
डॉ. जयंत आठवलेजी आपको मार्गदर्शक के रूप में मिले हैं; इसलिए ‘‘आप बहुत सौभाग्यशाली हैं, अतः आप उनका लाभ उठाइए’’, ऐसा प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा बताया जाना

‘वर्ष १९९१ में प.पू. भक्तराज महाराजजी से मिलने कांदळी गया था । उस समय उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘मैंने डॉक्टरजी को (प.पू. डॉ. आठवलेजी को) बहुत ज्ञान दिया है । कुछ सूक्ष्म से, तो कुछ स्थूल से ! अब उनकी बहुत अच्छी प्रगति हुई है ।
आप बहुत सौभाग्यशाली हैं; इसलिए आपको डॉ. जयंत आठवलेजी जैसे मार्गदर्शक मिले हैं । आप उनका लाभ उठाइए !’’
– श्री. अरविंद परळकर (आयु ६५ वर्ष), मुंबई (११.३.२०२५)
‘उच्च शिक्षाप्राप्त कोई व्यक्ति अध्यात्मशास्त्र सिखाते हैं’, यह ज्ञात होने पर विदेशी लोग भी अध्यात्मशास्त्र पर विश्वास करेंगे’!

जो संत अल्पशिक्षित होते हैं, उनके आध्यात्मिक ज्ञान का उपहास शिक्षित लोग उडाते हैं ! तथा ‘यह सब अंधविश्वास है’, ऐसा बोलते हैं । डॉक्टरजी ने विज्ञान के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की है । शरीरशास्त्र, रोगनिदान एवं औषधिशास्त्र का अध्ययन किया है । ‘ऐसा एक व्यक्ति हमें अध्यात्मशास्त्र सिखाता है’, यह ज्ञात होने पर विदेशी लोग भी अध्यात्मशास्त्र पर विश्वास करेंगे ।’’ (वास्तव में भी ७६ राष्ट्रों के साधक डॉ. आठवलेजी से साधना का मार्गदर्शन लेते हैं ।)
– श्री. अरविंद परळकर (आयु ६५ वर्ष), मुंबई (११.३.२०२५)
डॉक्टरजी (डॉ. जयंत आठवलेजी) सदैव ही ‘डॉक्टरजी’ के नाम से ही जाने जाएंगे !’

उस समय वहां डॉ. (श्रीमती) श्रद्धा गांधी (विवाहपूर्व कु. कला आठवले, जो सद्गुरु (स्व.) डॉ. वसंत बाळाजी आठवलेजी की बडी बेटी तथा सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की भांजी हैं ।) थीं । उन्होंने प.पू. भक्तराज महाराजजी को बताया, ‘‘आपके गुरुदेवजी ने आपका नामकरण किया ‘भक्तराज महाराज’, तो उस प्रकार आप डॉ. आठवलेजी का भी नामकरण कीजिए ।’’ उस पर प.पू. भक्तराज महाराजजी ने कहा, ‘‘वे सदैव ही ‘डॉक्टर’ नाम से ही जाने जाएंगे ।
– श्री. अरविंद परळकर (आयु ६५ वर्ष), मुंबई (११.३.२०२५)
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शिष्य के जीवन में गुरु का और भक्त के जीवन में ईश्वर का महत्त्व अनन्य (असाधारण) है । गुरु शिष्य को पग-पग पर मार्गदर्शन प्रदान कर उसे आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करते हैं । गुरु शिष्य के जीवन का कायाकल्प (पूर्ण परिवर्तन) कर देते हैं । फलस्वरूप, एक प्रकार से शिष्य का पुनर्जन्म ही होता है । ऐसे गुरुदेव के प्रति कितनी भी कृतज्ञता व्यक्त की जाए, वह न्यून (कम) ही है ! कृतज्ञभाव के कारण शरणागति (समर्पण) शीघ्र उत्पन्न होती है और गुरु अथवा ईश्वर परम दयालु होने के कारण शरणागतों पर शीघ्र ही कृपा करते हैं । |
गुरुनिष्ठा अजरामर होती है !
गुरुनिष्ठा अजरामर ‘गुरुनिष्ठा अजरामर (अमर) होती है । इस निष्ठा के कारण देहभान और ममता को भूल जाने की इच्छा होती है । मान-अपमान की चिंता करने का मन नहीं होता । दया, क्षमा और शांति की भावनाएं स्वतः ही जागृत हो जाती हैं ।’
(संदर्भ : सद्गुरुबोधामृत)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के आध्यात्मिक स्तर के अनुसार, उनके विभिन्न समय के छायाचित्र से उनके सगुण-निर्गुण स्पंदनों का सद्गुरु डॉ. मुकुल गाडगीळजी द्वारा किया अभ्यास