, मैं मानसिक उपचार की दिशा में बढा, क्योंकि शारीरिक रोगों के लिए गोलियां, शल्यक्रिया आदि उपाय होते हैं; परंतु ‘चिंता, निराशा आदि मानसिक विकारों का मूल कारण क्या है ?’ यह सोचे बिना ही डॉक्टर रोगियों को औषधियां देते थे । इसलिए बहुत से मनोरोगी ठीक नहीं होते । आगे मैंने अध्यात्म का अध्ययन किया और पाया कि ‘स्वभावदोष, प्रारब्ध, पूर्वजों के कष्ट, अनिष्ट शक्तियां’ आदि मानसिक विकारों का मूल कारण होते हैं । इसके लिए दवाईयां नहीं, अपितु स्वभावदोष निर्मूलन और साधना करना ही एकमात्र उपाय है, यह मुझे समझ में आया; इसलिए मैं साधना की ओर बढा ।
आगे मुझे यह भी समझ में आया कि मानसिक रोगी अपने रोग के कारणों के अनुसार उनके लिए जो आवश्यक है, वह साधना करें, तो वे स्वस्थ हो सकते हैं । समाज के अधिकांश संत साधना बताते हैं; परंतु वह उनके संप्रदाय के अनुसार सभी भक्तों के लिए एक जैसी होती है । ‘जितने व्यक्ति उतनी प्रकृति और उतने ही साधनामार्ग हैं’ यह समझने के उपरांत, मैं विभिन्न रोगियों को उनकी आवश्यकता के अनुसार विशिष्ट साधना करने के लिए बताने लगा । तब वे रोगी ठीक होने लगे । फिर यह भी समझ में आया कि किसी विशिष्ट देवता की उपासना करने से सामान्य व्यक्ति की आध्यात्मिक समस्याएं दूर हो जाती हैं और उसका जीवन स्थिर और आनंदमय हो जाता है । सनातन संस्था जैसी प्रत्येक व्यक्ति को विशिष्ट साधना बताने की पद्धति अन्यत्र नहीं मिलती, अर्थात कुछ संत सभी को अपने संप्रदाय की साधना ही बताते हैं, इसलिए उस साधना से मानसिक रोगी ठीक नहीं होते । अब सनातन के अनेक साधकों को यह उपचार-पद्धति पता चल चुकी है, इसलिए वे भी आध्यात्मिक कष्टों से पीडित रोगियों पर आध्यात्मिक उपचार कर सकते हैं ।
(आध्यात्मिक कारणों से होनेवाले कष्ट डॉक्टरों को भले ही न पता चलें, कुछ ज्योतिषियों को पता चल सकते हैं । यदि अच्छे ज्योतिषी मिलें, तो उनसे प्रारब्ध, पूर्वज, अनिष्ट शक्तियां आदि के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और उनके द्वारा बताए आध्यात्मिक उपचार कर सकते हैं ।)
२. सनातन संस्था की स्थापना के व्यापक उद्देश्य
अब हम इसे जानेंगे । धर्म क्या कहता है ? धर्म कहता है कि मानव जन्म की सार्थकता ईश्वर की प्राप्ति, अर्थात मोक्षप्राप्ति में है । इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन साधना करनी होती है । प्रत्येक की व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय इत्यादि सभी स्तरों पर स्थिति अनुकूल हो, तो लक्ष्य की प्राप्ति सरल होती है । इन सभी स्तरों पर स्थिति अनुकूल करने का कार्य केवल सनातन धर्म करता है । सनातन धर्म के विभिन्न अंग और साधना प्रत्येक को समझ में आए, साथ ही यह पूरी पृथ्वी ही हर व्यक्ति के लिए अनुकूल हो जाए, चाहे वह किसी भी देश या धर्म का हो, इस व्यापक उद्देश्य से सनातन संस्था की स्थापना की गई है ।
२ अ. व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार साधना सिखानेवाली सनातन संस्था ! : ‘साधना’ केवल सुनने या पढने का शास्त्र नहीं है, यह कृति करने का शास्त्र है । सनातन द्वारा बताई गई साधना सांप्रदायिक साधना नहीं है । ‘जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां और उतने ही साधनामार्ग हैं’, इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए जो आवश्यक है, वह साधना सिखाई जाती है । यह साधना केवल हिन्दुओं के लिए नहीं है, किसी भी धर्म का व्यक्ति इसे कर सकता है । आज ‘सनातन संस्था’ द्वारा सिखाई जा रही साधना कर देश-विदेश के विभिन्न धर्माें के साधक आध्यात्मिक उन्नति कर रहे हैं ।
२ आ. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए ब्राह्मतेज की आवश्यकता होना और इस संदर्भ में सनातन संस्था का आध्यात्मिक स्तर पर सहभाग ! : ‘हिन्दू’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी गई है – ‘हीनान् गुणान् दूषयति इति हिंदुः ।’ ‘हीनान् गुणान्’ अर्थात ‘हिन्दू’ वह है जो हीन, कनिष्ठ ऐसे रज एवं तम गुणों का ‘दूषयति’ अर्थात विनाश करता है । पृथ्वी पर वर्तमान समय में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए विशाल आध्यात्मिक बल, अर्थात ब्राह्मतेज की आवश्यकता है । अनेक संत इस कार्य में लगे हुए हैं । सनातन संस्था यह कार्य आध्यात्मिक स्तर पर भी कर रही है । सनातन के मार्गदर्शन में साधना कर अब तक १३१ साधक संत पद पर पहुंच चुके हैं और १०३० साधक अगले १० वर्षों में संत बनने की दिशा में बढ रहे हैं । ये सभी आध्यात्मिक स्तर पर हिन्दू राष्ट्र को साकार करने के लिए प्रयास कर रहे हैं ।
२ इ. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए सनातन संस्था द्वारा किया जा रहा ज्ञानशक्तिमय कार्य : हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए ज्ञानशक्ति के स्तर का कार्य भी आवश्यक है । इसके लिए सनातन ने अब तक धर्म, अध्यात्म, राष्ट्र आदि विभिन्न विषयों पर ३६६ ग्रंथों की १३ भाषाओं में १ करोड ६१ सहस्र प्रतियां प्रकाशित की हैं और अनुमान है कि ५००० ग्रंथ प्रकाशित किए जा सकते हैं, इतना लेखन सनातन के पास संग्रहित है । इन ग्रंथों की ज्ञानशक्ति का प्रसार सनातन के सहस्रों साधक देश-विदेश में कर रहे हैं ।
२ ई. एकजुट समाज-निर्माण की दृष्टि से सनातन के आश्रमों का महत्त्व : आजकल किसी घर में पति-पत्नी, दो बच्चे, सास-बहू आदि के बीच नहीं बनती; परंतु सनातन की सीख के कारण आज सनातन के विभिन्न आश्रमों में १००० से अधिक पूर्णकालिक साधक और साधिकाएं परिवार भावना से रह रहे हैं और साधना कर रहे हैं । साधना के माध्यम से आनंदमय और एकजुट समाज का निर्माण किया जा सकता है और रामराज्य की अनुभूति ली जा सकती है, यह सनातन के आश्रमों में सिद्ध हुआ है ।
यह सब बताने का तात्पर्य यह है कि ‘सनातन संस्था’ केवल एक संगठन या संप्रदाय नहीं है, यह पृथ्वी पर कालानुसार विश्वकल्याणकारी हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने का मार्गदर्शक सिद्धांत है ।
३. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के संदर्भ में सूत्र
३ अ. सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में धर्मशिक्षा का महत्त्व : आज की सामाजिक समस्याओं का विचार करें, तो कुछ लोगों के मन में विचार आता है कि क्या वास्तव में हिन्दू राष्ट्र साकार होने पर सभी सामाजिक समस्याएं दूर हो जाएंगी ? यहां यह ध्यान रखना होगा कि धर्म ही एकमात्र ऐसा है जो व्यक्ति को सिखाता है कि उचित कर्म क्या है, अनुचित कर्म क्या है ? नैतिक कर्म क्या है, अनैतिक कर्म क्या है ? धर्म यह भी सिखाता है कि पापकर्म अथवा अनैतिक कर्म करने से उस कर्म का फल प्राप्त होकर मृत्यु के उपरांत सद्गति नहीं मिलती । इसलिए पूर्वकाल का धर्मशिक्षित समाज पापभीरू था । पापकृत्य हो ही नहीं, ऐसा आदर्श जीवन जीने का प्रयास करता था । वर्तमान अधर्मी राज्यव्यवस्था ने स्वतंत्रता से अर्थात वर्ष १९४७ से हिन्दुओं को धर्म बिलकुल नहीं सिखाया । इसलिए कई लोग पापमय आचरण कर रहे हैं । परिणामस्वरूप हर जगह भ्रष्टाचार और अनैतिकता बढी है । वर्तमान समाज में जो अनैतिकता, भ्रष्टाचार, धोखाधडी है, वह केवल धर्म के आचरण को सिखाकर रोकी जा सकती है । इसलिए रामराज्य की अनुभूति देनेवाला हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने के लिए हमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक, चिकित्सकीय, न्याय, पुलिस, रक्षा जैसे सभी क्षेत्रों में धर्म और अध्यात्म की नींव स्थापित करनी होगी ।
यह सब सरलता से नहीं होगा; परंतु असंभव नहीं । इसके लिए कुछ समय तक लगातार प्रयास करने से यह संभव हो सकता है ।
३ आ. हिन्दुत्व का कार्य होने के लिए आध्यात्मिक स्तर पर साधना करें ! : हिन्दुत्व के लिए शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक स्तर पर कार्य करते समय कुछ लोगों के मन में निराशा होती है कि हर जगह बुरा ही हो रहा है । अच्छा कार्य करने के उपरांत भी सफलता नहीं मिलती । ऐसे सभी लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सब कुछ व्यक्ति के प्रारब्धानुसार एवं ईश्वर की इच्छा से होता है । कालमहिमा के अनुसार भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना अवश्य होगी । वह शीघ्र ही होगी । आध्यात्मिक स्तर पर कार्य करनेवाले लोग इसे जानते हुए ईश्वर के कार्य में सहभाग के रूप में निरंतर कार्य करते रहते हैं । इसके लिए हिन्दुत्व के लिए शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक स्तर पर कार्य करनेवालों को सफलता और असफलता की चिंता किए बिना, ईश्वर के कार्य में सहभागी होने का आनंद लेना चाहिए और साधना सीखनी चाहिए । साधना क्या है, इसे कैसे करना है, प्रत्येक व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में साधना कैसे कर सकता है ? आदि सभी सनातन के साधक सत्संग, शिविर, कार्यशाला, अभ्यासवर्ग के माध्यम से निःशुल्क सिखाते हैं । शारीरिक बल बढने के लिए ९ से १० महीने लगते हैं । मानसिक बल बढने के लिए २-३ वर्ष लगते हैं, जबकि हिन्दू राष्ट्र के लिए आवश्यक आध्यात्मिक बल बढने के लिए कुछ वर्ष देने पडते हैं । इसलिए अभी से साधना प्रारंभ करें ।
४. साधना के प्रकार
अब हम साधना के प्रकार समझते हैं । साधना के दो प्रकार हैं – व्यष्टि और समष्टि साधना । स्वयं के लिए साधना, अर्थात व्यष्टि साधना । इसका अर्थ है अपने स्वभावदोष एवं अहं का निर्मूलन करना व आध्यात्मिक उन्नति हेतु प्रयास करना ।समष्टि साधना, अर्थात दूसरों को साधना के बारे में जानकारी देना तथा उनकी साधना में सहायता करना । वर्तमान आपातकाल में साधना में व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति के संदर्भ में व्यष्टि साधना का महत्त्व ३५ प्रतिशत है, जबकि समष्टि साधना का महत्त्व ६५ प्रतिशत है । समष्टि साधना करने से व्यष्टि साधना भी होती है ।
४ अ. व्यष्टि और समष्टि साधना : इनके विषय में संक्षेप में बताता हूं ।
४ अ १. व्यष्टि साधना
अ. नामसाधना : नामजप एक ऐसी साधना है, जिसे पूरे दिन किया जा सकता है । इससे मन विभिन्न विषयों में नहीं भटकता व साधनारत रहता है । वयोवृद्ध एवं बीमार व्यक्तियों को भी नामजप करना सिखाएं, जिससे उनका मन बीमारी के विचारों से दूर रहेगा । बच्चों को भी नामजप सिखाएं । उन्हें उसका पूरे जीवन उपयोग होगा ।
४ अ २. समष्टि साधना
अ. सत्संग : यदि आपके मन में साधना, अध्यात्म आदि विषयों के बारे में प्रश्न हैं तो उनके उत्तर सत्संग में मिलते हैं । आध्यात्मिक दृष्टिकोण सीखने से साधना अच्छी होती है ।
नामजप करना और सत्संग में जाना, ये व्यष्टि साधना हैं; परंतु समष्टि साधना के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करते हैं ।
आ. सत्सेवा : अध्यात्मप्रसार और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के संदर्भ में विभिन्न सेवाओं में भाग लेना या दूसरों को सहभागी करना, समष्टि साधना है । इसके अनुसार शारीरिक सेवा करना; उदा. हिन्दू राष्ट्र-स्थापना का कार्य करनेवाली संस्था के विभिन्न आश्रमों में शारीरिक सेवाओं में सम्मिलित होना, समष्टि साधना करनेवाले संतों की मालिश करना, अपने क्षेत्र के मंदिरों एवं तीर्थस्थलों की स्वच्छता करना, समाज में जागरूकता लाने हेतु अध्यात्म व हिन्दू राष्ट्र-स्थापना से संबंधित विषयों के पत्रक समाज में वितरित करना आदि, मानसिक-बौद्धिक स्तर पर सेवा करना, उदा. सत्संग लेना, स्वभावदोष-निर्मूलन सिखाना, साधना सिखाना आदि और आध्यात्मिक स्वरूप की सेवाएं करना, उदा. आध्यात्मिक उपचार, जप ढूंढना आदि विषय दूसरों को सिखाना, ये सभी समष्टि साधना के अंतर्गत आते हैं । साधक ये सभी सेवाएं कर रहे हैं । इसलिए सनातन का कार्य आगे भी चलता रहेगा । समाज के अधिकांश संत ऐसे साधक तैयार नहीं करते, इसलिए उनके पश्चात उनका कार्य बंद हो जाता है ।
इ. व्यष्टि और समष्टि साधना सिखाने हेतु शिविर आयोजित करना : यह भी महत्त्वपूर्ण है । जो लोग यह सब करने की इच्छा रखते हैं, उनके लिए विभिन्न शिविरों का आयोजन कर उसमें साधना का सैद्धांतिक और प्रायोगिक प्रशिक्षण देना, आवश्यकता के अनुसार प्रायोगिक कृतियों के ऑडियो और वीडियो दिखाना, ऐसा आयोजन किया जा सकता है । इन शिविरों के आयोजन में सनातन संस्था सभी की सहायता करेगी ।
यह कार्य आप कहां-कहां करेंगे, इसका ब्यौरा समय-समय पर जिले के साधकों को दें ! इससे उन्हें भी आपके और अन्यों के शेष क्षेत्रों में आयोजन करना सरल होगा ।
४ आ. धर्मसंस्थापना के कार्य में भाग लेना, समष्टि साधना है ! : हिन्दू राष्ट्र-स्थापना हेतु कार्य करना, समष्टि साधना के अंतर्गत आता है; क्योंकि यह धर्मसंस्थापना का कार्य ईश्वरीय है । आज सनातन संस्था, हिन्दू जनजागृति समिति, सनातन प्रभात और महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, इन संस्थाओं का जो कार्य चल रहा है, उसका एकमात्र उद्देश्य है धर्मसंस्थापना । इसीलिए इस कार्य में भाग लेना भी समष्टि साधना के अंतर्गत आता है । वर्तमान विज्ञान युग में शोधपरक अध्ययन कर अध्यात्म का महत्त्व समझाना सरल होता है । इसके लिए सनातन संस्था एवं महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय अध्यात्म से संबंधित विभिन्न पहलुओं का वैज्ञानिक पद्धति से और उपकरणों के माध्यम से शोध कार्य कर रही हैं । जो लोग आध्यात्मिक शोध कार्य करने में रुचि रखते हैं, वे भी सनातन संस्था के इस कार्य में सहभागी हो सकते हैं । आय का कोई स्रोत न होते हुए भी राष्ट्र एवं धर्म के लिए सनातन प्रभात नियतकालिक गत २५ वर्ष से कार्यरत हैं । यह कार्य भी साधकों के कारण हो रहा है । इस कार्य में भी आप सहभागी हो सकते हैं ।
इसलिए इस कार्यक्रम के उपरांत घर लौटने पर जो लोग साधना, अध्यात्मप्रसार या हिन्दू राष्ट्र-स्थापना का कार्य करने की इच्छा रखते हैं, वे सनातन के स्थानीय जिम्मेदार साधकों से मिलकर उन्हें, ‘आप किस प्रकार के समष्टि से संबंधित कार्याें में भाग ले सकते हैं’, यह बताएं और उनकी सूचना के अनुसार नियोजन करें ।
५. भावी आपातकाल और जीवनरक्षा की कृतियां !
अब आनेवाले आपातकाल के विषय में बताता हूं । वर्तमान वैश्विक परिस्थिति को देखते हुए विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के द्वार पर खडा है । भारत-पाक सीमा पर तनाव से थोडी-बहुत युद्ध जैसी स्थिति हम सभी इस समय अनुभव कर रहे हैं । अनेक संतों ने कहा है कि जल्द ही अत्यंत भीषण आपातकाल आनेवाला है । युद्ध, गृहयुद्ध और प्राकृतिक आपदाओं का यह काल होगा । इसमें पृथ्वी के अनेक गांव, नगर और देश नष्ट हो जाएंगे तथा करोडों लोग मृत्यु को प्राप्त होंगे ।
५ अ. आपातकाल से पहले, अर्थात विश्वयुद्ध से पहले समष्टि साधना के रूप में सीखने योग्य कृतियां : अब हम देखेंगे । आपातकाल से पहले दूसरों का रक्तचाप (बीपी) जांचना, प्राथमिक उपचार या पट्टी करना आदि बातें सीखी जा सकती हैं । इससे प्रत्यक्ष आपातकाल में डॉक्टर की प्रतीक्षा किए बिना आप रोगी की सहायता कर सकेंगे और अन्यों की चिकित्सकीय दृष्टि से सहायता कर सकेंगे ।
५ आ. स्वरक्षा और हिन्दुओं की सुरक्षा के लिए रात को अपने गांवों या क्षेत्र में पहरा देना : यह भी महत्त्वपूर्ण है । बुरे समय में रात को घरों की लूट, हमले आदि घटनाएं घटती हैं । ऐसे समय में रात को अपने गांवों या क्षेत्र में पहरे का नियोजन करने से ऐसी घटनाएं टाली जा सकती हैं ।
५ इ. आपातकाल में रक्षा हेतु साधना करना आवश्यक : इस आपातकाल में या किसी भी संकट से तर जाने के लिए साधना करना आवश्यक है । हम साधना कर सात्त्विक बने, तो भगवान ही हमारी देखभाल करते हैं । गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है – ‘न मे भक्तः प्रणश्यति ।’ अर्थात ‘मेरे भक्त का नाश नहीं होगा ।’ संक्षेप में कहें, तो आपातकाल में अपनी रक्षा के लिए भक्त बनना आवश्यक है । यहां ध्यान देनेयोग्य है कि भगवान का भक्त बनने के लिए भगवान के लिए अपने तन, मन और धन का त्याग करना आवश्यक होता है । हमारे संतों ने यही कर ईश्वरीय कृपा प्राप्त की है ।
वर्तमान में प्रारंभ हुए आपातकाल की तीव्रता आगे दिन-प्रतिदिन बढती ही जाएगी । अतः आनेवाले आपातकाल में सुरक्षित रहने हेतु अभी से सभी को शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक, तीनों स्तरों पर अपनी, परिवार, गांव व राष्ट्र की तैयारी करना आवश्यक है !
६. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की प्रक्रिया
हिन्दू राष्ट्र-स्थापना का काल निकट आ गया है । आपातकाल समाप्त होने के बाद आगे ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित होगा । यह हिन्दू राष्ट्र प्रथम मानसिक स्तर पर होगा । वह आध्यात्मिक स्तर पर अर्थात रामराज्य जैसा बनने के लिए आगे ८० वर्ष का समय लगेगा । वर्तमान पीढी धर्म के विषय में जागृत हो रही है, जिससे आगे की पीढियां धर्माचरण करनेवाली, अर्थात सात्त्विक बनेंगी । रामराज्य आने के लिए राष्ट्र के ५०% लोगों का साधना करना आवश्यक है । साधना से लोग सात्त्विक बनेंगे, तब जाकर हिन्दू राष्ट्र में वास्तविक रामराज्य आएगा । ऐसा हुआ, तो यह प्रक्रिया हिन्दू राष्ट्र-स्थापना की तुलना में ५०% सरल होगी; क्योंकि उस काल में अधिकांश हिन्दू ही साधक होंगे ।
६ अ. हिन्दू राष्ट्र रामराज्य जैसा बनने हेतु भी साधना आवश्यक ! : वर्तमान काल में केवल एक चौथाई से आधा प्रतिशत लोग ही तन, मन और धन का त्याग कर सच्ची साधना करते हैं । संक्षेप में कहें, तो आपातकाल से लेकर हिन्दू राष्ट्र स्थापित होना और उसके आगे वह हिन्दू राष्ट्र रामराज्य जैसा बनना – इसके लिए सभी का साधना करना आवश्यक है ।
७. समापन
शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर राष्ट्र की स्थापना कैसे करनी है, यह आप जानते होंगे । आज आपको पता चला होगा कि यह कार्य आध्यात्मिक स्तर पर कैसे करना है । अंत में सभी से इतना ही कहना चाहूंगा कि अपने मनुष्य जन्म का कल्याण करने के लिए और हिन्दू राष्ट्र-स्थापना हेतु साधना कीजिए ।
उपस्थित सभी साधना कर आध्यात्मिक उन्नति करें व हिन्दू राष्ट्र-स्थापना करने हेतु सक्रिय हों, इसके लिए मैं मेरे गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी के चरणों में प्रार्थना कर मेरी वाणी को विराम देता हूं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?