जब कोई युवक अधिवक्ता बनता है, तब हम उसे ‘एक सफल व्यावसायिक अधिवक्ता बनने, प्रचुर धन कमाने, सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करने, महाधिवक्ता बनने, उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने की, साथ ही वह राजनीति में आए’, ऐसी कामना करते हैं । ऐसा कुछ भी न करते हुए अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने मात्र धर्मरक्षा का कंटीला मार्ग चुना । अयोध्या में श्रीराममंदिर की न्यायालयीन लडाई पर विजय पाने में प्रखर धर्माभिमानी पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी सहित उनके सुपुत्र अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन का भी बडा योगदान है । श्रीराममंदिर के पश्चात वे काशी, मथुरा, धार (मध्य प्रदेश) स्थित भोजशाला जैसे विविध मंदिरों की मुक्ति के लिए न्यायालयीन लडाई लड रहे हैं । इस कारण देश में उनकी पहचान ‘टेंपल वॉरियर्स’ (मंदिर योद्धा) ऐसी बन गई है । अधिवक्ता विष्णु जैन ‘हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के प्रवक्ता हैं । वे वक्फ बोर्ड कानून, प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट आदि हिन्दू विरोधी कानूनों के विरुद्ध भी लड रहे हैं । बंगाल में हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा रोकने के लिए वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया जाए, इसके लिए उन्होंने कुछ दिन पूर्व ही न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की है । वर्ष २०१९ के अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन में अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन का आध्यात्मिक स्तर ६१ प्रतिशत होने की घोषणा की गई ।

विशेष सदर

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी मावले और सैनिकाें का त्याग सर्वोच्च है, ठीक वैसे ही आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ तथा राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा के लिए ‘सैनिक’ के रूप मे कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्म-रक्षण के संघर्ष की जानकारी देने वाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’ इस लेखमाला के द्वारा दूसरों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से अपने मन की चिंता दूर हो कर उत्साह उत्पन्न होगा ! – संपादक
१. पिता के समान देश और धर्म की रक्षा का संकल्प आगे जारी रखने का निश्चय
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन का जन्म ९ अक्टूबर १९८६ को हुआ । उन्होंने बचपन से ही अपने पिताजी को राष्ट्र एवं धर्म के उदात्त कार्य के लिए न्यायालयीन लडाईयां लडते देखा । इस कारण उन्होंने भी पिताजी के पदचिह्नों पर चलकर वर्ष २०१० में बालाजी विधि महाविद्यालय से पदवी प्राप्त की । वहां से कानून के क्षेत्र में उनकी सेवा आरंभ हुई । वर्ष २०१६ में सर्वोच्च न्यायालय की वकालत की पदवी उत्तीर्ण करने के पश्चात उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में वकालत करने का परवाना (लाइसेंस) मिला । अधिवक्ता बनने के पश्चात उन्होंने अयोध्या प्रकरण का पहला ही अभियोग सर्वोच्च न्यायालय में प्रविष्ट किया । उन्हें इसकी पूरी जानकारी थी कि ‘यह मार्ग कांटों से भरा है एवं व्यवहारिक रूप से हानिकारक है ।’ ऐसा होते हुए भी उन्होंने धर्मरक्षा के मार्ग पर जीवन समर्पित कर दिया ।
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण भाव !

सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी पर अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन की अपार श्रद्धा है । व्यासपीठ कोई भी हो, वे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का स्मरण किए बिना भाषण आरंभ नहीं करते, साथ ही कोई भी सफलता मिलने पर उनके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करना भी नहीं भूलते ।
२. धर्म के लिए लडने की प्रेरणा कहां से मिली ?
यह सब कार्य देखकर अधिवक्ता जैन की माताजी उनसे कहती थीं, ‘संकटों से भरा ऐसा काम करके क्या मिलेगा ? इस मार्ग में अनेक संकटों का सामना करना पड सकता है ।’ इस कारण ‘इस प्रकार की बातें न करके एक साधारण जीवन बिताएं’, ऐसा प्रत्येक माता को लगता है । वर्ष १९९३-९४ में मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे । तब अधिवक्ता विष्णु शंकर छोटे थे । सिंह के मुख्य सचिव ए.पी. सिंह ने एक रात घर आकर पिताजी को एक प्रस्ताव देकर राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा का काम छोडने की चेतावनी दी । तब पिताजी पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी अपने तत्त्व पर अटल रहे एवं सिंह का प्रस्ताव ठुकरा दिया । यह प्रसंग अधिवक्ता विष्णु शंकर को धर्म के लिए लडने की प्रेरणा देनेवाला सिद्ध हुआ ।

इस एक प्रसंग के पश्चात अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन को धर्म के लिए लडने की कभी न समाप्त होनेवाली प्रेरणा मिली । उन्होंने कहा, ‘वर्ष २०१३ में वकालत में मैं नया ही था एवं दिल्ली में वकालत कर रहा था । तब मेरे पिताजी को (पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी को) दमे का दौरा पडा । उस समय चिकित्सालय में डॉक्टर ने कहा, ‘पिताजी के जीने की संभावना अल्प है । उनके पास ‘वेंटिलेटर’ भी न होने के कारण आगे क्या करना है, इस विषय में वे कुछ भी नहीं बता सकते । आपको जो उचित लगे वह करें । वे ‘सेप्टिसीमिया’ से ग्रस्त हैं एवं उनके बचने की संभावना अल्प है ।’ वे सचमुच मृत्यु शय्या पर पडे हुए थे । उस मृत्यु शय्या से मेरे पिताजी ने मुझे बताया, ‘विष्णु, ‘टीलेवाली मस्जिद’ अभियोग की सूचना (नोटिस) भेजना मत भूलना । यदि हम अंतिम अवधि चूक गए, तो अभियोग रद्द हो सकता है ।’ यह शब्द सुनकर मैं पूर्ण रूप से हिल गया । इससे मुझे अपने समाज, देश, धर्म एवं राष्ट्र के लिए उनके मन में कितनी प्रतिबद्धता है, यह दिखाई दिया । इस घटना के पश्चात मैंने निश्चय किया कि मेरे जीवन में जो कुछ समय शेष होगा, वह मैं सदियों से हम पर थोपी गई ऐतिहासिक गलतियां एवं अन्याय सुधारने में ही व्यतीत करूंगा ।’
‘अपमान से सम्मान तक’ की कठोर यात्रा !

इस युवक अधिवक्ता को हम दूरदर्शन पर प्रतिदिन देखते रहते हैं । श्रीराममंदिर हो, वक्फ कानून हो, काशीविश्वेश्वर मंदिर हो अथवा मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि हो, ऐसे विविध विषयों पर वे दूरदर्शन पर होनेवाले वाद-विवादों में हिन्दुओं का पक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं । राष्ट्रीय स्तर के न्यायालयीन विषयों पर भी उनका मत लिया जाता है । इस स्तर पर आने के लिए उन्हें बहुत कष्ट, अपमान एवं तिरस्कार सहन करना पडा । बडे पद पर स्थित लोग अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन से कहते थे, ‘बेटा, तुम पिताजी जैसे (पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी जैसे) मत बनो ! वे जीवन में प्रगति नहीं कर सके । वे जिस डाली पर बैठते हैं, वे वह डाली ही तोड देते हैं । वे पागल हैं ।’ यह सुनकर अधिवक्ता विष्णु शंकर निराश नहीं हुए । अपितु राष्ट्र एवं धर्म के लिए लडने का उनका निश्चय और भी दृढ होता गया । (वास्तव में पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने इस जन्म में ऐहिक एवं पारमार्थिक दृष्टि से जो साध्य किया है, वह उनकी आलोचना करनेवाले कभी समझ पाएंगे क्या ? उन्होंने जो साध्य किया है, उसे साध्य करने के लिए एवं उसे समझने के लिए जन्म-जन्मांतर की साधना होनी चाहिए । – संपादक)
३. भारत अखंड ‘हिन्दू राष्ट्र’ बने, इस ध्येय के लिए व्यक्तिगत जीवन का समर्पण
जून-जुलाई की छुट्टियों में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं अधिवक्ता विदेश घूमने जाते हैं । तब अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन वाराणसी, काशी के स्थानीय अभियोग देखते रहते हैं अथवा गांवों में घूमकर हिन्दू विरोधी कानूनों के विषय में जनजागृति करते रहते हैं । उन्हें अपने व्यवसाय से जो कुछ धन प्राप्त होता है, वह सब राष्ट्र एवं धर्म के कार्य के लिए उपयोग करते हैं । ‘भारत में रामराज्य की एवं ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना हो ! यह देश अखंड ‘हिन्दू राष्ट्र’ बने ! हिन्दुत्व की पहचान संपूर्ण विश्व को हो’, उन्हें ऐसा ही लगता रहता है । पूरे विश्व को प्रभु श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं भगवान शिव का दर्शन मिले, यही उनका ध्येय है ।
आकुर्डी (पुणे) स्थित ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर मंडल’ द्वारा अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन को ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय पुरस्कार २०२५’ प्रदान किया गया ।
४. विविध कार्यक्रम, अधिवेशन एवं परिषदों के माध्यम से न्यायालयीन जागृति
न्यायालयीन कामकाज में व्यस्त होते हुए भी पूरे देश में होनेवाली महत्त्वपूर्ण परिषदों एवं अधिवेशनों में वे उपस्थित रहते हैं । गोवा में हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से होनेवाले अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन में प्रतिवर्ष उनकी उपस्थिति रहती है । इस माध्यम से कानून के विषय में वे हिन्दुत्वनिष्ठों का प्रबोधन करते रहते हैं । इसके साथ ही वे विविध अधिवक्ता परिषदों में उपस्थित रहकर अधिवक्ताओं को भी संबोधित करते हैं ।

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की ओर से महाराष्ट्र में विभिन्न स्थानों पर मंदिर अधिवेशनों का आयोजन किया गया । उनमें सहभागी होकर उन्होंने मंदिर के न्यासियों का संबंधित कानूनों के विषय में मार्गदर्शन किया । विभिन्न संगठनों के कार्यक्रमों में भी वे सहभागी होते हैं ।
शरीर में प्राण रहने तक मैं धर्म के लिए संघर्ष करता रहूंगा । – अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन

शरीर में प्राण रहने तक मैं धर्म के लिए संघर्ष करता रहूंगा । जिस प्रकार हमने श्रीराममंदिर के लिए अभियोग लडा, उसी प्रकार ज्ञानवापी के लिए एवं मथुरा के लिए अभियोग लड रहे हैं । मध्य प्रदेश के भोजशाला स्थित सरस्वती माता के मंदिर के लिए भी अभियोग लड रहे हैं । ‘ज्ञानवापी मुक्त होनी चाहिए’, छत्रपति शिवाजी महाराज की यह अंतिम इच्छा थी, उसके लिए हम यह अभियोग लड रहे हैं । कुछ दिनों पहले मैंने शनिवारवाडा का भ्रमण किया, तब वहां क्षतिग्रस्त स्थिति में अखंड हिन्दुस्थान का चित्र मिला । वीर सावरकर एवं छत्रपति शिवाजी महाराजजी का अखंड हिन्दू राष्ट्र का स्वप्न था । उसके लिए वह चित्र पुनः अच्छी स्थिति में आए, इसके लिए प्रयास होने चाहिए ।
५. समाचार चैनलों के माध्यम से हिन्दुओं का पक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन को विभिन्न समाचार चैनलों पर हिन्दू विरासत स्थलों और हिन्दू-विरोधी कानूनों के विषय में चर्चा के लिए आमंत्रित किया जाता है, वैसे ही उनसे वार्तालाप भी किया जाता है । उसके माध्यम से भी वे हिन्दू धर्म के पक्ष में सटीक प्रतिवाद करते हैं और अपना धर्माभिमान प्रकट करते हैं । इससे उनकी धर्मरक्षा की लगन दिखाई देती है ।
धार्मिक विरासत स्थलों का संरक्षण एवं उन्हें पुनः स्थापित करने के लिए अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के कानूनी प्रयास !
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन एवं उनके पिताजी पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने अयोध्या, मथुरा, काशी, ताजमहल, भोजशाला, कुतुब मीनार, इन सभी प्रकरणों पर गहन संशोधन किया है । इन सभी प्रकरणों में उन्होंने आधार सिद्ध किया है । इन प्रकरणों में सफलता मिलने तक जीवन के अंत तक लडने का उनका निश्चय कायम है ।
१. धार (मध्य प्रदेश) स्थित भोजशाला प्रकरण

अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने इंदौर (मध्य प्रदेश) स्थित जिला न्यायालय में अभियोग प्रविष्ट किया है । उसमें ‘हिन्दुओं को भोजशाला स्थित श्री सरस्वती मंदिर में पूरे वर्ष पूजा करने का धार्मिक अधिकार दिया जाए’, ऐसी मांग की है, साथ ही उन्होंने भोजशाला प्रकरण में पुरातत्व विभाग का सर्वेक्षण करने की मांग करनेवाली याचिका प्रविष्ट की है । इस प्रकरण में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में ठोस रूप से वादविवाद किया है ।
२. संभल (उत्तर प्रदेश) स्थित जामा मस्जिद एवं श्री हरिहर मंदिर प्रकरण

अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने जिला न्यायालय में संभल की जामा मस्जिद के स्थान पर श्री हरिहर मंदिर होने का दावा प्रविष्ट किया । उसके पश्चात जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के आदेश दिए गए । सर्वेक्षण दल सहित वे भी वहां उपस्थित थे । इस काल में धर्मांधों ने पत्थरबाजी करके दंगा किया । उस माध्यम से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के प्राण लेने का उनका उद्देश्य था । पुलिस द्वारा कार्रवाई कर नियंत्रित किए गए धर्मांध आरोपी ने वैसा स्वीकार भी किया है ।
३. ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ को चुनौती
‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ के कानून द्वारा हिन्दुओं की आवाज दबाई गई है । वर्ष १९९१ में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा बनाए गए इस कानून के कारण १५ अगस्त १९४७ के पूर्व के धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में थे, उसी स्थिति में रखने का निर्णय लिया गया । इस कानून ने मंदिर के लिए न्यायालय में जाने का हिन्दुओं का अधिकार छीन लिया । इस कानून द्वारा मंदिरों के इस्लामी धार्मिक स्थल में हुए परिवर्तन को स्थायी रखा गया है । इसके विरुद्ध अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन एवं उनके पिताजी पू. हरि शंकर जैनजी ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है ।
४. मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद प्रकरण

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के स्थान पर शाही ईदगाह मस्जिद बनाई गई है । यह भूमि पुनः हिन्दुओं को मिले, इसके लिए अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अभियोग प्रविष्ट किया है । इस प्रकरण में मुस्लिम पक्ष के सर्वोच्च न्यायालय में जाने के कारण वहां भी सुनवाई जारी है ।
५. वक्फ बोर्ड को चुनौती

वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार दिए गए हैं । उसके विरुद्ध अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने ‘वक्फ एक्ट १९९५’ के असंवैधानिक प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का निश्चय किया है ।
६. आगरा स्थित ताजमहल का प्रकरण

वर्ष २००५ में ताजमहल को वक्फ बोर्ड की संपत्ति घोषित किया गया । अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने इस दावे पर विरोध दर्शाया है एवं वे इस दावे को कानूनी रूप से चुनौती दे रहे हैं । उनके मत में, ताजमहल शाहजहां ने नहीं बनवाया था; अपितु वह राजा जय सिंह का महल था, जो शाहजहां के ३०० वर्ष पूर्व की रचना है ।
७. कुतुब मीनार के स्थान पर पूजा करने की मांग

कुतुब मीनार के स्थान पर पहले मंदिर था, अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने ऐसा दावा किया है । उस स्थान पर हिन्दुओं को पूजा करने की अनुमति मिले, अधिवक्ता जैन ने ऐसी मांग की है ।
गुणवत्ता एवं अन्नसुरक्षा के विषय में ‘गोकुल’ संघ की ओर से कभी भी समझौता नहीं किया गया है ।
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