धर्म छिपाकर विवाह करने से भले ही वह अवैध ठहरा, फिर भी पीडिता को गुजारा भत्ता (पोटगी) पाने का अधिकार ! – Madhya Pradesh High Court

  • मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का ‘लव जिहाद’ के एक प्रकरण में महत्त्वपूर्ण निर्णय

  • पीडिता को प्रति माह २० सहस्र रुपये देने का आदेश

इंदौर (मध्य प्रदेश) – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और उसके पश्चात प्रताडना के आरोपों से संबंधित एक प्रकरण में महत्त्वपूर्ण निर्णय सुनाया । न्यायालय ने मुस्लिम पति को उसकी हिन्दू पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए प्रति माह २० सहस्र रुपये देने का आदेश दिया । इस अवसर पर न्यायालय ने कहा कि, केवल विवाह की वैधता पर प्रश्नचिह्न उपस्थित (खडा) करके किसी भी महिला को गुजारा भत्ता पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से तब जब उस विवाह से संतान उत्पन्न हुई हो ।

क्या है प्रकरण ?

पीडिता का २३ फरवरी २०२० के दिन एक मंदिर में स्वयं को हिन्दू बतानेवाले एक मुस्लिम से विवाह हुआ था । जून २०२० में गर्भावस्था के उपरांत महिला को उस युवक की वास्तविक धार्मिक पहचान की जानकारी मिली । जब उसने इसका विरोध किया, तब उसे मारपीट करने और धमकियां देने की घटनाएं हुईं, साथ ही धर्मांतरण के लिए भी दबाव डाला गया । इस प्रकरण में पारिवारिक न्यायालय (कौटुंबिक न्यायालय) ने २६ अगस्त २०२३ के दिन दिए गए आदेश में इस महिला को कानूनी रूप से पत्नी मानने से अस्वीकार कर उसका गुजारा भत्ते का दावा निरस्त कर दिया था । पारिवारिक न्यायालय के इस आदेश को चुनौती देते हुए महिला ने उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण (फौजदारी पुनर्निरीक्षण) याचिका प्रविष्ट की थी । इस पर न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह ने कहा कि, यदि किसी महिला से उसकी धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह किया गया हो और उसे संबंधित पुरुष से संतान भी है, तो केवल विवाह की वैधता के आधार पर उसे गुजारा भत्ता देने से अस्वीकार करना, अर्थात उसे फिर से पीडित करने समान है ।