
१. प्रीति
‘प्रीति’ ईश्वर का स्थायीभाव है । मां जगदंबा करुणावत्सल हैं । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी भी वैसी ही हैं । उनकी प्रीति की गहनता केवल साधकों तक सीमित नहीं है, अपितु ‘संपूर्ण विश्व को ही कैसे प्रेम दिया जा सकता है ?’, यह उनका विचार होता है ।
२. सहजता का जीता-जागता रूप !
‘२४ घंटे अध्यात्म कैसे जीना चाहिए ?’, इसका मूर्तिमंत उदाहरण हैं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी ! वे प्रत्येक बात का अध्यात्मीकरण करती हैं । वे प्रत्येक कृति को श्री गुरु अथवा ईश्वर से जोडकर उससे सरल अध्यात्म साधती हैं । उनकी सहजतापूर्ण बातों से भी ज्ञान एवं भक्ति का अमृतरस प्रवाहित होता है । उनके माध्यम से श्री गुरुदेवजी की ज्ञानशक्ति कार्यरत हुई है । उनकी अमृतवाणी सुननेवालों के साधना के दृष्टिकोण पक्के हो जाते हैं । उनकी बातों से साधकों को केवल साधना का ही नहीं, अपितु जीवन जीने का भी रहस्य ज्ञात होता है । उनके कारण साधकों को यह ज्ञात होता है कि हम जिसे कठिन समझ रहे थे, वह साधना एवं अध्यात्म कितना सरल है !
३. शारीरिक यातनाएं झेलकर भी विश्वकल्याण हेतु अविरत भ्रमण !
सप्तर्षि बताते हैं, ‘वास्तव में इस प्रकार दूर-दूर तक भ्रमण करना संभव नहीं है; परंतु कार्तिकपुत्री (सप्तर्षि श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी को ‘कार्तिकपुत्री’ संबोधित करते हैं ।) एक स्त्री होते हुए भी भ्रमण कर रही हैं । ’ संत तुकाराम महाराजजी के एक इस वचन के अनुसार श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी को अनेक प्रकार के शारीरिक कष्ट होते हैं; परंतु वे ये शारीरिक यातनाएं झेलकर अविरत दैवीय भ्रमण कर रही हैं ।
देहबुद्धि नष्ट हो जाने के कारण वे देह के सभी बंधनों को तोडकर देहमर्यादा के पार पहुंच चुकी हैं । कोई माता जैसे स्वयं का सब दुख-कष्ट भूलकर अपने बच्चों के लिए परिश्रम उठाती है, उसी प्रकार श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी अपने विश्वपरिवार हेतु तथा इस विश्वपरिवार में समाहित सभी बालकों के लिए अविरत परिश्रम कर रही हैं । उसके कारण ही वे बहुत ही अल्पावधि में ‘श्रीचित्शक्ति’ तथा ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी’ इस पद तक पहुंच गई हैं ।
४. महर्षियों का आज्ञापालन ही श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी का जीवन !
प्रतिक्षण वर्तमान में रहकर महर्षियों की आज्ञा के अनुसार वे विश्वकल्याण हेतु परिश्रम कर रही हैं, जिसका कोई तोड नहीं है । उनके स्थूल कार्य के साथ सूक्ष्म के कार्य की व्यापकता भी प्रचंड है । उनका त्याग तथा उनके कार्य के लिए कोई भी उपाधि देना संभव नहीं है ।
५. आपातकाल से पूर्व दुर्लभ वस्तुओं का जतन करने का कठिश्र कार्यं करने हेतु ईश्वर के द्वारा श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी का चयन किया जाना
सत्ययुग में महाप्रलय के समय भगवान श्रीविष्णु ने ‘मत्स्यावतार’ धारण कर सप्तर्षियों के माध्यम से समस्त सृष्टि के प्रत्येक घटक के बीज एकत्रित कर उनकी रक्षा की थी । अब इस कलियुग में श्रीविष्णु का ‘जयंतावतार’ चल रहा है । इस समय में भी आपातकाल से पूर्व सप्तर्षियों की आज्ञा के अनुसार श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी का दैवीय भ्रमण चल रहा है तथा इसमें वे अनेक तीर्थस्थलों में स्थित दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह कर रही हैं । इस विशाल कार्य हेतु श्रीविष्णु की चैतन्यशक्ति ही समर्थ होने से ईश्वर ने इस कार्यं के लिए श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी को चुना है । उनके जैसा कार्य अन्य कोई नहीं कर पाएगा; इसीलिए सप्तर्षियों ने उन्हें ‘श्रीदेवी’ कहकर गौरवान्वित किया है, इसमें आश्चर्य कैसा !
उनमें विद्यमान इस दिव्यता का अनुभव करते हुए यह कहने का मन होता है, ‘दिव्यता की जहां प्रतीति, वहां मेरे कर जुडते ।’
श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी में कार्यरत अवतारी तत्त्व का लाभ सर्वत्र के साधकों को निरंतर होता रहे, यह सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी के चरणों में प्रार्थना है !
श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी के ५४वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में उनमें विद्यमान देवीतत्त्व को हम सभी का कृतज्ञतापूर्वक प्रणाम !’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ
| सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है । |
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