
‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।’ अर्थात ‘शरीर धर्माचरण का प्रथम साधन है ।’ शरीर स्वस्थ हो, तो साधना में शारीरिक समस्याएं नहीं आतीं । शरीर को सात्त्विक रखने से साधना में तीव्रगति से प्रगति होती है । ‘शरीर को सात्त्विक कैसे रखना चाहिए ?’, यह एलोपैथी नहीं, अपितु आयुर्वेद सिखाता है ।
‘हिन्दू राष्ट्र में प्रत्येक विद्यालय-महाविद्यालय में बचपन से ही ‘आयुर्वेद’ विषय सिखाया जाएगा । उसके कारण लोगों को बचपन से ही स्वास्थ्य की जानकारी ज्ञात होकर वे बीमारियों से दूर रह पाएंगे ।’
बीमारी होने पर व्यायाम करने की अपेक्षा बीमारी न हो; इसके लिए व्यायाम करें !
‘वृद्धावस्था में जोडों का दर्द, कमरदर्द, पीठदर्द आदि बीमारियां आने पर डॉक्टर लोगों को व्यायाम, योगासन आदि करने के लिए कहते हैं । यहां ध्यान रखनेयोग्य महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बीमारी होने पर व्यायाम करने की अपेक्षा बीमारी न हो; इसके लिए व्यायाम करना अधिक लाभकारी होता है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
सात्त्विकता एवं संगठन ही राष्ट्र के उत्कर्ष की चाबी – जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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