
‘ॐ’कार के उच्चारण से वात, पित्त, कफ संतुलित रहता है । ‘अ’ का उच्चारण पेट से, जहां पित्त होता है, ‘उ’ का उच्चारण छाती से, जहां वात रहता है और ‘म’ का उच्चारण गले से होता है, जहां कफ होता है । ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’ कहते समय ये तीनों, अर्थात वात, पित्त, कफ के मूल स्थान संतुलित रहने में सहायता होती है । परिणामस्वरूप व्यक्ति को रोगमुक्त होने में सहायता मिलती है । (संदर्भ :‘प्रशांतजे योगा’ वीडियो)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !