नवरात्रि (२२ सितंबर से १ अक्टूबर) के उपलक्ष्य में…
शारदीय नवरात्रि उत्सव में पूरे भारत में अत्यंत उत्साह एवं भक्तिमय वातावरण में व्रत का पालन किया जाता है । माता जगदंबा की कृपा पाने हेतु श्रद्धापूर्वक उपवास आदि आराधना की जाती है । नवरात्रि की अवधि में घटस्थापना, मालाबंधन, अखंडदीप, सप्तशतीपाठ, गागर (घडा) फूंकना, डांडिया खेलना आदि कृत्य देवी के व्रत के ही विविध अंग हैं । इस लेख के माध्यम से देवी के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति में अधिकाधिक वृद्धि हो, ऐसी जगज्जननी श्री जगदंबा के चरणों में प्रार्थना है !

व्रत करने की पद्धति
यह व्रत कई परिवारों में कुलाचार के रूप में मनाया जाता है । आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन यह व्रत प्रारंभ होता है ।
१. घर में पवित्र स्थान पर एक वेदी बनाकर उस पर सिंहारूढ अष्टभुजादेवी की एवं यंत्र की स्थापना करें । यंत्र के समीप घट स्थापित कर उसकी एवं देवी की विधि-विधान से पूजा करें ।
२. नवरात्रि उत्सव में कुलाचार के अनुसार घटस्थापना एवं मालाबंधन करें । खेत की मिट्टी लाकर उससे उंगली के दो पोर इतना मोटा चौकोनी परत बनाकर उस पर (पांच अथवा) सात प्रकार के अन्न बीज बोएं । जौ, गेहूं, तिल, मूंग, राल, सांवा, चना, ये सप्तान्न हैं ।
३. नौ दिन तक प्रतिदिन कुमारिकापूजन कर उन्हें भोजन कराएं । सुहागिन अर्थात प्रकट शक्ति, तथा कुमारिका अर्थात अप्रकट शक्ति । प्रकट शक्ति का कुछ मात्रा में अपव्यय होने के कारण सुहागिन की तुलना में कुमारिका में कुल शक्ति अधिक होती है; तथा अखंड दीपप्रज्वलन करें ।
४. इस अवधि में उत्तम आचार का एक अंग मानकर श्मश्रू न करना (दाढी-मूंछ एवं सिर के बाल न काटना), कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना, पलंग एवं गद्दे पर न सोना, सीमा का उल्लंघन न करना, पादत्राण (जूते-चप्पल) न पहनना, ऐसे विविध आचारों का पालन किया जाता है ।
५. नवरात्रि की संख्या को महत्त्व देकर कुछ लोग अंतिम दिन भी नवरात्रि रखते हैं; परंतु शास्त्रानुसार अंतिम दिन नवरात्रि विसर्जन आवश्यक है । उस दिन भोजनप्रसाद होने पर उसी दिन सर्व देवताओं का अभिषेक एवं षोडशोपचार पूजा करें । अन्यथा दूसरे दिन पूजाभिषेक करें ।
६. घटस्थापना के दिन बोए हुए अन्न के अंकुरित पौधे विसर्जन के समय देवी को चढाते हैं । उन पौधों को ‘शाकंभरी देवी’ मानकर स्त्रियां उन्हें सिर पर रखकर विसर्जन करने के लिए ले जाती हैं । अंत में स्थापित घट एवं देवता का विसर्जन करें ।
७. नवरात्रि की स्थापना एवं विसर्जन के समय देवताओं का ‘उद्वार्जन’ अवश्य करें । (उद्वार्जन करना अर्थात देवता की प्रतिमा को स्वच्छ कर उन्हें चमकाना ।)
(संदर्भ – सनातन का ग्रंथ ‘शक्ति की उपासना’)
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