मंदिरों में ‘सशुल्क दर्शन सेवा’ की सुविधा बंद करें तथा देवस्थानों में राजनीतिक नियुक्तियां न हों ! – सुनील घनवट, राष्ट्रीय संगठक, महाराष्ट्र मंदिर महासंघ

‘विश्वस्त’ (ट्रस्टी) के रूप में श्रद्धालु की नियुक्ति करने की मांग !

नाशिक – ‘सशुल्क दर्शन सेवा’ (‘पेड दर्शन’) अनुचित है तथा इससे श्रद्धालुओं में भेदभाव की भावना उत्पन्न होती है । सुदूर क्षेत्रों से आने वाले जिन भक्तों के पास धन नहीं है, वे क्या करें ? धनाभाव के कारण दर्शन से वंचित किया जाना, उनकी श्रद्धा का अपमान है तथा संविधान द्वारा प्रदत्त मूलभूत संवैधानिक धार्मिक अधिकारों का हनन है । ईश्वर की दृष्टि में निर्धन तथा धनवान सभी समान हैं, अतः प्रत्येक के लिए दर्शन की पद्धति एक समान होना अपेक्षित है । सशुल्क दर्शन के कारण पास के कालाबाजारी की प्रवृत्ति सभी स्थान पर पनप रही है । अतएव नाशिक, तुलजापुर सहित राज्य के सभी सरकारीकरण हुए मंदिरों में ‘सशुल्क दर्शन सेवा’ की सुविधा बंद की जाए, ऐसी मांग महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री. सुनील घनवट ने एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से की है ।

इस पत्रक में कहा गया है कि :

१. त्र्यंबकेश्वर (नाशिक) स्थित ज्योतिर्लिंग मंदिर संस्थान में श्रद्धालुओं की आर्थिक लूट करने के प्रकरण में शरद पवार गुट के प्रदेश युवक कार्याध्यक्ष एवं मंदिर संस्थान के विश्वस्त पुरुषोत्तम कडलग सहित गोटीराम मनाजी पेहरे एवं अभिषेक कडलग को पुलिस ने बंदी बनाया है ।

२. त्र्यंबकेश्वर में २०० रुपये का आधिकारिक पास होने पर भी १० मिनट में दर्शन का प्रलोभन देकर श्रद्धालुओं से ३ से १२ सहस्त्र रुपये मांगे जाते हैं, ऐसा प्रकरण सामने आया है । यही प्रकार तुलजापुर स्थित तुलजाभवानी मंदिर में हो रहा है, जहां २०० रुपये का ‘पास’ देकर विशेष दर्शन कराया जाता है । यही ‘पास’ नवरात्रोत्सव में ३०० रुपये, ५०० रुपये तथा १ सहस्त्र रुपये कर दिया जाता है । यहां भी अनेक बार अतिरिक्त शुल्क लेकर भक्तों को दर्शन के लिए छोडने की स्वयं भक्तों द्वारा ही शिकायतें प्राप्त हुई हैं ।

३. जब मंदिर सरकार अथवा राजनीतिक नियुक्ति वाली समितियों के नियंत्रण में जाते हैं, तब वहां भक्ति के स्थान पर व्यापारिक वृत्ति का प्रवेश हो जाता है । त्र्यंबकेश्वर की घटना मंदिर सरकारीकरण के ही दुष्परिणाम हैं । ‘अतिथि देवो भव’ मानने वाली भूमि में श्रद्धालुओं को लूटने के लिए विश्वस्त ही तंत्र चलाएं, इससे बडा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता !

४. त्र्यंबकेश्वर देवस्थान में विश्वस्त की नियुक्ति में बडे आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप पूर्व विश्वस्तों ने लगाया है । अतः इस ‘पेड’ (सशुल्क) दर्शन की गहन जांच कर इसमें अन्य किसकी संलिप्तता है की भी जांच होना चाहिए ।

५. भविष्य में ऐसे प्रकरणों को रोकने हेतु देवस्थानों में ‘विश्वस्त’ के रूप में किसी भी राजनीतिक दल के पदाधिकारी की नियुक्ति करने के स्थान पर वहां ईश्वर के भक्त-श्रद्धालु की नियुक्ति होना आवश्यक है । आगामी समय में देवस्थान के संविधान में ऐसा परिवर्तन किया जाना चाहिए ।

संपादकीय भूमिका 

ऐसी मांग करने का समय हिन्दुओं पर क्यों आता है ? वास्तव में सरकार को स्वयं ही यह करना अपेक्षित है !