
१५ अगस्त को महर्षि अरविंदजी का जन्मदिवस अर्थात उनकी जयंती ! १९वीं एवं २०वीं शताब्दी में भारतवर्ष में दो महर्षि हुए । उनमें एक थे महर्षि दयानंद सरस्वतीजी तथा दूसरे थे महर्षि अरविंद ! इस महान सशस्त्र क्रांतिकारी की, दार्शनिक की, वेदों के एक भाष्यकार की, एक बुद्धिमान एवं प्रगाढ विद्वता प्राप्त, राष्ट्रभक्ति के कारण प्रशासनिक अधिकारी के पद पर लात मारनेवाले, ४ दशकों से भी अधिक अवधि तक विलक्षण ध्यानसाधना करनेवाले एक सिद्ध महायोगी की तथा अपनी तप:पूत साधना से ३० सहस्र से अधिक पृष्ठों की ग्रंथनिर्मिति करनेवाले एक सिद्धहस्त लेखक की जयंती है, यह भी अनेक लोगों को ज्ञात नहीं है । इसमें राष्ट्र का भले ही दुर्भाग्य हो; परंतु उसमें आश्चर्य की तो कोई बात ही नहीं है; क्योंकि दुर्भाग्यवश इतिहास की क्रमिक पुस्तक में महर्षि का संदर्भ मात्र एक-दो वाक्यों में ही सिमट जाने से तथा जिन गांधी-नेहरू से परे हमारा इतिहास पहुंचता ही नहीं, ऐसे इतिहास की पुस्तकें पढनेवाले हम दुर्भाग्यशाली भारतीयों को इन दो महर्षियों का इतिहास कैसे ज्ञात हो सकता है भला ? उनमें से एक पर तो अपनों ने ही १८ बार विषप्रयोग किया, जबकि दूसरे की भाषा समझने में बहुत कठिन है, यह कहकर हमने उनकी उपेक्षा की !इसीलिए एक लोकोत्तर महर्षि के चरित्रचिंतन के लिए ही इस लेख का यह प्रयोजन है !
१. विदेश में रहकर भी साधना के लिए प्रेरित क्रांतिकारी वृत्ति के अरविंदजी !
अरविंदजी के पिता ने उनके पुत्र को भारतीय संस्कृति की हवा भी न लगे; इसलिए आयु के ७वें वर्ष में ही शिक्षा ग्रहण करने के लिए यूरोप भेजा । उसी लडके ने आयु के २१वें वर्ष तक वहां सूट-बूट पहनकर भी राष्ट्रनिष्ठा से ओतप्रोत रहकर आई.सी.एस. की नौकरी पर लात मारी । इसे चमत्कार कहा जाए अथवा नियति की योजना ? महर्षि अरविंद का स्वभाव मूलतः ही क्रांतिकारी होने से उनकी तीखी लेखनी से उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व की तीखी आलोचना की । वंगभंग के आंदोलन से प्रेरित होकर भी वे उसके विभाजन से आहत हुए । उन्होंने महाराष्ट्र में भी कार्य किया । आंग्लभाषा पर उनकी प्रभुता देखकर वडोदरा के महाराज सयाजीराव ने उनके साथ निकटता बनाई !

२. साधना के लिए प्रेरित होना तथा कारागृह में श्रीकृष्ण का साक्षात्कार होना !
हिन्दुस्थान लौटने पर समुद्र तट पर ही उन्हें एक विलक्षण अनुभव हुआ । उस समय वे ईश्वर पर विश्वास नहीं करते थे, तब भी उन्हें अनेक अनुभव हुए । श्रीराम-श्रीकृष्ण के जीवन से प्रभावित होकर कौतुहलवश वे साधना के लिए प्रेरित हुए । आरंभ में वे नास्तिक थे । आगे जाकर उनके क्रांतिकारी कार्य के कारण अंग्रेजों ने उन्हें कारागृह में डाला; परंतु वहां की गई गायत्री मंत्र की साधना से तथा ध्यानधारणा से उन्हें श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हुआ ।
३. ‘राष्ट्रभक्ति का अर्थ राजनीति नहीं है’ तथा ‘सनातन धर्म ही राष्ट्रधर्म’ होने से सनातन धर्म का विनाश हुआ, तो उससे राष्ट्र का भी विनाश होगा !

एक भाषण में महर्षि अरविंद कहते हैं, ‘‘आज मुझे जो कुछ बोलना था, उसे मेरे मस्तिष्क से पूरा निकाल दिया गया तथा उसके स्थान पर जो रखा गया है, वह यह इतना ही है ! वर्तमान में चल रहा आंदोलन वास्तविक राजनीतिक आंदोलन नहीं है तथा राष्ट्रभक्ति का अर्थ राजनीति नहीं है, अपितु वह एक श्रेष्ठ स्तर का धर्म है, वह एक निष्ठा है तथा निरंतर चलते रहने का वह एक शाश्वत मार्ग है । आज मैं यहां पुनः वही बताता हूं; परंतु थोडी भिन्न पद्धति से ! पहले की भांति राष्ट्रभक्ति एक धर्म, मार्ग अथवा निष्ठा है, ऐसा न कहकर जिसे हम सनातन धर्म बोलते हैं, वही हमारा राष्ट्र-धर्म है, ऐसा मैं कहता हूं । सनातन धर्म हिन्दू राष्ट्र को प्राप्त जन्मजात देन है । इस धर्म की वृद्धि के साथ राष्ट्र भी उत्कर्ष तक पहुंचता है । हमें धर्म एवं राष्ट्र का यह शाश्वत जोड बनाकर दिया गया है । जब सनातन धर्म का विनाश होने लगता है, तब उसके साथ राष्ट्र का भी विनाश होने लगता है तथा यदि सनातन धर्म नष्ट होने की संभावना बनती है, तो सनातन धर्म के साथ राष्ट्र का भी विनाश होगा । सनातन धर्म ही हमारा राष्ट्रधर्म है ।’’
४. भारतमाता के लिए सर्वस्व अर्पण करने का युवकों से आवाहन !
महर्षि २३ अगस्त १९०७ को बंगाल के ‘नेशनल कॉलेज’ में दिए गए भाषण में कहते हैं, ‘‘यही उचित समय है देश के लिए कुछ करने का तथा भारतमाता की सेवा से अधिक कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है ! आप भारतमाता के लिए पुनः ज्ञान प्राप्त कीजिए । आपका शरीर, मन एवं आत्मा उसकी सेवा में अर्पण कीजिए । आप भारतमाता के लिए जीवन व्यतीत कीजिए । आप इसके लिए विदेश जाएं, जिससे वहां से वापस आकर उसके लिए कुछ ज्ञान प्राप्त कर ला सकेंगे । भारतमाता की समृद्धि के लिए काम कीजिए ।’’
५. छत्रपति शिवाजी महाराज को परमवंदनीय माननेवाले महर्षि अरविंदजी !
लोकमान्य टिळक के अनुरोध पर वे महाराष्ट्र आए । उन्होंने नासिक में उनके मन में छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रति जो प्रचंड सम्मान था, उस पर उन्होंने छोटासा भाषण भी दिया । ‘समग्र लोकमान्य टिळक’, इस ग्रंथ के खंडों में भी महर्षि अरविंदजी के कुछ भाषण हैं । महर्षि अरविंदजी ने लोकमान्य टिळक के कुछ भाषणों का संकलन भी किया है ।
६. वेदों पर भाष्य एवं महाकाव्य
भगिनी निवेदिता द्वारा बताए अनुसार पुदुच्चेरी (पांडिचेरी) में स्थायी रूप से निवास का निर्णय कर महर्षिजी ने वहां ४ तपों तक योगसाधना की । उन्होंने पुदुच्चेरी में ही वेद, उपनिषद तथा रामायण पर भाष्य भी पूरा किया । ‘सिक्रेट ऑफ दी वेदाज’, इस ग्रंथ में महर्षिजी ने वेदों पर टीका करनेवाले स्वकीयों तथा पाश्चात्यों की विकृति का जिस प्रकार निराकरण किया है, उसे देखते हुए हम उनके सामने नतमस्तक हुए बिना नहीं रहते । महर्षिजी ने ४ दशकों तक विश्व का आंग्लभाषा के सबसे भव्य महाकाव्य ‘सावित्री’ की रचना कर उसे पूरा किया । उसमें उन्होंने सावित्री एवं सत्यवान पर आधारित रूपक कथा से संपूर्ण योगतत्त्व का चिंतन प्रकट किया है । महर्षि अरविंदजी की भाषा समझने में कठिन लगती हो, तब भी पाठक कदम-कदम पर उसमें विद्यमान प्रतिभा तथा उत्तम शब्दसंपत्ति का साक्षात्कार अनुभव करते हैं, जो निश्चित ही अलौकिक है ।
७. ४ दशकों से अधिक योगसाधना
महर्षि अरविंदजी कहते हैं, ‘‘वर्ष १९०४ में गुरु के बिना मैंने योगाभ्यास करना आरंभ किया । वर्ष १९०८ में महाराष्ट्र के एक योगी से मुझे महत्त्वपूर्ण सहायता मिली तथा उससे मुझे मेरी साधना का मूल सिद्धांत मिल गया । मेरी साधना आंतरिक अनुभवों पर आधारित थी । कारागृह में मैंने गीता में विद्यमान योग का अभ्यास किया तथा उपनिषदों की सहायता से ध्यान किया । पांडिचेरी में वेदों का अध्ययन आरंभ करने पर मैंने उसके पूर्व ही जो अनुभव किए थे, उनका वर्णन मुझे वेदों में मिला । मन में कोई प्रश्न आने पर अथवा समस्या आने पर गीता के पाठ से मुझे उसके उत्तर मिलते थे ।’’
८. स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में उनका अंतिम भाषण
वर्ष १९४७ में भारतवर्ष को स्वतंत्रता मिलते ही महर्षि अरविंदजी द्वारा स्वतंत्र भारतवर्ष को दिए गए संदेश का सारगर्भ इस प्रकार था, ‘‘प्रत्येक राष्ट्र का एक जीवनकार्य होता है तथा भारत का भी ऐसा एक कार्य है और वह है पूरे विश्व को आध्यात्मिकता प्रदान करना !’’ उनका यह संदेश भारतवर्ष के भविष्य के विषय में उनका आमूलचूल चिंतन प्रकट करता है ।
– श्री. तुकाराम चिंचणीकर (साभार : ‘पाखण्ड खण्डिणी’ ब्लॉग से)
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