प्राचीन भारतीय ज्ञान ‘आरोग्य विज्ञान’ के रूप में पुनः लौटा है !
१ से १५ जुलाई के अंक में प्रकाशित लेख में हमने ‘प्राचीन लय और आधुनिक विज्ञान, पुराने ज्ञान के लिए नए नाम, योग का पुनरागमन तथा जैन उपवास की परंपरा’ आदि के विषय में पढा । आज इस लेख का शेष भाग यहां प्रस्तुत है ।

५. भारत के ‘शून्य तेल’ वाले खाद्यपदार्थ
इडली, पुट्टु, अप्पम, लाल चावल, सांभर, रसम, भाप में पकाई हुई सब्जियां, किण्वित (फर्मेंटेड, खमीर) चावल तथा दाल से बने व्यंजन आदि केरल और दक्षिण भारत के पारंपरिक खाद्यपदार्थों को देखिए । ये केवल आहार के पदार्थ नहीं थे, अपितु अनाज, दालेंं, भाप में पकाने की विधि तथा पाचन के अनुकूल सरलता का उपयोग कर तैयार किए जानेवाले दैनिक खाद्यपदार्थ थे । गुजरात ने हमें ढोकला दिया, जो चावल, दाल अथवा बेसन से बने किण्वित और भाप में पकाए गए भोजन का उत्कृष्ट उदाहरण है । उत्तर और पश्चिम भारत में दाल ढोकली, उबले हुए चने, अंकुरित अनाज, सत्तू, खिचडी, बाजरे की रोटियां, भुने हुए कंद तथा दालों पर आधारित असंख्य खाद्यपदार्थ प्रचलित थे । इन खाद्यपदार्थों में से अधिकांश को उनके मूल घरेलू स्वरूप में बनाने के लिए बहुत कम अथवा बिल्कुल तेल की आवश्यकता नहीं होती थी । ये खाद्यपदार्थ वनस्पति-आधारित, रेशायुक्त (फाइबरयुक्त) तथा स्थानीय जलवायु, श्रम, पाचन और ऋतु के साथ गहराई से जुडे हुए थे । दुःखद बात यह है कि इनमें से अनेक खाद्यपदार्थ आगे चलकर तेल, घी, तडका और भोजनालय-शैली के अतिरिक्त पदार्थों में डूब गए । जो कभी सरल, भाप में पका हुआ और पौष्टिक था, वही भारी, चिकना तथा केवल दिखावे के लिए बनाया जाने लगा । मूल बुद्धिमत्ता वैभव अथवा अपव्यय में नहीं, संयम में निहित थी ।
इसी कारण आधुनिक ‘शून्य तेल’ आंदोलन वास्तव में भारत में आयात की गई कोई विदेशी अवधारणा नहीं है । अनेक दृष्टियों से यह पुनरागमन ही है – भाप में बनी इडली, किण्वित ढोकला, पुट्टु, दाल-आधारित भोजन, चने की चाट, शीघ्र भोजन करना तथा अपने दादा-दादी की अनुशासित रसोई की ओर लौटना । आधुनिक पोषण विज्ञान अब फाइबर, आंत्र (आंत) के सूक्ष्मजीव, ‘इंसुलिन’(अग्न्याशय में स्वाभाविक रूप से बननेवाला एक हार्मोन) संवेदनशीलता, ‘एंडोथेलियल’ स्वास्थ्य तथा सूजन-रोधी आहार की चर्चा कर सकता है; किंतु भारतीय परिवार इन सिद्धांतों के जीवंत उदाहरण पहले ही प्रस्तुत कर चुके थे, केवल सिद्धांत के रूप में नहीं, अपितु प्रातःकालीन नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात्रि के भोजन के रूप में ।
उत्तम स्वास्थ्य बनाए रखने हेतु अनुशासित दिनचर्या आवश्यक !

एक साधारण-सा ज्ञान हमारी अपनी संस्कृति की स्मृति में शांतभाव से स्थित है । प्रातः शीघ्र जागिए, गहरी श्वास लीजिए, विनम्रतापूर्वक भोजन कीजिए, अतिभोजन से बचिए, पाचन का सम्मान कीजिए, मन को शांत रखिए, चलते रहिए, ध्यान कीजिए और संयमपूर्वक जीवन व्यतीत कीजिए । संभवतः इसी कारण मेरी दादी की दिनचर्या अब मुझे पुरानी नहीं, अपितु आश्चर्यजनक रूप से उन्नत प्रतीत होती है । उन्होंने अपने जीवन को परिस्थितियों के अनुसार नहीं ढाला, अपितु उसे अनुशासन में ढाला । उन्होंने दीर्घायु का पीछा नहीं किया, वे इस प्रकार जीवन जीती थीं कि दीर्घायु होना स्वाभाविक रूप से संभव हो गया । भोजन कब रोकना है, यह बताने के लिए उन्हें किसी उपकरण की आवश्यकता नहीं थी; उनके लिए सूर्यास्त ही पर्याप्त था । – श्री. मयंक जैन
६. ‘ग्लूकोज’ का मोह : लयबद्ध जीवनशैली से ‘ग्लूकोज’ पर नियंत्रण पाया जा सकता है !
आज स्वास्थ्य-जगत निरंतर ‘ग्लूकोज मॉनिटर्स’ (रक्त में शर्करा की जांच करनेवाले उपकरण) के प्रति आकर्षित हो गया है । लोग रक्त-शर्करा में होनेवाली प्रत्येक वृद्धि और कमी पर इस प्रकार दृष्टि रखते हैं, मानो जीवन को केवल एक आलेख तक ही सीमित किया जा सकता हो । निस्संदेह मापन का अपना महत्त्व है; किंतु अति-आसक्ति में एक जोखिम भी है ।
फल, चावल अथवा दाल खाने के पश्चात ग्लूकोज का बढना चयापचय संबंधी रोग का पर्याय नहीं है । वास्तविक समस्या प्रायः इंसुलिन प्रतिरोध होती है, अर्थात ग्लूकोज का उचित प्रकार से उपयोग करने में शरीर की असमर्थता; क्योंकि समय के साथ शरीर की चयापचय प्रणाली दुर्बल हो चुकी होती है ।
‘लिपिड’ (शरीर की वसा) से प्रेरित इंसुलिन प्रतिरोध पर हुए शोध से ज्ञात हुआ है कि मांसपेशियों तथा यकृत की कोशिकाओं में अतिरिक्त वसा का संचय ‘इंसुलिन सिग्नलिंग’ (इंसुलिन की कार्यप्रणाली) में किस प्रकार बाधा उत्पन्न कर सकता है (संदर्भ : सैम्युअल एवं शुलमैन, २०१०) । डॉ. माइकेल ग्रेगर ने इस विचार को व्यापक जनसमूह तक पहुंचाते हुए तर्क दिया है कि ‘मधुमेह केवल कार्बोहाइड्रेट का रोग नहीं है, अपितु वह वसा की विषाक्तता तथा विकृत इंसुलिन-कार्यप्रणाली से भी गहराई से जुडा हुआ है ।’ (संदर्भ : ग्रेगर, २०१५; ग्रेगर, २०१६) इस दृष्टि से हमारी अनेक प्राचीन खाद्य-परंपराएं आज के उपकरण-आधारित स्वास्थ्य-चिंतन की अपेक्षा कहीं अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण थीं । उन्होंने संयम, वनस्पति-आधारित आहार, समय पर भोजन, ऋतु के अनुसार भोजन, सादगी और आत्मसंयम पर बल दिया । उन्होंने हमें ग्लूकोज के प्रत्येक उतार-चढाव से भयभीत होकर जीना नहीं सिखाया, अपितु लयबद्ध जीवन जीना सिखाया । यही ज्ञान और ‘बायोहैकिंग’ (विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा जीवनशैली में परिवर्तन – जैसे आहार, निद्रा और व्यायाम आदि के माध्यम से मानव शरीर एवं मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढाने की प्रक्रिया) में मूलभूत अंतर है । बायोहैकिंग का आरंभ प्रायः चिंता से होता है, जबकि ज्ञान का आरंभ संतुलन से होता है ।
७. ‘कॉर्टिसोल’ (तनाव उत्पन्न करनेवाला हार्मोन) और शांति
आज ‘कॉर्टिसोल’ के प्रति बढती हुई आसक्ति पर भी यही बात लागू होती है । अचानक कॉर्टिसोल स्वास्थ्य-जगत का खलनायक बन गया है । सामाजिक माध्यम पेट की चर्बी, थकान, मनःस्थिति में परिवर्तन, खराब नींद तथा लगभग प्रत्येक आधुनिक अस्वस्थता के लिए इसे उत्तरदायी ठहराते हैं । निस्संदेह तनाव-संबंधी हार्मोन महत्त्वपूर्ण हैं और दीर्घकालिक तनाव वास्तविक है; किंतु भारतीय चिंतन ने इससे कहीं व्यापक सत्य बहुत पहले ही समझ लिया था – ‘मानसिक अशांति शरीर को हानि पहुंचाती है ।’ योग, आयुर्वेद और पारंपरिक शास्त्रों ने मनुष्य को अलग-अलग अंगों में विभाजित करके नहीं देखा । उन्होंने भोजन, निद्रा, श्वास, विचार, दिनचर्या, भावनाएं और आचरण को एक ही अखंड तंत्र के भाग के रूप में देखा । अशांत मन केवल मानसिक समस्या नहीं था, अपितु यह शरीर में उत्पन्न होनेवाली हलचल थी ।
८. स्वास्थ्य के लिए शरीर को लयबद्धता की आवश्यकता
आधुनिक विज्ञान धीरे-धीरे उसी समग्र दृष्टिकोण की ओर लौट रहा है । अब वह जलन, ‘ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस’ (मुक्त रैडिकल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स के मध्य असंतुलन), ‘एंडोथेलियल’ कार्य, आंत्र स्वास्थ्य, ‘माइटोकॉन्ड्रिया’, ‘टेलोमेरेज’, ‘सर्कैंडियन बायोलॉजी’, ‘वेगल टोन’ तथा तंत्रिका तंत्र के नियमन की चर्चा करता है । ये सभी मूल्यवान अवधारणाएं हैं । ये हमें शरीर की कार्यप्रणालियों को अधिक स्पष्टता से समझने में सहायता करती हैं; किंतु इनके पीछे एक अत्यंत सरल सत्य छिपा है, जिसे हमारी प्राचीन परंपराएं बहुत पहले से जानती थीं – शरीर को लयबद्धता की आवश्यकता होती है और अतिरेक उसे असंतुलित कर देता है । (शेष पृष्ठ १४ पर)
९. शरीर का संतुलन बनाए रखनेवाला आयुर्वेद का समग्र दृष्टिकोण
यहीं पर आयुर्वेद की ओर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक हो जाता है । संभव है कि आयुर्वेद ने ‘माइटोकॉन्ड्रिया’, ‘डोपामीन’, ‘टेलोमेरेज’ अथवा हृदयगति में परिवर्तन जैसे आधुनिक शब्दों का प्रयोग न किया हो; किंतु वह यह भलीभांति जानता था कि जीवनशैली ही औषधि है । वह यह भी जानता था कि पाचन, निद्रा, मानसिक अवस्था, वातावरण और दिनचर्या एक-दूसरे से गहराई से जुडे हुए हैं । वह यह समझता था कि क्रोध, लोभ, अतिभोजन, रात्रि में विलंब से भोजन करना तथा अनियमित आदतें जीवन को कष्ट देती हैं । वह यह भी जानता था कि स्वास्थ्य केवल रोग का अभाव नहीं, संतुलन की उपस्थिति है ।
१०. आयुर्वेद की प्राचीन अवधारणाओं के लिए आधुनिक स्वास्थ्य-जगत के नए प्रचलित शब्द
आधुनिक स्वास्थ्य उद्योग अब इन्हीं बातों को नए-नए शब्दों में पुनः खोज रहा है । पहले ‘डिटॉक्स’ (शरीर-शुद्धि) लोकप्रिय हुआ । उसके बाद दाह अथवा सूजन (इन्फ्लेमेशन) की चर्चा आरंभ हुई । फिर ‘माइक्रोबायोम’ (शरीर में रहनेवाले सूक्ष्मजीवों का समूह), उसके बाद ‘कॉर्टिसोल’, ‘ऑटोफैजी’ (शरीर की कोशिकाओं के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया), ‘माइटोकॉन्ड्रीयल स्वास्थ्य’, जैविक आयु, ‘एपिजेनेटिक री-प्रोग्रामिंग’ (डी.एन.ए. की मूल संरचना बदले बिना कोशिकाओं के बाह्य आनुवंशिक चिह्नों अथवा जानकारी (Epigenetic Marks) को पुनः व्यवस्थित करने की जैविक प्रक्रिया) और भविष्य में संभवतः ‘न्यूरोइन्फ्लेमेशन’ (मस्तिष्क और रीढ की हड्डी में तन्त्रिका ऊतकों की सूजन) अथवा कोई नया पहनने योग्य मापक उपकरण हो सकता है । यह चक्र निरंतर चलता रहता है ।
११. विज्ञान में आत्मसम्मान
भारत को आधुनिक विज्ञान का विरोध नहीं करना चाहिए । हमें कम नहीं, अपितु अधिक विज्ञान की आवश्यकता है । हमें अधिक शोध, अधिक चिकित्सकीय परीक्षण, अधिक कठोर प्रमाणीकरण तथा पारंपरिक ज्ञान और समकालीन चिकित्सा के मध्य अधिक ईमानदार संवाद की आवश्यकता है । किंतु हमें अपना बौद्धिक आत्मसम्मान भी पुनः प्राप्त करना चाहिए । दुःखद बात यह नहीं है कि पाश्चात्य देश भारतीय परंपराओं का अध्ययन कर रहे हैं; यह तो स्वागतयोग्य है । वास्तविक दुःखद स्थिति यह है कि अनेक भारतीय अपने ही सांस्कृतिक ज्ञान को तब महत्त्व देते हैं, जब उसे पाश्चात्य देशों से मान्यता प्राप्त हो जाती है । हमारे सामने चुनौती अंधानुकरण की नहीं, अपितु परिपक्व आत्मविश्वास की है । हमें यह कहने में समर्थ होना चाहिए ‘हां, आधुनिक विज्ञान आवश्यक है; किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि हमारी हिन्दू संस्कृति ने मानव-स्वास्थ्य, अनुशासन और दीर्घायु के विषय में अत्यंत गहन अनुभव और ज्ञान सुरक्षित रखा है ।’ इन दोनों को एक-दूसरे का विरोधी होने की आवश्यकता नहीं है । कौन-सी परंपरा सुरक्षित रखी गई है, यह बात प्रयोगशाला प्रकाश में ला सकती है । परंपरा के कारण ऐसे प्रश्न उठ सकते हैं, जिन्हें विज्ञान ने अभी-अभी पूछना प्रारंभ किया है ।
१२. लयबद्धता का ज्ञान
अंततः वास्तविक स्वास्थ्य कोई ‘फैड’ (क्षणिक प्रचलन) नहीं है । वह कोई ‘गैजेट’ नहीं है । वह सामाजिक माध्यमों पर सबसे अधिक चर्चित होनेवाला नया शब्द भी नहीं है । वह एक लय है । वह संयम है । वह श्वास है । वह ऐसा भोजन है, जिसमें हिंसा और अतिरेक का स्थान नहीं है । वह निद्रा, शांति और आत्मसंयम है । वह शरीर के विरुद्ध निरंतर चलनेवाला युद्ध नहीं, अपितु शरीर के साथ सामंजस्यपूर्वक जीने का ज्ञान है । संभव है कि सभी पॉडकास्ट, शोधपत्र, उपकरण और आधुनिक प्रवृत्तियों के इस युग के पश्चात आधुनिक मनुष्य अंततः वहीं पहुंच जाए, जहां मेरी दादी ने बहुत पहले शांतिपूर्वक आरंभ किया था – सूर्योदय से पहले, मौन में, खाली पेट, स्थिर श्वास के साथ और शांत मन से !
(समाप्त)
लेखक : श्री. मयंक जैन
(श्री. मयंक जैन वृत्तचित्र निर्माता तथा ‘रूट स्टॉक फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशक हैं । उनका हाल में वृत्तचित्र ‘क्रिमसन क्रिसेंट – द लास्ट क्वार्टर’ दक्षिण एशिया और यूरोप में कट्टरतावाद पर दो दशकों के क्षेत्रीय अध्ययन पर आधारित है ।)
(साभार : ‘न्यूज 18’ समाचार चैनल)
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सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
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