वारकरी संगठन एवं मंदिर महासंघ द्वारा प्रविष्ट याचिका पर पंढरपुर के न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय !

पंढरपुर : यहां के करोडों हिन्दुओं के इष्टदेवता ‘स्वयंभू’ श्री विठ्ठल-रुक्मिणी की मूर्तियों पर पुरातत्त्व विभाग की ओर से २३ एवं २४ जून को रासायनिक वज्रलेपन किया जाना था । इस संबंध में वारकरी संगठन, मंदिर महासंघ, साथ ही महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के श्री. पुरुषोत्तम (गणेश) लंके एवं बाळकृष्ण डिंगरे ने पंढणपुर के दिवानी न्यायालय की न्यायाधीशयांनी (कनिष्ठ स्तर) श्रीमती सोनाली राऊळ के न्यायालय में रासायनिक वज्रलेपन के विरोध में अभियोगा प्रविष्ट किया ता । इस प्रकरण में दोनों पक्षों का तर्क सुनकर न्यायालय ने अगले आदेश तक किसी भी प्रकार का विलेपन करने पर रोक लगाई है ।
🚩 विजय!
⚖️ पंढरपूर येथील श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मूर्तीवर करण्यात येणाऱ्या रासायनिक लेपनास न्यायालयाची तात्काळ स्थगिती!🛕वारकरी संघटना व @mandirmahasangh च्या याचिकेला मोठे यश!
मूर्तीचे पावित्र्य, परंपरा आणि धर्मशास्त्रीय तत्त्वे जपण्यासाठी घेतलेल्या भूमिकेला न्यायालयाची मान्यता pic.twitter.com/mQIZjUpL0c
— Mandir Mahasangh (@mandirmahasangh) June 22, 2026
इस संदर्भ में इस प्रकरण में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखनेवाले अधिवक्ता सुधीर रानडे ने निम्न जानकारी दी
१. अब तक मंदिर समिति ने ४ बार रासायनिक विलेपन किया तथा उसकी व्यर्थता ध्यान में आकर भी मंदिर समिति एवं पुरातत्त्व विभाग रासायनिक विलेपन करने पर अटल थे । हिन्दू धर्मशास्त्र के अनुसार मूर्ति में प्राण होते हैं तथा ‘संबंधित देवता का मूर्ति में अस्तित्व होता है तथा मूर्ति में देवत्व है’, इस आस्था से ही श्रद्धालु सभी धार्मिक कृतियां करते हैं । इसमें प्रातःकाल की आरती, रात की आरती से लेकर भोग लगाने तक की सभी कृतियां सम्मिलित होती हैं । अतः मंदिर समिति रासायनिक विलेपन करते समय मूर्ति को केवल पत्थर की मूर्ति मानकर रासायनिक विलेपन की कृति कर रही है, जो अनुचित है । मूर्ति को यदि अपवित्र वस्तुओं का स्पर्श होने पर मूर्ति में विद्यमान देवत्व नष्ट होता है ।
२. इस समय न्यायालय में पक्ष रखते समय उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का भी आधार लिया गया । इसमें सर्वाेच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि भक्तों की धार्मिक भावनाएं आहत करनेवाले निर्णय नहीं लिए जा सकते । इस समय न्यायालय में करवीर पीठ के शंकराचार्यजी का पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने रासायनिक विलेपन का सुस्पष्टता के साथ विरोध किया है । न्यायालय ने इसका भी संज्ञान लिया ।
३. केवल इतने पर ही न रुककर न्यायालय को यह बताया गया कि आयुर्वेदिक वज्रलेपन अधिक सुरक्षित एवं मंदिर परंपरा के लिए अनुरूप होता है ।
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