‘ॐ’कार से वात-पित्त-कफ का संतुलन होने से रोगमुक्त रह पाना संभव !

‘ॐ’कार के उच्चारण से वात, पित्त, कफ संतुलित रहता है । ‘अ’ का उच्चारण पेट से, जहां पित्त होता है, ‘उ’ का उच्चारण छाती से, जहां वात रहता है और ‘म’ का उच्चारण गले से होता है, जहां कफ होता है । ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’ कहते समय ये तीनों, अर्थात वात, पित्त, कफ के मूल स्थान संतुलित रहने में सहायता होती है । परिणामस्वरूप व्यक्ति को रोगमुक्त होने में सहायता मिलती है । (संदर्भ :‘प्रशांतजे योगा’ वीडियो)