अध्ययनपूर्वक ‘लेखन’ एवं ‘वक्तृत्व’ के माध्यम से तथाकथित आधुनिकतावादियों का सत्य स्वरूप उजागर करनेवाली श्रीमती शेफाली वैद्या !

पुणे की श्रीमती शेफाली वैद्या ‘जनसंवाद’ के (पत्रकारिता के साथ सामाजिक) क्षेत्र में स्नातक (मास डिग्री इन मास कम्युनिकेशन) हैं । वे लेखन एवं वक्तृत्व के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र में भारतीय कला, मंदिर एवं उनकी संस्कृति, परंपरा, भारतीय वस्त्र संस्कृति, इसके साथ ही अर्बन (शहरी) नक्सलवाद तथा हिन्दुत्व पर जनजागृति का कार्य कर रही हैं । आज उनके ही शब्दों में हम उनके कार्य से अवगत होंगे ।

श्रीमती शेफाली वैद्या

विशेष स्तंभ

छत्रपति शिवाजी महाराजजी के हिन्दवी स्वराज्य के लिए सैनिक एवं धर्मयोद्धा द्वारा किया त्याग सर्वोच्च है, उसी प्रकार आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा के लिए ‘धर्मयोद्धा’ के रूप में कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्मरक्षा के संघर्ष की जानकारी देनेवाले ‘हिन्दुत्व के धर्मयोद्धा’ के स्तंभ द्वारा अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से हमारे मन की चिंता दूर होकर उत्साह जागृत होगा ! – संपादक

१. बच्चों एवं अभिभावक (गार्जियन) में आपसी संबंध

श्रीमती शेफाली वैद्या

अ. वर्तमान के आधुनिक युग में अभिभावकों को अपने बच्चों को नैतिकता का बोध कराना तुच्छता का प्रतीक लगता है । अपने बच्चे अन्यों के सामने कुछ गलती करते हैं, तब वे अपने बच्चों को उनकी गलती का भान करवाने में झिझकते हैं । ऐसे समय पर सुस्पष्टता से बच्चों को कैसे चूक का भान करवाना चाहिए ? इसका उदाहरण अभिभावकों को अपनी कृति से सिखाना चाहिए, इस विषय में श्रीमती शेफाली वैद्या ने ‘घार हिंडते आकाशी’ (मराठी भाषा) पुस्तक में लिखा है । उसमें अपने ‘तिळ्यांना’(बच्चों) को बडा करते समय अथवा जीवन के लिए तैयार करते समय उन्हें ‘शिवचरित्र’ (छत्रपति शिवाजी महाराजजी का चरित्र), ‘रामायण’, ‘महाभारत’ जैसे धर्मग्रंथों का आधार कैसे लिया जाए, यह विस्तार से बताया है ।


न्यायालय, क्लबों में वस्त्रसंहिता (ड्रेस कोड) होना चाहिए; तो मंदिरों में क्यों नहीं ?

(टिप्पणी : वस्त्रसंहिता अर्थात मंदिर में प्रवेश करते समय परिधान किए जानेवाले वस्त्रों के संदर्भ में नियमावली)

 

न्यायालय में, काम पर, इसके साथ ही क्लब में, ऐसे सभी क्षेत्रों में वस्त्रसंहिता लागू है, तो न्यासियों द्वारा मंदिर में वस्त्रसंहिता लागू करने पर ‘अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर आघात किया जा रहा है’, ऐसा कहते हुए विरोध क्यों किया जाता है ? अन्य स्थानों पर वस्त्रसंहिता का विरोध नहीं होता । मंदिरों में वस्त्रसंहिता लागू करने पर मंदिरों की सात्त्विकता टिके रहने में सहायता होगी । इसलिए सर्वत्र यह उपक्रम सर्वत्र होना ही चाहिए ।
– श्रीमती शेफाली वैद्या, लेखिका

२. मंदिर एवं उससे संबंधित संस्कृति एवं परंपरा

अ. श्रीमती शेफाली वैद्या देश-विदेश में भ्रमण करती हैं तथा वहां के मंदिर, शहर (नगर), उनकी वास्तुरचना का अध्ययन कर पाठकों के सामने प्रस्तुत करती हैं ।

आ. केवल उपभोगवाद अथवा मौज-मस्ती के लिए भ्रमण न कर उसका पूर्ण अध्ययन कैसे होना चाहिए ?, मंदिरों की वास्तुरचना के पीछे शास्त्र, प्राचीनकाल से चली आ रही परंपराओं एवं उनका महत्त्व इत्यादि के विषय में उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उसे विपुलता से प्रस्तुत किया है । पब, मदिरा (शराब) तथा जुए के लिए प्रसिद्ध गोवा (गोमंतक) की भूमि को, उन्होंने वहां के स्थानीय प्राचीन मंदिरों के महत्त्व को अनेक लोगों तक पहुंचाया, जिससे ‘गोवा’ की ओर विशेषरूप से सैर-सपाटे की दृष्टि से देखनेवालों का दृष्टिकोण अब परिवर्तित हो रहा है ।

३. ‘नो बिंदी नो बिजनेस’ अभियान

(टिप्पणी : विज्ञापन में युवती को बिना कुमकुम अथवा बिंदी लगाए दिखाया गया हो, तो उस प्रतिष्ठान से किसी प्रकार का व्यवहार / खरीदी-बिक्री न करना)

वर्तमान में अनेक विज्ञापनों में मॉडेल के (विज्ञापनों में दिखाई गई युवती अथवा महिला) माथे पर न तो कुमकुम और न ही हिन्दू त्योहार के अनुसार उनका श्रृंगार होता था । अर्थात, उनसे उत्सव का कोई चैतन्य नहीं झलकता था । उस मॉडेल को देखकर उदासीनता तथा निराशा का भान होता था ।

इसे रोकने के लिए उन्होंने सामाजिक माध्यम से ‘नो बिंदी नो बिजनेस’ ‘ट्रेंड’ (एक प्रकार का अभियान) आरंभ किया तथा इसे इंटरनेट का उपयोग करनेवालों का भारी प्रतिसाद मिला । इसका इतना सकारात्मक परिणाम हुआ कि बडे-बडे प्रतिष्ठानों ने उनके उत्पादनों का विज्ञापन करनेवाली मॉडेल्स के माथे पर बिंदी लगवाना आरंभ किया । साथ ही उन्हें अधिक सात्त्विक पद्धति से दिखाना आरंभ किया ।

४. श्रीमती शेफाली वैद्या के विचारों की गहनता ‘गोवा इन्क्विजिशन’(धार्मिक यातना)के माध्यम से !

‘गोवा इन्क्विजिशन’ के विषय में समाचारवाहिनी पर जानकारी देती हुई श्रीमती शेफाली वैद्य

मूलत: गोवा की श्रीमती शेफाली वैद्या की ३ पीढियों ने ‘गोवा इन्क्विजिशन’ की तपिश अनुभव की है, इसीलिए वे ‘हिन्दू’ के रूप में दृढता से सामने आईं । उससे उनके विचारों में गहनता उत्पन्न हुई । गोवा ने मानवजाति के इतिहास का जो सबसे क्रूर नरसंहार देखा है, वह है गोवा का इन्क्विजिशन !

Goa Inquisition: The untold Atrocities by St. Xavier & Missionaries

स्पैनिश इन्क्विजिशन के विषय में पूरे विश्व को जानकारी है, परंतु गोवा के इन्क्विजिशन के विषय में कुछ विशेष पता नहीं है । बर्बर पुर्तगालियों के ४५१ वर्षाें के क्रूरतापूर्ण शासन की सत्ता का अंत हुआ तथा १९ दिसंबर १९६१ को गोवा मुक्त हुआ, जो आज ‘गोवा मुक्ति दिवस’ के रूप में पहचाना जाता है । गोवा इन्क्विजिशन पुर्तगाली कैथोलिक चर्च द्वारा चलाए गए अभियानों में सबसे हिंसक इन्क्विजिशन के रूप में पहचाना जाता है ।

Goa Inquisition : Lest We Forget | Shefali Vaidya | #SangamTalks

गोवा के हिन्दुओं ने २५२ वर्ष (१५६० से १८१२) तक सबसे भयंकर एवं रक्तरंजित इन्क्विजिशन का सामना किया । उसमें हिन्दुओं के मंदिरों की भयंकर हानि हुई तथा गांव के गांव उद्ध्वस्त हो गए, श्रीमती शेफाली वैद्या लोगों के सामने इसका इतिहास रखकर जनजागृति कर रही हैं ।

५. ‘शहरी नक्सलवाद’ तथा ‘हिन्दुत्व’ पर सुस्पष्टता एवं सटीकता

श्रीमती शेफाली वैद्या शहरी नक्सलवाद की भयावह वास्तविकता एवं उसकी साम्यवादी विचारधारा के लोगों से संबंध के विषय में व्याख्यान तथा भेंटवार्ता के माध्यम से प्रबोधन करती हैं । किसी ढोंगी अाधुनिकतावादी के ‘हिन्दुत्व’ पर टीका-टिप्पणी करने पर, वे पूरा अध्ययन कर उसका उत्तर देने का कार्य दृढता से करती हैं । जब वे किसी समाचारवाहिनी (न्यूज चैनल) पर हिन्दू धर्म पर टीका-टिप्पणी का खंडन करती हैं अथवा समाज में जाकर विषय प्रस्तुत करती हैं, तब वे किसी ‘रणरागिनी’ समान प्रतीत होती हैं । इसलिए वे अनेक हिन्दुत्वनिष्ठों की प्रेरणा हैं ।

६. अन्य कार्य

अ. विगत दो वर्षाें से उन्होंने एवं उनके कुछ सहयोगियों ने हिन्दुत्व के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करनेवालों को ‘अक्षय हिन्दू पुरस्कार’ देने का उपक्रम आरंभ किया है ।

आ. उनके ‘फेसबुक’ पर १ लाख ७९ सहस्र ‘फॉलोअर्स’ (अनुयायी) हैं । उस माध्यम से वे समाज में होनेवाली महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर भी भाष्य करती हैं । उन्होंने मराठी, अंग्रेजी एवं कोंकणी भाषाओं में लेखन किया है ।

इ. अनेक प्रख्यात (शीर्ष) समाचारवाहिनियों (न्यूजचैनल्स) से वे हिन्दुत्व का पक्ष दृढता से प्रस्तुत करती हैं ।
‘नो बिंदी नो बिजनेस’ इस अभियान के प्रातिनिधिक स्वरूप का चित्र