प.पू. भक्तराज महाराजजी के आनंददायक सान्निध्य की कुछ अविस्मरणीय स्मृतियां तथा अनुभव की गई उनकी कृपा !

१३.११.२०२५ को सनातन के श्रद्धास्रोत प.पू. भक्तराज महाराजजी का महानिर्वाण दिवस है, उस उपलक्ष्य में…

प.पू. भक्तराज महाराज

१. अनंत चतुर्दशी के भंडारे के समय सामग्री अल्प होते हुए भी सेवा से सभी को आनंद मिलना

‘अनंत चतुर्दशी का भंडारा इंदौर की पालीवाल धर्मशाला में होता था । प.पू. भक्तराज महाराजजी ३ दिन तक यह भंडारा करते थे । उस समय धर्मशाला में पहंसुल, चाकू इत्यादि उपकरण नहीं थे । कद्दू को हम ऊपर से नीचे फेंकते तथा तथा उनके टुकडे होने पर फर्श से उठाए टुकडे से उनके और छोटे-छोटे टुकडे कर उनकी सब्जी बनाते थे । उन ३ दिनों में आनंद ही आनंद होता था ।

२. प.पू. भक्तराज महाराज बाहर से कटहल कांटे की भांति; परंतु अंदर से मुलायम होने से उनका सान्निध्य मिलने की इच्छा होना

प.पू. भक्तराज महाराजजी वैसे शांत स्वभाव के थे; परंतु वे ‘कब किस पर तथा किसलिए क्रोधित हो जाएंगे’, यह अनुमान लगाना असंभव था । वे किसी कारण से भी क्रोधित हों, तो उनके क्रोध के सामने टिक पाना कठिन होता था । उन्हें समझाना अथवा कुछ बताना असंभव रहता था; परंतु क्रोधित होने के कुछ ही समय पश्चात वे इतने शांत हो जाते थे तथा इतनी मीठी-मीठी बातें करते थे कि उससे ऐसा लगता था, ‘हम कोई सपना तो नहीं देख रहे हैं न?’ कुछ समय पूर्व के दुर्वासा मुनि तथा आज के एकदम से शांत एवं सौम्य महाराजजी क्या एक ही थे ?’

प.पू. भक्तराज महाराजजी कटहल की भांति थे ! कटहल जैसे ऊपर से कंटीला; परंतु उसके अंदर जैसे बहुत मीठा मगज होता है, बिलकुल वैसे ही थे ! उसके कारण ही उनका सान्निध्य हमें बहुत अच्छा लगता था ।

३. प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा भक्तों को  प्रसाद देने का मन पर अंकित किया हुआ महत्त्व !

एक बार अनंत चतुर्दशी के भंडारे के ३-४ दिन पश्चात दोपहर के समय प.पू. भक्तराज महाराजजी सोए थे । मैं उनके पैरों के पास और छोटू साळसणकर सामने की दीवार पर टेककर खडा था । कुछ समय पश्चात महाराजजी जागे तथा छोटू से कहने लगे, ‘‘अरे, तुमने उस नेमीचंद को प्रसाद पहुंचाया क्या ?’’ उस पर छोटू ने कोई उत्तर नहीं दिया । तब महाराजजी ने क्रोधित होकर पुनः पूछा, तब छोटू ने उत्तर दिया, ‘प्रसाद समाप्त हो गया’ । उसका वाक्य पूरा होते ही महाराजजी ने मुझे थप्पड लगाया तथा क्रोधित होकर गालियां देते हुए कहा, ‘‘अरे, वह नेमीचंद तुम्हारे प्रसाद का भूखा है क्या ? या क्या उसे खाने के लिए नहीं मिलता ? अरे, तुम लोग भक्तराज महाराज को तथा उनके भक्तों को क्या समझते हो ? अरे, वे भाव के भूखे तथा भक्तराज के प्रेम के भूखे हैं ! अरे नालायको, तुम्हें इतनी भी अकल नहीं है कि प्रसाद समाप्त हो गया है, तो बाजार से चार आने की नुक्ती (बुंदी) लाते, उसमें प्रसाद की नुक्ती के केवल ४ दाने मिलाकर उसे प्रसाद के रूप में देते । यह प्रसाद मिलते ही वह कितना आनंदित हो जाता !’’ इस प्रसंग से ‘प्रसाद का क्या महत्त्व है तथा उसके कारण लोग कैसे जोडे जाते हैं तथा उनकी भावनाएं कैसे संजोई जाती हैं’, इसकी शिक्षा मिली । तब से लेकर आज तक प.पू. बाबा के पुराने भक्तों को प्रसाद पहुंचाने का मेरा कार्य निरंतर चल रहा है और तब से मैं कभी किसी से नहीं कहता, ‘प्रसाद समाप्त हुआ’ ।

४. प्रीति की वर्षा करनेवाली आक्का !

कभी किसी कारणवश हमें रामजी भैया के पास जाने में विलंब होता, तो भाभी (आक्का अर्थात रामजी भैया की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला निरगुडकर) हमारी प्रतीक्षा करती थीं । बच्चों ने भोजन नहीं किया; इसलिए वे भी हमारे वहां जाने तक भोजन नहीं करती थीं तथा जब हम वहां जाते थे, तभी भोजन करती थीं । उसके साथ ही जब महाराजजी क्रोधित होते थे, उस स्थिति में वे हमारा पक्ष लेकर महाराजजी के क्रोध से हमें बचा लेती थीं । वे ही हमारी ढाल थीं । मैं अज्ञानी बालक उस माता की महिमा क्या गाऊं ?

५. श्री. गोविंद हिरवे की पत्नी को प.पू. बाबा की अगम्य लीला की हुई अनुभूति !

५ अ. बच्चों के उपनयन अनुष्ठान के लिए आलू एवं अन्य सामग्री लेने हेतु बाहर जाने से पूर्व प.पू. बाबा के दर्शन करने के लिए जाने से प्रत्येक बार हाट से आलू लाना लंबित रह जाना : मेरे बच्चों के उपनयन अनुष्ठान प.पू. भक्तराज महाराजजी के आशीर्वाद से संपन्न हुए । उस पर आधारित एक प्रसंग मुझे स्मरण होता है । उपनयन करना सुनिश्चित होने पर मेरी धर्मपत्नी प्रतिदिन समान एवं आलू खरीदकर लाने का हठ करती थी । मैं छुट्टी के दिन उसे लेकर हाट जाऊंगा, ऐसा निश्चित हुआ । मैंने उसे बताया, ‘हम महाराजजी के दर्शन कर निकलेंगे’; परंतु जब-जब हम महाराजजी के पास आते थे, तब दर्शन करने में कितना समय निकल जाता था, यह मेरे ध्यान में नहीं आता था, जिससे हाट जाना टल जाता था ।

५ आ. आलू खरीदकर लाना रह जाने से पत्नी का क्रोधित होना तथा प.पू. बाबा द्वारा ४ कट्टे (एक कट्टा अर्थात ५० किलो) आलू दिए जाने पर प.पू. बाबा की लीला उसके ध्यान में आना : एक बार मेरी पत्नी बहुत चिढकर मुझसे कहने लगी, ‘आज आपने मुझे आलू एवं अन्य समान खरीदकर नहीं दिया, तो मैं उपनयन संस्कार में भाग ही नहीं लूंगी । आप मुझे प.पू. बाबा के पास लेकर जाते हैं और वही रुक जाते हैं ।’ उस पर मैंने प.पू. बाबा की शपथ लेकर यह आश्वासन दिया, ‘आज मैं तुम्हें आलू अवश्य खरीदकर दूंगा ।’ मैं पत्नी के साथ पुनः महाराजजी के पास गया, उनके दर्शन किए तथा अंततः मैं उन्हें नमस्कार कर निकल रहा था, उस समय प.पू. बाबा ने मेरी पत्नी को रोककर श्री. बाबूराव घळसासी (नाना) को बुलाया तथा ४ कट्टे (एक कट्टा अर्थात ५० किलो) आलू भरकर टेंपो में रखने के लिए कहा । वो आलू कांदळी के खेत में आई पहली फसल थी । उसमें एक-एक आलू आधे या एक किलो का था । प.पू. बाबा ने जब आलू देने के लिए कहा, तब उसे भान हुआ और वह रोने लगी तथा उसने प.पू. बाबा को नमस्कार किया । उस समय प.पू. बाबा की लीला तथा वे मुझसे कितना प्रेम करते हैं, यह उसके ध्यान में आया । ‘प.पू. बाबा भक्तों की कितना ध्यान रखते हैं’, यह उसकी समझ में आया । प.पू. बाबा ने जो आलू दिए, उपनयन कार्यक्रम के बाद भी आलू शेष रह गए । उन आलू से बने पकौडों बहुत ही स्वादिष्ट थे ।

६. प.पू. भक्तराज महाराजजी के उत्तराधिकारी बन जाने के आरंभिक काल में यथासंभव उनकी आर्थिक सहायता करना

प.पू. भक्तराज महाराजजी के जीवन का वह काल (श्री अनंतानंद साईशजी के उत्तराधिकारी के रूप में उन्हें नियुक्त किए जाने के उपरांत का काल) आरंभिक काल होने के कारण प.पू. महाराजजी का पूरा कार्य उनके निकट के भक्तों पर निर्भर था । ऐसी स्थिति में सहायता के रूप में प.पू. बाबा को कार्यालय से बिना ब्याज के जितने पैसे मिलते थे, उदा. ‘त्योहारों के लिए (उत्सवों के लिए) एडवांस, ‘ग्रेन एडवांस’, ‘साइकिल एडवांस’ अथवा ३ महीने के पश्चात ‘जी.पी.एफ. एडवांस’, उनकी निकासी कर उन्हें देना, साथ ही सहकारी बैंक का सदस्य होने से जमानती (कुछ गिरवी रखकर) ऋण लेना तथा ६-७ सप्ताह उसे चुकाने के पश्चात पुनः उसका नवीनीकरण कर पैसे देना; इस प्रकार महाराजजी ने मुझसे यह आर्थिक सेवा करवा ली । उस समय महाराजजी को पैसों की बहुत आवश्यकता थी । वे कुछ भी कर सकते थे; परंतु अपनी शक्ति का उपयोग किए बिना भक्तों के कल्याण हेतु वे भक्तों से ही पैसे लेते थे ।

७. प.पू. बाबा द्वारा बुलाए जाने पर तत्काल उनके पास जाना

महाराजजी जब-जब मुझे बुलाते थे, चाहे वह समय कोई भी हो; मैंने उनके आज्ञापालन का प्रयास किया । उन्हें भी यह निश्चित रूप से ज्ञात था कि वे जब भी सुधाकर को बुलाएंगे, वह अवश्य आएगा  । पूजा करते समय महाराजजी का बुलावा आने पर मैं देवताओं की मूर्तियों को वैसे ही पानी में रखकर उनके पास जाता था । कार्यालय में महाराजजी का बुलावा आने पर मैं तत्काल छुट्टी लेता था, अन्यथा काम पर होते समय बीमारी का कारण देकर छुट्टी लेता था । भंडारे, भजन, मेले अथवा अन्य कोई उपक्रम होता, तब प्रत्येक बार छुट्टी नहीं मिलती थी । उस समय मैं डॉक्टर से स्वयं के बीमार होने का प्रमाणपत्र लेकर महाराजजी के पास जाता था । इस प्रकार अनेक बार छुट्टियां लेने से मेरी छुट्टी शेष नहीं रह पाती थी ।

८. सेवानिवृत्ति के समय शेष छुट्टियों का एक भी पैसा न मिलने का दुःख न होना तथा प.पू. बाबा का सत्संग करोडों रुपए से भी मूल्यवान प्रतीत होना

सेवानिवृत्ति के समय मेरे खाते में एक भी छुट्टी शेष न होने से मुझे छुट्टी का कोई पैसा नहीं मिला । मेरे साथ काम करनेवाले लोगों को शेष छुट्टियों के ३ से ४ लाख रुपए मिले; परंतु मुझे इस बात का लेशमात्र भी दुःख नहीं हुआ । उसके विपरीत मैं आनंद में ही था; क्योंकि किसी मोह में न फंसकर मुझे महाराजजी के सत्संग, उनकी निकटता, भजन, भंडारे तथा मेले का जो लाभ मिला, वह करोडों रुपए से भी अधिक मूल्यवान है ।

– श्री. गोविंद सदाशिव हिरवे (प.पू. भक्तराज महाराजजी के भक्त)

(साभार : ‘भक्तराज’)