धर्मांध मुसलमानों के राष्ट्रविघात संकटों से सतर्क करनेवाला ‘द बंगाल फाइल्‍स’ !

प्रस्‍तावना : बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने धर्मांधों के तुष्टीकरण के लिए स्‍वयं की प्रतिष्ठा का प्रश्‍न बनाकर ‘द बंगाल फाइल्‍स’ फिल्‍म का विरोध किया; परंतु यह फिल्‍म ५ सितंबर को बंगाल को छोडकर पूरे विश्‍व में प्रदर्शित हुई । इस फिल्‍म ने भारतीय फिल्‍म जगत के द्वारा आज तक दबाया गया ‘दंगों में हिन्‍दुओं ने झेली पीडा, सत्ता के मोह के चलते धर्मांधों के सामने लाचार होनेवाले शासनकर्ता तथा इसके साथ ही धर्मांध मुसलमानों की अतीत की क्रूरता, वर्तमान की हिंसा तथा भविष्‍यकाल की उनकी असुरी योजनाएं जैसे सूत्र पूरे विश्‍व के सामने प्रकट किए हैं । इस फिल्‍म में इस दुस्‍थिति के उपाय भी दिखाए गए हैं । इसलिए इस फिल्‍म के निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री के बताए अनुसार ‘यह फिल्‍म सर्वसामान्‍य नागरिकों के मन पर गहरा प्रभाव डालकर उनमें राष्ट्रभक्‍ति जागृत करने में सफल रही है ।’ ‘सनातन प्रभात’ के पाठकों के लिए मैं इस फिल्‍म का परीक्षण श्री गुरुचरणों में समर्पित कर रहा हूं ।

संकलक : श्री. सागर निंबाळकर, कोल्‍हापुर (६.९.२०२५)

१. इस फिल्‍म की सत्‍यघटनाओं पर आधारित कहानी संक्षेप में इस प्रकार है –

गीता मंडल नाम की पिछडे वर्ग की युवती के अपहरण की जांच करने के लिए केंद्रीय अन्‍वेषण विभाग का अधिकारी शिवा पंडित बंगाल जाता है । वहां स्‍थानीय राजनेता सरदार हुसैनी की उद्दंड धर्मांधता का सामना करते हुए उसे न्‍याय के लिए अत्‍यंत घृणित व्‍यवहार का सामना करना पडता है । इस प्रकरण का एक संदिग्‍ध आरोपी तथा एकमात्र साक्षी भारती बनर्जी को समझते समय, उनके अतीत के विषय में शिवा को ज्ञात होता है । भारत के विभाजन के समय भारती द्वारा अनुभव की गई राष्ट्रीय नेताओं की निष्‍क्रियता, हिन्‍दूविघातक अहिंसा, हिन्‍दूद्रोही गांधीगिरी, गांधी की बडी गलतियां, बंगाल के धर्मांधों की क्रूरता, योजनाबद्ध पद्धति से हिन्‍दुओं का किया गया वंशसंहार तथा इस पूरे तूफान में भी भारती द्वारा प्राणों की बाजी लगाकर संजोई गई राष्ट्रभक्‍ति, इसकी अंतःकरण को विदीर्ण करनेवाली कहानी इस फिल्‍म में दिखाई गई है ।

इस फिल्‍म के अंतर्मुख करनेवाले कुछ संवाद !

१. भारती बनर्जी : ‘जिस सरकार ने मेरी भारत मां को अपने तानाशाही जूतों से कुचला हो, जो भारत मां इस सरकार के निर्दयी अत्‍याचारों से थर्रा रही हो, क्‍या ऐसे में उसकी बेटी को चुप रहना चाहीए ? मैं भारत की बेटी हूं, भारत के लिए मरूंगी भी तथा मारूंगी भी ।’

२. जीन्‍ना : हिन्‍दू एवं मुसलमान कभी एक नहीं हो सकते; क्‍योंकि हमारे बिलीफ्‍स, हिरोज और विलेंस अलग हैं । आपका कल्‍चर संस्‍कृत से निकलता है । हमारा अरबी-फारसी से ! आप आत्‍मा और पुनर्जन्‍म मे विश्‍वास करते हैं । हम नहीं करते । आप हिन्‍दुस्‍थान को अपनी मां मानते है, हम नहीं मानते । आप वेदों को मानते हैं, हम कुरआन को मानते हैं । आप लाखों भगवानों को मानते हैं । हम सिर्फ अल्लाह को मानते हैं । ‘हिन्‍दू-मुस्‍लिम युनिटी’ एक झूठ है ।

३. पाठा : गांधी रामराज्‍य बनाना चाहता है । जाओ पूछो गांधी से, क्‍या रावण को मारे बिना रामराज्‍य बन सकता है ? तो अब क्‍या करना होगा ? अब लडना होगा । शत्रु का पूर्ण विनाश करना होगा । सारे हिन्‍दुआें को जोडना होगा ।

४. गांधी : हिन्‍दू महिलाओं को अपनेआप को असहाय अथवा कमजोर नहीं समझना चाहिए । अगर कोई भी रावण किसी भी महिला के एक भी बाल को हाथ लगाता है तो, उस महिला को आत्‍महत्‍या कर लेनी चाहीए । वो अपनी जीभ को काटकर या सांस रोककर अपने प्राणों को त्‍याग सकती है । वही असली साहस है ।

– श्री. सागर निंबाळकर

२. दर्शकों को जागृत करनेवाले प्रसंग !

अ. नौआखाली, कोलकाता तथा पूरा बंगाल ही पाकिस्‍तान में आए; इसके लिए तत्‍कालिन मुख्‍यमंत्री हुसैन शाहीद सुर्हावर्दी ने १६ अगस्‍त १९४६ को ‘डाइरेक्‍ट एक्‍शन डे’ की (सीधी कृति के दिन की) घोषणा की । वह रमजान के महिने का १८ वां दिन था तथा इसी दिन मोहम्‍मद ने बद्र की लडाई जीती थी, इसकी पृष्ठभूमि उन्‍होंने साध ली थी । इसके कारण सुर्हावर्दी ने १६ अगस्‍त से पूर्व ही पुलिस को दंगाई मुसलमानों पर किसी प्रकार की कार्रवाई न करने के आदेश दिए थे । उसने धर्मांधों को बंदूकोंसहित सभी प्रकार के हथियारों की आपूर्ति की थी तथा धर्मांध गुंडों की भी सहायता ली थी । कोई भी हिन्‍दू वाहन द्वारा भाग न जाए; इसके लिए पेट्रोलपंप चलानेवालों को ‘केवल कूपन रखनेवालों को ही पेट्रोल दो’, ऐसा आदेश दिया था; जबकि जो कूपन का वितरण करनेवाले थे, उन्‍हें किसी भी हिन्‍दू को कूपन न देने के निर्देश दिए थे । इसके कारण खुली छूट मिले राक्षसी धर्मांध मुसलमान हिन्‍दुओं को मारते जा रहे थे; परंतु असंगठित हिन्‍दू उन्‍हें रोक नहीं पाए । उस समय हिन्‍दुओं के नेता गोपाल पाठा के नेतृत्‍व में संगठित हिन्‍दुओं द्वारा किया गया प्रतिकार इस फिल्‍म में दिखाया गया है । इससे धर्मांध मुसलमानों की दंगे कराने की योजना, दंगों का प्राणघातक दंश तथा दंगों के समय हिन्‍दुओं को संगठित होकर प्रतिकार करने की आवश्‍यकता को दर्शकों के मन पर गहरी छाप डालने में निर्देशक सफल रहे हैं ।

आ. इस फिल्‍म में मोहनदास गांधी एवं बैरिस्‍टर जीन्‍ना से संबंधित कुछ चुनिंदा दृश्‍यों को ही बहुत परिणामकारी पद्धति से दिखाया गया है । इसमें गांधी सदैव ही जीन्‍ना का उल्लेख ‘मेरे भाई जीन्‍ना’, ऐसा करते हैं; परंतु जीन्‍ना गांधी को अर्थात हिन्‍दुओं को उनका स्‍थान दिखाते समय पीछे नहीं हटते । जीन्‍ना हिन्‍दुओं-मुसलमानों के मध्‍य का अंतर समझाकर गांधी को निरूत्तर करते हैं ।

दर्शकों की निर्भयता की परीक्षा लेनेवाले कुछ प्रसंग !

१. दंगों में धर्मांध मुसलमानों द्वारा हिन्‍दुओं पर अकस्‍मात आक्रमण किया जाना

२. दंगापीडित हिन्‍दू बालक द्वारा पानी के लिए अपने पिता की पसीने की बूंदें पीना

३. धर्मांधों द्वारा जीवित हिन्‍दुआें के शरीर पर सूखा चारा बांध कर उन्‍हें जला देना

४. हिन्‍दुओं के शवों को पशुवधगृह में मांस को लटकाने के लिए उपयोग किए जानेवाले ‘हूकों’ में लटका देना

५. हिन्‍दुओं के शवों के ढेर लगना

६. मृतक हिन्‍दुओं के अंतिमसंस्‍कार के लिए लकडियां अल्‍प पडने से उन्‍हें एकत्रित अग्निदाह देने की स्‍थिति आना

७. देवी की मूर्ति के सामने एक हिन्‍दू का मस्‍तक काट देना, देवी की मूर्ति के सामने हिन्‍दुओं की हत्‍याएं करना, एक हिन्‍दू के दो खडे टुकडे करना इत्‍यादि

८.जिस हिन्‍दू न्‍यायाधीश ने जिस धर्मांध नेता को जमानत दिलाई थी, उसी के द्वारा सार्वजनिक चौक पर धर्मांधों के सामने उस हिन्‍दू न्‍यायाधीश को पत्‍थरों से कुचल देना

९. सहस्रों धर्मांधों द्वारा हिन्‍दू महिला के देह की दुर्गति करना

१०. धर्मांध विधायक के सामने वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के कहने पर अत्‍यंत अपमानजनक पद्धति से क्षमायाचना करने के लिए विवश होना

– श्री. सागर निंबाळकर

इ. भारती बनर्जी एक अंग्रेज अधिकारी द्वारा उपाधि स्‍वीकार करने के स्‍थान पर ठीक कार्यक्रम में ही उनकी हत्‍या कर देती है । उनका मतपरिवर्तन कर गांधी उन्‍हें अहिंसावादी बना देते हैं; परंतु यह अहिंसावाद भारती के ही प्राणों पर बन आता है तथा अंततः भारती को स्‍वरक्षा के लिए हथियार उठाना ही पडता है । इससे ‘अहिंसावाद के साथ धर्मनिरपेक्षतावाद की अर्थहीनता’ भी स्‍पष्ट की गई है ।

ई. इस फिल्‍म में मिथुन चक्रवर्ती ने एक विक्षिप्त व्‍यक्‍ति की भूमिका निभाई है । यह व्‍यक्‍ति अपनी युवावस्‍था में एक निर्भय पुलिस अधिकारी था । धर्मांध नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए वह प्रमाण इकट्ठा कर रहा था; परंतु यह पता लगने पर धर्मांध उसकी जीभ एवं गुप्‍तांग काट देते हैं । उसके कारण उसका पूरा जीवन नरक बन जाता है । इससे धर्मांधों की शीर्ष पर पहुंची क्रूरता दर्शकों के ध्‍यान में आती है ।

अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती

उ. धर्मांधों की दंगे कराने की तैयारी के सामने केवल स्‍थानीय पुलिस प्रशासन ही नही ं, अपितु केंद्रीय अन्‍वेषण विभाग के उच्‍चपदस्‍थ अधिकारी भी असहाय एवं लाचार हो जाते हैं, ऐसा इस फिल्‍म में दिखाया गया है । ऐसे अधिकारी तथा कुल मिलाकर प्रशासनिक व्‍यवस्‍था किसी भी प्रामाणिक पुलिसकर्मी को उसकी इच्‍छा होते हुए भी कार्रवाई नहीं करने देती । इसके कारण वर्तमान के जो फिल्‍म निर्माता फिल्‍म में निर्भय (?) पुलिस अधिकारी की व्‍यक्‍तिरेखावाली फिल्‍में (उदा. सिंघम) दिखाकर लोगों का दिशाभ्रम कर रहे हैं, उनके मुंह पर करारा तमाचा है !


‘सैय्‍यारा’ हिन्‍दी फिल्‍म देखकर चक्‍कर खाकर गिरनेवाले यह फिल्‍म न देखें !

‘कुछ महिने पूर्व प्रदर्शित हिन्‍दी फिल्‍म ‘सैय्‍यारा’ भारतीय युवकों को बहुत भायी थी । इस फिल्‍म की कहानी एक प्रेमी दंपति के व्‍यक्‍तिगत दुख पर आधारित थी । ऐसा कहते हैं कि यह फिल्‍म देखते समय कुछ युवक-ंयुवतियां यह फिल्‍म देखकर सिनेमाघर में ही चक्‍कर खाकर गिर पडे ! कुछ लोगों को सामाजिक माध्‍यमों पर ‘यह फिल्‍म देखकर रोना आया’, ऐसी रील्‍स प्रसारित हुईं । आज के ऐसे युवकों को दंगों की यातनाओं में धधक उठी हिन्‍दू महिलाओं के पहाड समान दुख का भान कराने का कार्य इस फिल्‍म ने किया है । अतः जो लोग ‘सैय्‍यारा’ फिल्‍म देखकर चक्‍कर आकर गिर गए हों अथवा डर गए हों, वे ‘द बंगाल फाइल्‍स’ फिल्‍म देखने का साहस न करे तथा अपने दुख के सागर में ही डुबकी लगाते रहें’, ऐसा अभिमत एक राष्ट्रप्रेमी ने व्‍यक्‍त किया है ।
– श्री. सागर निंबाळकर

ऊ. धर्मांध मुसलमान नेता लागों में भले ही इस्‍लाम का प्रसार करते हों, तो भी वे स्‍वयं की पत्नी को बुर्के में नहीं रखते, अपितु उसे उद्यमी बनाते हैं । वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भले ही गोल टोपी एवं मुसलमानी वेशभूषा में रहते हों, परंतु घर पर विदेशी वेशभूषा में होते हैं । वे स्‍वयं के बच्‍चों के नाम तैमूर जैसे क्रूरकर्मी आक्रांताओं के नाम पर रखते हैं, साथ ही वे इन बच्‍चों को वर्ष २०५० में भारत का प्रधानमंत्री बनाने के लिए योजनाबद्ध पद्धति से कार्यरत हैं, यह वास्‍तविकता दर्शकों को भविष्‍य के संकट के प्रति सतर्क करती है ।

३. इस फिल्‍म की कुछ विशेषताएं

अ. विवेक अग्निहोत्री का निर्देशन इस फिल्‍म की आत्‍मा है । उनकी कहानी बताने की पद्धति, उसे ‘फ्‍ैलशबैक’ से (बीच-बीच में पिछले कुछ प्रसंग दिखाना) जोडना, प्रत्‍येक प्रसंग को सुस्‍पष्टता से तथा सीधे प्रस्‍तुत करने का कौशल आदि के कारण ३ घंटे २४ मिनट की यह फिल्‍म दर्शकों के मन की पकड को ढीली पडने नहीं देती । फिल्‍म के अंत में दिखाए गए भयावह प्रसंगों के कारण यह फिल्‍म दर्शकों को विचार करने के लिए प्रवृत्त करती है तथा उनमें विद्यमान राष्ट्रभक्‍ति को संगठन की आवश्‍यकता है, इसकी गुहार लगाती है ।

इस फिल्‍म के कारण सुस्‍पष्ट हुए कुछ सूत्र !

१. बंगाल ने भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है ।

२. देश केवल भूमि का टुकडा नहीं है, अपितु वहां की संस्‍कृति, कलाएं तथा परंपराएं भी देश के महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं । उसका राष्ट्रांतरण करना संभव नहीं होता ।

३. देश के विभाजन के समय मुसलमानों के लिए पाकिस्‍तान दिए जाने के उपरांत शेष हिन्‍दुस्‍थान हिन्‍दुओं का था अर्थात हिन्‍दुस्‍थान ‘हिन्‍दू राष्ट्र’ था !

४. इस फिल्‍म में बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी अथवा बंगाल की वर्तमान सरकार के विरोध में एक भी शब्‍द से उल्लेख नहीं किया गया है ।
– श्री. सागर निंबाळकर

आ. ८० वर्ष आयु की भारती बनर्जी की भूमिका निभानेवाली पल्लवी जोशी के अभिनय को इस फिल्‍म का बलस्‍थान कहना पडेगा । पहले ३० मिनट में उनके मुंह में एक भी संवाद नहीं है; परंतु केवल आंखों की हलचल से तथा मुंह पर व्‍यक्‍त होनेवाले भयग्रस्‍त भावों से ‘वे दर्शकों से संवाद कर रही हैं’, ऐसा लगता है । दर्शकों को फिल्‍म के अंत में इन शब्‍दहीन संवादों का रहस्‍य समझ में आता है । अंत के कुछ प्रसंगों में उनकी तिलमिलाहट उनकी कंपित आवाज से सुस्‍पष्टता से प्रतीत होती है ।

इ. युवावस्‍था की भारती बनर्जी की भूमिका निभानेवाली अभिनेत्री सिमरत कौर ने भी अपनी प्रभावी अभिनयक्षमता का परिचय दिया है । उन्‍होंने भारती बनर्जी की विभिन्‍न मनोदशाओं से एकरूप होकर अभिनय किया है ।

ई. अभिनेता दर्शनकुमार ने शिवा पंडित की भूमिका को अक्षरशः जीवंत किया है । क्रूर गुलाम एवं सरदार हुसैनी की भूमिकाएं साकार करनेवाले क्रमशः नमाशी चक्रवर्ती एवं शाश्‍वत चटर्जी का अभिनय प्रशंसनीय है । अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती जैसे दिग्‍गज कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं के साथ यथोचित न्‍याय किय है । सौरव दास एवं अंकित बिश्‍त का अभिनय भी अच्‍छा रहा है ।

उ. इस फिल्‍म में एक प्रसंग दिखाया गया है । उसमें गांधीवाद के विचारों से प्रेरित भारती दंगे के समय प्रतिकार करनेवाले अमर से कहती है, ‘‘धर्मांध मुसलमानों ने हत्‍या की, उसके जवाब में हमने भी उनकी हत्‍या की, तो सर्वत्र स्‍मशान बन जाएगा ।’’ उस पर अमर उसे आसपास की स्‍थिति दिखाते हुए कहता है, ‘‘तो अब यहां स्‍मशान से अधिक और कौनसी स्‍थिति है ?’’ इस पूरे फिल्‍म में विभिन्‍न प्रसंगों में अमर भारती को इसका भान कराता रहता है, ‘‘अहिंसा का महिमामंडन कर प्राण गंवाने से स्‍वसुरक्षा के लिए हथियार उठाना ही जीवन के लिए आवश्‍यक है ।’’

४. प्रत्‍येक भारतीय से अनुरोध एवं आवाहन !

– श्री. सागर निंबाळकर

यह फिल्‍म किसी एक भारती बनर्जी अथवा गीता मंडल की कपोलकल्‍पित कहानी नहीं है, अपितु यह फिल्‍म प्रातिनिधिकरूप में ऐसे सहस्रों हिन्‍दू महिलाओं की कहानी रखता है । वर्तमान में जिन क्षेत्रों में हिन्‍दू दंगों में जल रहे हैं अथवा जहां से हिन्‍दुओं ने पलायन करना स्‍वीकार किया है, उनकी स्‍थिति समझने के लिए यह फिल्‍म देखनी ही पडेगी ! इसमें दर्शाई गई भारत के इतिहास में की चूकें तथा हिन्‍दुओं के जीवन पर उनके हुए परिणाम हमें अंतर्मुख करनेवाले हैं; इसलिए सर्वत्र के इतिहासप्रेमियों, इतिहास के अध्‍येताओं, राष्ट्रप्रेमियों तथा धर्मनिष्ठों को यह फिल्‍म अवश्‍य देखनी चाहिए । इसके साथ सामान्‍य नागरिकों को भी देश की वर्तमान स्‍थिति, देश की समस्‍याओं के उद्गमस्‍थान तथा उनके उपाय इत्‍यादि जानने हेतु यह फिल्‍म अवश्‍य देखनी चाहिए !

इस लेख के माध्‍यम में मैं प्रत्‍येक भारतीय को यह फिल्‍म देखकर राष्ट्र एवं धर्म हेतु संगठित होकर कार्यंरत होने का आवाहन कर, मैं अपनी लेखनी को श्री गुरुचरणों में समर्पित करता हूं !