वैज्ञानिकों के शोधकार्य और ऋषि-मुनियों के ज्ञान में अंतर !

वैज्ञानिकों के शोधकार्य और ऋषि-मुनियों के ज्ञान में अंतर !

संसार की सभी भाषाओं में केवल संस्कृत भाषा में ही सर्वत्र एक जैसे उच्चारण होना

संसार की सभी भाषाओं में केवल संस्कृत भाषा में ही सर्वत्र एक जैसे उच्चारण होना

आयुर्वेद के विषय में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के तेजस्वी विचार !

‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।’ अर्थात ‘शरीर धर्माचरण का प्रथम साधन है ।’ शरीर स्वस्थ हो, तो साधना में शारीरिक समस्याएं नहीं आतीं । शरीर को सात्त्विक रखने से साधना में तीव्रगति से प्रगति होती है । ‘शरीर को सात्त्विक कैसे रखना चाहिए ?’, यह एलोपैथी नहीं, अपितु आयुर्वेद सिखाता है ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

‘संसार में चमत्कार जैसा कुछ नहीं होता । सबकुछ ईश्वर की इच्छा, अनिष्ट शक्तियां एवं प्रारब्ध के अनुसार होता है; परंतु यह बुद्धिवादियों को समझ में नहीं आता !’

पुलिसकर्मी यह ध्यान रखें !

‘पुलिस को ऐसा लगना चाहिए कि जनता पुत्रवत है, तभी उनकी नौकरी उचित पद्धति से होगी !’

हिन्दुओ, शत्रु सीमा लांघ रहा है; इसलिए अपनी रक्षा की तैयारी करो !

‘देवताओं द्वारा आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने का दिन है विजयादशमी !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

‘पूरे विश्व के विदेशी लोगों को भारत के विषय में प्रेम प्रतीत होता है, उसका कारण है भारत के संतों द्वारा सिखाई जानेवाली साधना तथा अध्यात्म, न कि नेता और शासनकर्ता !’

बालकों में राष्ट्रप्रेम उत्पन्न होने के लिए यह करें !

‘भावी पीढी आतंकवादी न बने, इसलिए विद्यालय के पाठ्यक्रम में ही हिन्दू धर्म में बताया गया ज्ञान, विज्ञान तथा अच्छे संस्कारों की सीख देने से बालकों के मन में राष्ट्रप्रेम उत्पन्न होगा ।’

ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए क्या करें ?

‘तन, मन, धन एवं अहं का त्याग होने पर तथा ईश्वर के प्रति भाव एवं भक्ति बढने पर ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है ।’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले