
मुझे सदैव लगता था कि ‘जो मेरा है वह गुरुदेवजी का है तथा जो गुरुदेवजी का है, वह मेरा है’, ऐसा भाव होने में क्या अनुचित है ? तब मेरे मन में ‘जो जो गुरुदेवजी का है, उस पर मेरा स्वामित्व है’, यह विचार नहीं होता था; अपितु ‘वह मेरा है; इसलिए मुझे आत्मीयता से उसका उपयोग करना चाहिए’, यह पहले मेरा विचार होता था ।
जून २०२४ में श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी से मिलने पर मैंने कहा, ‘‘मेरा जीवन सनातन संस्था के लिए है । जो-जो मेरा है, वह सनातन का है तथा जो सनातन का है, वह मेरा है ।’’ उस पर उन्होंने तुरंत कहा, ‘‘सनातन संस्था तथा आप अलग नहीं हैं । आप एक ही हैं ।’’ उनकी बातें सुनकर मेरे अंतर्मन में श्री गुरुदेवजी ने मेरे मन में आए पहले विचार में जो अधूरापन था, उसका भान दिलाया । श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी ने ‘मेरा विचार अधिक कैसे उचित होना चाहिए ?’, इसका मुझे भान दिलाया । श्री गुरुदेवजी की इस कृपा के लिए मैं कोटि-कोटि कृतज्ञ हूं ।’
– श्री. अभय वर्तक, प्रवक्ता, सनातन संस्था (१०.८.२०२४)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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