संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।

हमारे जीवन में गुरु का महत्त्व कितना है, यह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता । सनातन धर्म के अनुसार गुरु का महत्त्व लौकिक दृष्टि से अल्प, तो पारमार्थिक दृष्टि से सर्वोच्च है । इसलिए उनके प्रति कितनी भी कृतज्ञता व्यक्त की जाए, वह अल्प ही सिद्ध होती है । गुरुपूर्णिमा गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, परंतु प्रत्येक शिष्य को इस बात का भान होता है कि उसके द्वारा व्यक्त की जानेवाली कृतज्ञता की अपनी सीमाएं हैं । सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने ‘गुरुकृपायोग’ का मार्ग बताया है, जिसके माध्यम से आज सहस्रों साधक साधना कर रहे हैं । इस योग के द्वारा १२५ से अधिक साधक संतपद तक, १० से अधिक साधक सद्गुरुपद तक तथा एक साधक परात्पर गुरु पद तक पहुंच चुके हैं । इससे गुरु की महिमा स्पष्ट होती है । तन, मन और धन को गुरुचरणों में समर्पित करना ही साधक का ध्येय होता है । ऐसा करने पर ही गुरुकृपा का प्रवाह आरंभ होता है और वह निरंतर बना रहता है । इससे साधक आध्यात्मिक स्तर पर प्रगति करता है, अर्थात ईश्वर की ओर अग्रसर होता है और अंततः ईश्वर में एकरूप हो जाता है । इस अवस्था तक पहुंचने के लिए मार्गदर्शन करनेवाले तथा कृपा करनेवाले गुरु का मिलना व्यक्ति के पूर्वसंचित पुण्य के बिना संभव नहीं होता । गुरुतत्त्व जीव का निरंतर मार्गदर्शन करता है और उसे अध्यात्म में आगे बढाता रहता है । व्यावहारिक जगत के अर्थात लौकिक अर्थ में गुरु कहे जानेवाले शिक्षक ऐसा नहीं कर सकते । इसलिए ऐसे गुरु की अपेक्षा ईश्वरप्राप्ति करानेवाले गुरु अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध होते हैं । यह तुलना नहीं है, अपितु उनकी मर्यादा स्पष्ट करना आवश्यक है । मोक्षगुरु प्राप्त होने के उपरांत उनके मार्गदर्शनानुसार साधना कर आध्यात्मिक प्रगति करना, यही उसके आगे की प्रक्रिया होती है । इसके लिए तीव्र लगन की आवश्यकता होती है । यह लगन उत्पन्न करने के लिए गुरु के प्रति श्रद्धा बढानी पडती है । श्रद्धा बढने पर गुरुकृपा प्राप्त करने की लगन बढती है और जब गुरुकृपा प्राप्त होती है, तब कृतज्ञता स्वतः ही व्यक्त होने लगती है । केवल गुरुपूर्णिमा के दिन कृतज्ञता व्यक्त नहीं होती, प्रत्येक क्षण जीव कृतज्ञभाव में रहने का प्रयत्न करता है । उसे अनुभव होता है कि उसका संपूर्ण जीवन गुरुकृपा से ही चल रहा है । उसका गृहस्थ जीवन, व्यवहार तथा पालन-पोषण भी गुरुकृपा से ही संचालित हो रहा है । यह भाव निरंतर रहने से उसके मन में कृतज्ञता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रहता । भारत में गुरु-शिष्य संबंध के असंख्य उदाहरण हैं । ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं, जिनमें गुरु ने शिष्य पर कृपा कर उसे किसी विशेष कार्य की आज्ञा दी और शिष्य ने अपना सर्वस्व अर्पित कर उस कार्य को पूर्ण किया । गुरु पहले जीव से साधना करवाते हैं और उसके पश्चात उसी से गुरुकार्य भी करवाते हैं । प्रत्येक शिष्य के लिए गुरुकार्य भिन्न-भिन्न हो सकता है । वही कार्य आगे चलकर गुरुसेवा बन जाता है । गुरु भले ही देह से विद्यमान न हों, तथापि शिष्य के लिए उन्होंने जो सेवा निर्धारित की है, वही उसके लिए गुरु का स्वरूप होती है । उसी सेवा के माध्यम से वह गुरु के आंतरिक सान्निध्य में रहता है । उसी के द्वारा गुरु उसका मार्गदर्शन करते हुए उसे आगे बढाते हैं तथा समाज का कल्याण करते हैं ।

गुरु के समष्टि स्वरूप की सेवा ही शीघ्र गुरुकृपा प्राप्त करने का मार्ग है !

वर्तमान काल के अनुसार धर्मसंस्थापना करना ही समष्टि गुरुसेवा है । यह किसी एक देहधारी गुरु की सेवा नहीं, अपितु गुरुतत्त्व की सेवा है । श्रीकृष्ण-अर्जुन के गुरु-शिष्य संबंध में महाभारत के युद्ध के समय युद्ध करना ही गुरु की आज्ञा अर्थात गुरुसेवा थी और वह भी अर्जुन केवल गुरु की कृपा से ही पूर्ण कर सका । यहां प्रत्यक्ष गुरु के रूप में स्वयं ईश्वर मार्गदर्शन कर रहे थे । आचार्य चाणक्य के मार्गदर्शनानुसार चंद्रगुप्त ने अधर्मी नंद वंश का विनाश किया और भारत को एकसूत्र में संगठित किया । छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपना राज्य समर्थ रामदासस्वामीजी को समर्पित करने के उपरांत समर्थ की आज्ञा से गुरु के राज्य के रूप में शासन किया । रामकृष्ण परमहंसजी के आशीर्वाद से स्वामी विवेकानंदजी ने संपूर्ण विश्व में हिन्दू धर्म का प्रचार किया । भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है, ‘जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेकर अधर्म का विनाश करता हूं तथा धर्म की पुनर्स्थापना करता हूं ।’ भगवान का यही कार्य समयानुसार गुरु संपन्न करते हैं । शिष्य डॉ. आठवले ने अपने गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी की आज्ञा से सनातन संस्था की स्थापना की और भारत तथा विदेशों में सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार आरंभ हुआ । गुरुकृपायोग के अनुसार साधना द्वारा आध्यात्मिक उन्नति कैसे की जा सकती है, इसका मार्गदर्शन किया जाने लगा और उसके माध्यम से एक सहस्र से अधिक साधक जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर संतत्व की ओर अग्रसर हुए हैं । भविष्य में भी इस मार्ग से अनेक साधक आध्यात्मिक प्रगति करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है । इसके साथ ही ईश्वरीय राज्य अर्थात हिन्दू राष्ट्र, सनातन राष्ट्र की स्थापना का गुरुकार्य ही गुरुसेवा के रूप में किया जा रहा है । प.पू. भक्तराज महाराजजी की आज्ञा से ही यह कार्य किया जा रहा है और वही इसे पूर्णता तक पहुंचाएंगे । इसके लिए सहस्रों साधक तन, मन और धन का त्याग कर निरंतर प्रयासरत हैं । गुरु केवल वटवृक्ष के नीचे बैठकर शिष्यों का मार्गदर्शन नहीं करते, अपितु वे ईश्वर की आज्ञा से ‘शापादपि शरादपि’ की नीति के अनुसार धर्मरक्षा और धर्मसंस्थापना का कार्य करते हैं तथा असंख्य जीवों से भी वह कार्य करवाते हैं । एक ही समय में व्यष्टि साधना का मार्ग बतानेवाले तथा समष्टि साधना करवानेवाले गुरु अत्यंत दुर्लभ होते हैं । ऐसे गुरु के प्रति शब्दों में कृतज्ञता व्यक्त करना वास्तव में असंभव है । समयानुसार ऐसा कार्य स्वयं ईश्वर अवतार लेकर या गुरु, संत आदि के माध्यम से पूर्ण करवाते हैं । अर्थात यह ईश्वरीय कार्य होता है । यह पूर्वकाल में भी हुआ है और भविष्य में भी होता रहेगा । प्रत्येक युग में यह कार्य होता रहेगा । इसलिए गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर कृतज्ञता व्यक्त करते समय यह प्रार्थना करना आवश्यक है कि गुरु द्वारा बताई गई व्यष्टि और समष्टि साधना हम आगामी काल में गुरु की अपेक्षानुसार कर पाएं तथा हमारे भीतर भाव, लगन और शरणागति निरंतर बढती रहे । यदि हम ऐसा भाव रखकर प्रयास करें कि केवल उनकी कृपा से ही यह प्रार्थना पूर्ण हो सकती है, तो गुरु अनुभूति प्रदान करते हैं यह हमारे ध्यान में आएगा । गुरु केवल जीव के शरीर तक सीमित नहीं होते, अपितु उसके आत्मतत्त्व के उद्धार के लिए कार्यरत रहते हैं; इसलिए वे मृत्यु के पश्चात की यात्रा भी संपन्न करवाते हैं । वर्तमान में आपातकाल होने के कारण व्यष्टि और समष्टि, दोनों स्तरों पर संकटों की शृंखला ही जारी है । ईश्वर के धर्मरक्षा और धर्मसंस्थापना के कार्य में अनेक संकटों का सामना करना पडता है; तथापि गुरु जीव को इन सब संकटों से पार ले जाते हैं । इसे स्मरण रखते हुए निरंतर शरणागतभाव और कृतज्ञभाव में रहने के लिए अपने प्रयासों की पराकाष्ठा करना आवश्यक है । गुरुपूर्णिमा के इस मंगलमय अवसर पर आइए, हम श्री गुरु के चरणों में शरणागत होकर प्रार्थना करें कि उनकी कृपा से हम ऐसे ही दृढतापूर्वक, निरंतर और भावपूर्ण प्रयास कर पाएं !