‘प्राच्यम् स्टुडियो’ के, अर्थात जगत के प्रथम ‘हिन्दू ओटीटी’के उद्गाता एवं ‘निर्भय हिन्दुत्वयोद्धा’ कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (निवृत्त) !

कैप्टन प्रवीण के. चतुर्वेदी (निवृत्त) सागरी शौर्य एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान के संगमस्थल पर खडे हैं । भूतपूर्व नौकानायक एवं वर्तमान प्रसिद्धीमाध्यम क्षेत्र में उद्यमी चतुर्वेदी ‘प्राच्यम् स्टुडियोज’ के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं । उनका निजी फिल्म स्टूडियो एवं भारतीय सांस्कृतिक आशय को समर्पित ‘ओटीटी प्लैटफॉर्म’ है । भारत का इतिहास एवं वर्तमान के वादग्रस्त कथावाचन काल में चतुर्वेदी प्रभावी कथानक प्रस्तुत करनेवाले एवं ‘हिन्दुत्वयोद्धा’ के रूप में सामने आए । फिल्म एवं डिजीटल माध्यमों द्वारा वे देश की विरासतों, धरोहरों एवं परंपराओं के प्रति अभिमान पुनर्जागृत कर रहे हैं । यह लेख उनकी जीवनयात्रा, चुनौतियां एवं नई पीढी के लिए सांस्कृतिक स्तंभो के निर्माण में उनके द्वारा किए कार्य पर प्रकाश डालता है ।

कैप्टन प्रवीण के. चतुर्वेदी (निवृत्त)

विशेष सदर


छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी मावले और सैनिकाें का त्याग सर्वोच्च है, ठीक वैसे ही आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ तथा राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा के लिए ‘सैनिक’ के रूप मे कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्म-रक्षण के संघर्ष की जानकारी देने वाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’ इस लेखमाला के द्वारा दूसरों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से अपने मन की चिंता दूर हो कर उत्साह उत्पन्न होगा ! – संपादक

१. कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (निवृत्त) को मिली प्रेरणा तथा उनका जीवनप्रवास

कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (निवृत्त) का बचपन से ही भारतीय संस्कृति से परिपूर्ण एवं अध्यात्मिक वातावरण मिला । वे अनेक बार अपने आध्यात्मिक गुरु स्वामी शिवानंद (पूर्वाश्रम के श्री. पंडित शिव शंकर त्रिपाठी) के मार्गदर्शन को पूरा श्रेय देते हैं, जिन्होंने उनके मन पर भारत का तत्त्वज्ञान, संस्कृति, परंपरा एवं विज्ञान के विश्लेषण एवं शोधकार्य के प्रति रुचि निर्माण की । इन संस्कारों में पले-बढे होने से सनातन धर्म के विषय में उनकी श्रद्धा अधिक सुदृढ हो गई और राष्ट्र के सांस्कृतिक परंपराओं के लिए कुछ करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई । इसी आंतरिक प्रेरणा ने उन्हें एक विशेष स्थान पर पहुंचा दिया । एक फिल्म निर्माता की यात्रा का प्रारंभ जहाज की डेक से हुआ । कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने मरिन अधिकारी के रूप में प्रशिक्षण लिया तथा आगे वे कैप्टन पद तक पहुंचे । सागरी जीवन में मिला अनुशासन एवं व्यापक दृष्टिकोण, बाद में माध्यम एवं विचारधारा की प्रचंड लहरों में मार्ग ढूंढने में बहुत उपयुक्त सिद्ध हुआ । उस काल में भी उन्होंने मातृभूमि की सांस्कृतिक परंपराओं से नाता कभी नहीं तोडा । ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक के साथ किए एक ‘पॉडकास्ट’ (भेटवार्ता) में उन्होंने बताया कि सेवा के समय ही उनका फिल्मजगत से संबंध आया और वहीं से दृक्-कथन (visual storytelling) की कला में रुचि निर्माण हुई । जब वे जहाज पर थे तब फिल्मों से परिचय प्रेरणादायी सिद्ध हुआ और उनके जीवन में महत्त्वपूर्ण मोड आया ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा ‘सनातन धर्मश्री’ पुरस्कार स्वीकारते हुए कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (निवृत्त)

२. फिल्म निर्मिति की शिक्षा एवं उसका उद्देश्य

एक सफल सागरी कार्यकाल पीछे छोडकर उन्होंने अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्थाओं में फिल्म शिक्षा के लिए प्रवेश लिया । उन्होंने ‘यूनिवर्सिटी ऑफ साऊथर्न कैलिफोर्निया’ (यू.एस्.सी.) एवं ‘युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया लॉस एंजेलिस’ (यू.सी.एल्.ए.) में फिल्म निर्मिति की शिक्षा ली तथा जागतिक फिल्म उद्योग के केंद्रस्थान पर कलाशिक्षा आत्मसात की । श्री. चतुर्वेदी ने केवल शैक्षणिक ज्ञान पर ही बल नहीं दिया, अपितु वे प्रत्यक्ष उद्योग में उतरे एवं अपना कौशल्य बढाया । उन्होंने ‘यूनिवर्सल स्टूडियोज्’, ‘पैरामाऊंट पिक्चर्स’ एवं ‘ट्वेंटियथ सेंच्युरी फॉक्स’ जैसे बडे हॉलिवुड स्टूडियो के साथ काम किया । इस काल में उन्होंने उद्योग के अनेक श्रेष्ठ व्यावसायिकों को सहयोग करते हुए उच्च दर्जे की फिल्म निर्मिति का सीधा अनुभव लिया । उन्होंने ‘मात्रा से अधिक महत्त्वपूर्ण है दर्जा’, इस तत्त्व को ही सर्वाेपरि माना । उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि ‘ऑनलाईन’ अनेकानेक बातें उपलब्ध हैं, तब भी उनमें से कुछ ही बातें ऐसी हैं जिन्हें  पुन: पुन: देखा जाता है (repeat value) और इसी पर विशेषरूप से ध्यान देना सुनिश्चित किया । जिससे कमी को पूरा किया जा सके । उनके काल में उन्हें ध्यान में आया कि पश्चिम में दृश्य दर्जे की ओर जानेवाला मार्ग अधिक समय लेता है तथा उसकी प्रक्रिया मंद होती है; परंतु उसका परिणाम हमेशा गूंजता रहता है । यह भान एवं एक धधकता उद्देश्य लेकर कैप्टन चतुर्वेदी ने पुन: भारत की ओर अपना ध्यान मोडा ।

‘प्राच्यम् स्टुडियो’का बोधचिन्ह

३. ‘प्राच्यम् स्टुडियोज’ की निर्मिति एवं उद्देश्य

वर्ष २०१२ में गुरु की प्रेरणा से और देशभक्ति की भावना मन में लेकर कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (निवृत्त) भारत लौटे । उनकी दृष्टि सुस्पष्ट थी कि भारत की समृद्धशाली संस्कृति एवं परंपराओं का तालमेल स्वयं निर्मित की हुई फिल्मों में बिठाना था । ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक से बात करते समय उन्होंने स्पष्टरूप से कहा, ‘‘मुझे तीव्रता से लगा कि माध्यमों द्वारा भारतीय संस्कृति का अपर्याप्त एवं अपवित्र प्रस्तुतीकरण हो रहा है । इसलिए मैंने उसमें सुधार करने का निश्चय किया है ।’’ उनका पहला उपक्रम था, ‘मूनलाईट पिक्चर्स’ नामक फिल्मनिर्मिति संस्था की स्थापना ! इसके द्वारा उन्होंने भारतीय विषयों पर आधारित ‘कंटेंट’ बनाना प्रारंभ किया । इस अनुभव पर आधारित आगे उन्होंने २ युवा कलाकारों सहित ‘प्राच्यम् स्टुडियोज’ आरंभ किया । यह उपक्रम उनके कार्य की नींव सिद्ध हुआ । ‘प्राच्यम्’ यह संस्कृत से लिया गया शब्द है जिसका अर्थ है ‘उद्बोधक’ ! ‘प्राच्यम्’ केवल एक निर्मिति संस्था नहीं थी । चतुर्वेदी ने इसका स्वरूप एक खरे भारतीय, सनातनी माध्यम मंच के रूप में बनाया, जो उन्हें प्रतीत होनेवाली युरो-केंद्रित एवं हिन्दूविरोधी प्रवृत्तियों के विरोध में ठोस उत्तर सिद्ध हो !

वर्ष २०२० तक ‘प्राच्यम्’ जगत का पहला खरे अर्थ में ‘हिन्दू ओटीटी (ओवर द टॉप) स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म’ के रूप में उदय हुआ । यह ‘ऑनलाईन’ चैनल संपूर्णरूप से भारतीय संस्कृति, इतिहास, परंपरा, तत्त्वज्ञान एवं विज्ञान पर आधारित फिल्म, डोक्यूमेंट्री एवं धारावाहिकों को समर्पित है । यह ‘हमारे लिए, हमारे द्वारा’ इस सांस्कृतिक दृष्टिकोण से साकार हुआ माध्यम है ।

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४. ‘प्राच्यम् स्टुडियोज’ की विशेषताएं एवं उद्देश्य

‘प्राच्यम्’ की विशेषता अर्थात उसकी निडरता से भारतीय दृष्टिकोण के प्रति कटिबद्धता ! जिस काल में जागतिक स्ट्रीमिंग आस्थापन प्रमुखरूप से पश्चिमी दृष्टिकोण के ‘कंटेंट’ प्रस्तुत करते हैं, ऐसे में ‘प्राच्यम्’ ने स्वयं की पहचान ‘कैन्सल-प्रूफ प्लैटफॉर्म’ के रूप में निर्माण की । वहां हिन्दू आवाजों को सुरक्षित व्यासपीठ मिलता है तथा भारतीय दृष्टिकोण खुलकर प्रस्तुत किए जा सकते हैं । कुछ वर्षाें में ही ‘प्राच्यम्’ के ‘कंटेंट’ लायब्रेरी में सैकडों वीडियो, शॉर्ट फिल्म्स एवं धारावाहिकों का समावेश हो गया, जिन्हें भारत में एवं जागतिक भारतीय (भारतीय वंश के) दर्शकों से ‘मिलियन्स’ (लाखों) ‘व्यूज’ (दर्शक) मिले । यह समृद्धि अर्थात एक सांस्कृतिक क्रांति है जो भारतीय दृष्टिकोण से भारतीयों के लिए जागतिक माध्यम विश्व में उठकर दिखाई देनेवाली है । ‘प्राच्यम् स्टूडियोज’ का प्रारंभ उच्च दृष्टिकोण लेकर हुआ । वह है ‘जागतिक स्तर पर भारतीय कथानक पुन: खडा करना एवं उसे उचित स्थान दिलवाना ।’ उनका ब्रीदवाक्य ही है, ‘Be Unapologetic!’ (निडर तथा निश्चयपूर्वक भूमिका में रहें !) । कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) एवं उनके समूह को यह स्पष्ट था कि कथाकथन (story telling) में उपयोग किया जानेवाला ‘सॉफ्ट पॉवर’ किसी भी नीति समान प्रभावी हो सकता है । विशेषतः विचारधारा और सामाजिक सोच निर्धारित करने के लिए !

एक भेंटवार्ता में कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने कहा कि ‘प्राच्यम्’ फिल्म एवं कथाकथन (STORY TELLING) के माध्यम से भारत की गौरवशाली परंपरा एवं संदेश का स्मरण कराता है । यह दृष्टिकोण कार्यान्वित करने के लिए उन्होंने जीतोड शोधकार्य एवं उच्च दर्जें के निर्मितिमूल्यों (PRODUCTION COST) का सफल तालमेल बिठाया है । ‘प्राच्यम्’ ने विविध क्षेत्रों के जानकारों का ‘इंडॉलॉजिस्ट’ (भारतीय विद्या), शास्त्रज्ञ, इतिहासकार, शिक्षाविशेषज्ञ, पर्यावरणप्रेमी, तकनीकी जानकार इत्यादि विशेषज्ञों का मिश्रित और समर्पित समूह तैयार किया, जो उनके कंटेंट में तथ्यात्मक प्रामाणिकता सुनिश्चित करते हैं । ‘प्राच्यम्’ के कार्य का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है कि हिन्दू संस्कृति के विषय में निर्माण हुआ दीर्घकालीन अपप्रचार एवं पूर्वग्रहदूषित धारणा को मिटा देना !

५. हिन्दूविरोधी कथानकों का प्रतिवाद एवं जगत के पहले ‘हिन्दू ओटीटी’ का जन्म

गहराई तक जिनकी जडें हों, ऐसे कथानकों (नैरेटिव) के विरोध में खडा रहना, यह चुनौतियां स्वीकारे बिना नहीं होता और इसीलिए कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) को भी वैचारिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में अनेक अडचनों का सामना करना पडा । इसमें से मुख्य चुनौती थी ‘प्राच्यम्’ नामक स्वतंत्र प्लैटफॉर्म की निर्मिति करने में मुख्यप्रवाह की प्रसिद्धी देनेवाली वाहिनियों पर ‘सेन्सरशिप’ (नियंत्रण) ! यह एक बडी चुनौती थी । श्रीरामजन्मभूमि मंदिर की लडाई के विषय में उनके दल द्वारा बनाई गई लघुफिल्म प्रसारित करने के पश्चात, केवल कुछ ही घंटों में यू ट्यूब पर से निकाल दिया गया, इस विषय का प्रसंग वे बताते हैं । प्रभु श्रीरामचंद्र का भव्य मंदिर बनाने के लिए रामभक्तों ने अनेक दशकों तक किया संघर्ष दिखानेवाली लघुफिल्म (डोक्यूमेंट्री फिल्म) के वीडियो का समाज के अनेक लोगों द्वारा विरोध करने पर प्लैटफॉर्म का लेखन तैयार करनेवाले संभ्रम में पड गए । कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने बताया, ‘‘उन्होंने हमारी यू ट्यूब वाहिनी बंद करने की धमकी दी । अनेक लोगों द्वारा विनती किए जाने पर यह वीडियो पुन: एक बार यू ट्यूब पर दिखाया जाने लगा । यह घटना आंखें खोल देनेवाली थी । जागतिक तकनीकी प्लैटफॉर्म पर हिन्दुओं की आवाज की असुरक्षितता अधोरेखित हो गई ।’’ पक्षपात के विरुद्ध की गई  शिकायतों के पश्चात कथानकों (नैरेटिव) के सामने खडी चुनौतियों को सामना किया जा सकता है । इसलिए असफलता के कारण निराश न होते हुए कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) और उनके सहयोगियों को आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा मिली । यू ट्यूब द्वारा लगाई गई बंदी के उपरांत ‘हिन्दू ओटीटी’ प्लैटफॉर्म की संकल्पना सामने आई । चतुर्वेदी के शब्दों में ‘प्राच्यम्’के कारण हिन्दुओं को उनकी स्वयं की आवाज मिली, जिसमें कोई भी बाधा नहीं ला सकता । तब भी स्वतंत्ररूप से प्लैटफॉर्म चलाना, यह भी अपनेआप में एक बडी चुनौती थी । उच्च दर्जे के लेखन की निर्मिति और उसके प्रसारण के लिए मूलभूत सुविधाओं को निर्माण करने में आर्थिक व्यय बहुत अधिक था । मुख्य प्रवाह का प्रसारण करनेवाले एवं ‘ओटीटी’ के पास भारी मात्रा में स्रोत होते हैं ।

कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने इसके लिए समाज के लोगों से आवाहन किया । ‘प्राच्यम्’ यह ‘न नफा न हानि’ इस तत्त्व पर चलनेवाला न्यास है और उसके कार्य के लिए दर्शकों को अनुदान देने का आवाहन करता है । कुछ वर्षाें में इस प्लैटफॉर्म को देखनेवालों की संख्या शीघ्र गति से बढनेवाली है । इससे यू ट्यूब अथवा इन्स्टाग्र पर ‘प्राच्यम्’के वीडियो दिखाने में हिचकिचानेवालों काे प्लैटफार्म से वीडियो भेजना आसान हो जाएगा । इस प्लैटफॉर्म पर से प्रसारित की गई प्रत्येक डॉक्यूमेंट्री फिल्म अथवा पॉडकास्ट (भेंटवार्ता) के नए सदस्यों की संख्या बढ रही है । इससे सूज्ञ दर्शकों का नेटवर्क बढ रहा है । इसका परिणाम केवल अवलोकन ही नहीं, इसके परे भी हो रहा है । यह प्लैटफार्म दर्शकों को उनकी पहचान के साथ सक्रीयरूप से सम्मिलित होने के लिए प्रवृत्त कर रहा है । सौभाग्य से कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) का असामान्य गहन शोधकार्य से युक्त भारतसंबंधी लेखन को देखकर ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक समूह उनके संपर्क में आया । कालांतर में ‘जागतिक संवाद की दृष्टि से भारतीय संस्कृति की प्रशंसा करने में ‘प्राच्यम्’ अधिक प्रोत्साहन दे सकता है’, इस प्रकार का लेखन तैयार करनेवालों का ‘इकोसिस्टम’ खडा करने में कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) का अनमोल योगदान है ।

‘प्राच्यम्’को मिली सफलता देखकर भारत के विषय में अन्य स्वतंत्ररूप से काम करनेवाले फिल्म निर्माता एवं यू ट्यूबर्स को अपना प्रकल्प बनाने हेतु प्रेरणा और उत्साह मिला । उनमें से कुछ ने ‘प्राच्यम्’से भागीदारी की अथवा कुछ ने कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) के दल का मार्गदर्शन लिया । सारांश में राष्ट्रीय प्रवाह में पर्यायी प्रसारमाध्यमों को वैध प्रमाणित करने में कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने सहायता की है । इससे उन्होंने सिद्ध कर दिया कि अपना उद्देश्य साध्य करने के लिए किसी के द्वारा परंपरागत स्टूडियो अथवा वाहिनियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है । इसप्रकार कुछ विशिष्ट कारणवश सेवा के लिए लेखननिर्मिति का लोकतांत्रीकरण करना, यह स्थायी विरासत (heritage) की परंपरा कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने निर्माण की ।

हिन्दू संस्कृति पुनर्जीवित करने के लिए योगदान


कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (निवृत्त) की हिन्दू संस्कृति पुनर्जीवित करने का योगदान शब्दों के परे हैं । वे लेखन की निर्मिति एवं समाज को खडा करने का प्रयास कर रहे हैं । हिन्दुत्व के विषय का विचार करनेवालों का गुट और आंदोलन में उनका सक्रीय सहभाग होता है । जुलाई २०२४ में गोवा के वैश्विक हिन्दू राष्ट्र महोत्सव के प्रमुख सम्मेलन में कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने भाषण द्वारा अत्यधिक लगन से विषय प्रस्तुत किया कि ‘हिन्दुओं को एकत्र आने की आवश्यकता है !’

श्री. प्रवीण चतुर्वेदी

वे बोले,

‘‘हिन्दू धर्म पर होनेवाले जागतिक आक्रमणों का सामना करने के लिए धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता का मिलाप कर संगठितरूप से उसका सामना करना चाहिए ।’’ उनके इन शब्दों से ‘राजकीय एवं सांस्कृतिक पुनर्जीवितता एक ही समय पर साध्य होनी चाहिए’, यह अधोरेखित होता है । अर्थात ‘अध्यात्मविषयी कृति, धार्मिक विधि एवं भक्ति के माध्यम से निर्माण हुई आध्यात्मिक शक्ति, धार्मिक सभ्यता का पुनर्जीवन करने हेतु सामाजिक कृति समान ही महत्त्वपूर्ण है । उन्होंने इस पर बल दिया कि समाज में परिवर्तन होने के लिए व्यक्तिगत साधना ही उसकी नींव है । वे कहते हैं कि ‘प्राच्यम् में प्रत्येक व्यक्ति साधक है ।’ वे स्वयं भगवान शिव की दिशा में जानेवाले ‘अघोरी’ मार्ग की साधना करते हैं । उनके दृष्टिकोण में आध्यात्मिकता एवं राष्ट्रवाद की छाप है । धर्मनिष्ठा एवं आधुनिकता, इनमें अथवा परंपराओं का समर्थन करना एवं आधुनिकता पर डटे रहना, इनमें वे विभाजन नहीं करते ।

६. भारतीय संस्कृति सर्वसमावेशक है यह दर्शाने हेतु किए विविध प्रयत्न

लगभग शताब्दीभर से विशेषरूप से पराधीनता और उसके उपरांत के काल में भारतीय संस्कृति को पिछडी अथवा अनुकरण करनेवाली के रूप में दिखाने का प्रयत्न हुआ है । कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने इस गलत दृष्टिकोण को तथ्याधारित कथनों से बदलने का निर्धार किया । ‘प्राच्यम्’के अंतर्गत घोषित हुए एक महत्त्वाकांक्षी उपक्रम, अर्थात ‘१० इंडिक फिल्म्स’ यह डॉक्यूमेंट्री धारावाहिक (DOCUSEREIS) ! इस धारावाहिक में ‘आर्यन इन्वेशन थियरी’से लेकर महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों के वैज्ञानिक कालनिर्धारण तक, इसके साथ ही प्राचीन भारतीय ज्ञान के जागतिक योगदान तक अनेक विषयों का समावेश है । इसकी प्रत्येक फिल्म का उद्देश्य है कि एक मिथक (MYTH) का  खंडन करना अथवा भारतीय परंपराओं के उपेक्षित पहलुओं को अधोरेखित करना, जिससे शोधकार्य का अभाव मिटाना एवं भारतविरोधी लॉबी के बढे-चढे कथा-प्रपंच को प्रभावी उत्तर देना !

कठोर शोधकर्ता एवं दर्जेदार सिनेमैटिक कथन पर निवेश कर (पूंजी लगाकर) कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) दर्शकों को ऐसे  कंटेंट दे सकते हैं, जो केवल जानकारीपूर्ण ही नहीं होगी, अपितु उनमें आधुनिक काल में हो रहे वैचारिक संघर्ष में सक्रीय भाग लेने का आत्मविश्वास भी निर्माण करेगा ।

Hindu Resurgence to Hindu Rashtra | Ft. @Prachyam CEO Praveen ChaturvediSanatan Prabhat Podcast

डॉक्यूमेंट्री फिल्म के अतिरिक्त भी कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) के नेतृत्व में ‘प्राच्यम् स्टुडियोज’ विविध प्रकार के कंटेंट तैयार कर रहा है, जो हिन्दू सांस्कृतिक पुनर्जागरण को बढावा देता है । उसमें से एक उल्लेखनीय उपक्रम है ‘द चेंजमेकर्स’ – एक पॉडकास्ट एवं वीडियो भेंटवार्ता धारावाहिक (पोडकास्ट सीरीज), जिसमें कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) स्वयं सूत्रसंचालक की भूमिका निभाते हैं । इस धारावाहिक में वे प्रभावशाली विचारक, कार्यकर्ता एवं आध्यात्मिक नेता से संवाद साधते हैं, उदा. उन्होंने ‘वर्ल्ड हिन्दू फाउंडेशन’के संस्थापक स्वामी विज्ञानानंद से संवाद साधते हुए ‘हिन्दू  मैनिफेस्टो (घोषणापत्र) एवं हिन्दू राष्ट्र की रूपरेखा’ पर चर्चा की ।

जून २०२४ में कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (निवृत्त) का ‘पॉडकास्ट’ (भेटवार्ता) लेने के पश्चात उन्हें ‘सनातन प्रभात’का अंक भेटस्वरूप देते हुए समूह संपादक श्री. योगेश जलतारे

दूसरे एक हाल ही में प्रसारित हुई कडी के एक भाग में उन्होंने लेखक श्री. राजीव मल्होत्रा से संवाद साधकर ‘हिन्दू धर्म पर छिपे युद्ध’ इस विषय पर चर्चा की । उसमें उन्होंने शिक्षा एवं माध्यमों के क्षेत्र में हो रहे बौद्धिक संघर्ष की पडताल की है  ।

इस प्रकार के कंटेंटद्वारा चतुर्वेदी एवं उनका समूह केवल डोक्यूमेंट्री फिल्म नहीं बनाते, अपितु हिन्दू विचारों का समर्थन करनेवालों की विविध आवाजों के लिए मुक्त (ओपन) व्यासपीठ भी खडा कर रहे हैं । संवाद, भेंटवार्ता एवं फिल्म के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक अस्मिता एवं सातत्य की एक सुसंगत, इसके साथ ही गौरवशाली कथा की निर्मिति का सर्वसमावेशक प्रयत्न है ।

७. आगामी गतिविधियां

गहरे समुद्र से सांस्कृतिक पुनर्जागरण, यह कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) का प्रवास उनकी दूरदर्शिता एवं विश्वास का प्रमाण है । उनमें नौदल अधिकारियों का अनुशासन, फिल्म निर्माता की सृजनशीलता और हिन्दू संस्कृति के धर्मयोद्धा का उत्साह, इन गुणों का समावेश है । ‘प्राच्यम् स्टुडियो’ के माध्यम से उन्होंने फिल्म तैयार करनेवाले प्लैटफार्म निर्माण करने के साथ-साथ ऐसी आशा भी निर्माण की है कि इस प्लैटफॉर्म से भारत का खरा इतिहास भारतीयों द्वारा अभिमान एवं अचूकता से बताया जा सकता है । उनके नेतृत्व में ‘प्राच्यम्’ यह केवल स्टूडियो न होकर, क्रांति सिद्ध हुआ है । इससे कथानकों (नैरेटिव) के विरोध में युद्ध का रूपांतर भारतीय संस्कृति पुनर्जीवित होने में हो रहा है । उनके अभी हाल ही के वक्तव्य में कैप्टन चतुर्वेदी (निवृत्त) ने अपने अभियान के विषय में कहा है कि ‘भारतीय पहचान सिद्ध करना, यह अभिमान की बात है !’ इस अभियान में हिन्दूविरोधी आंधी, भारत के विरोध में आधुनिक प्रसारमाध्यमों का प्रभाव होते हुए हिन्दू संस्कृति को पुनर्जीवित कर परिवर्तन लानेवाली नौका वे चला रहे हैं और भारतीय कथानकों पर पुन: अधिकार जताने के इस प्रवास में अन्यों को सम्मिलित होने की प्रेरणा दे रहे हैं । केवल ‘सनातन प्रभात’की नजरों में नहीं, अपितु प्रत्येक भारतीय हिन्दू की दृष्टि से कैप्टन प्रवीण चतुर्वेदी (निवृत्त) ‘निर्भय हिन्दुत्वयोद्धा’ हैं ।

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