सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की विभिन्न कृतियों से प्रक्षेपित स्पंदनों का अध्ययन

‘मनुष्य की विभिन्न कृतियां प्रधानता से सत्त्वगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी होती हैं । उन गुणों के अनुसार संबंधित कृति से स्पंदन प्रक्षेपित होते रहते हैं । ‘उच्च आध्यात्मिक स्तर के अर्थात ‘परात्पर गुरु’ स्तर के संतों के संदर्भ में यह कैसे होता है ?’, इसका अध्ययन करने के लिए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की (गुरुदेवजी की) निम्नांकित ४ कृतियों का अध्ययन किया गया – १. वे सोते हुए (निद्रावस्था में), २. वे मार्गदर्शन करते हुए, ३. वे स्वयं का औक्षण करवाकर लेते हुए तथा ४. वे कुछ भी न करते हुए

गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदेवजी की सहज स्थिति

१. सामान्य व्यक्ति की उक्त ४ कृतियों का  सत्त्व, रज एवं तम, इन गुणों के अनुसार वर्गीकरण

१ अ. व्यक्ति का सोया होना : सामान्यतः यह कृति तमोगुण प्रधान होती है; क्योंकि सामान्य व्यक्ति के मन के विचार माया के होते हैं, साथ ही उसमें स्वभावदोष एवं अहं होते हैं । इसलिए उसके सोने पर भी उसे उसके मन के विचार एवं उसमें स्थित स्वभावदोष एवं अहं के अनुसार स्वप्न आते हैं ।

(सद्गुरु) डॉ. मुकुल गाडगीळ

१ आ. व्यक्ति का दूसरे को कुछ बताना : सामान्य व्यक्ति की यह कृति सामान्यतः रजोगुण प्रधान होती है ।

१ इ. व्यक्ति का औक्षण करवाकर लेना : यह कृति उसके उद्देश्य के अनुसार सत्त्वगुण प्रक्षेपित करती है ।

१ ई. व्यक्ति का कुछ भी न करना (सहज स्थिति) : सामान्य व्यक्ति जब शांत बैठा होता है, तब भी उसके मन में माया के विचार चलते रहते हैं । इसलिए उस समय उस व्यक्ति से रजोगुण प्रक्षेपित होता रहता है ।

२. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा की गई उक्त ४ कृतियों से प्रक्षेपित स्पंदन

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा की गई उक्त ४ कृतियों से प्रक्षेपित स्पंदन दर्शानेवाली यहां दी गई सारणी देखें तथा उसके उपरांत अगला भाग पढें ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी जब सोए होते हैं, उस समय !

२ अ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की निद्रावस्था : यहां दी सारणी से ध्यान में आता है कि सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की यह कृति सामान्य व्यक्ति की भांति तमोगुण प्रधान नहीं, अपितु सत्त्वगुण प्रधान है । उनके उच्च आध्यात्मिक स्तर के कारण नींद में भी उनसे सूक्ष्म स्तर पर सत्त्वगुणी कार्य जारी रहता है ।

उनका ध्येय है ‘समष्टि साधना के रूप में इस पृथ्वीतल पर रामराज्य की स्थापना करना ।’ जब वे सोए होते हैं,
तब वे यह कार्य निर्गुण में रहकर करते हैं । तब उनसे तारक-मारक कार्य चल रहा होता है । उस समय उनकी शक्ति कार्यरत होती है ।

श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी का मार्गदर्शन करते सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी (गुरुदेवजी)

२ आ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा मार्गदर्शन करते समय : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की यह कृति थोडी-सी अधिक सत्त्वगुणी है तथा उसमें तमोगुण कुछ भी नहीं है; क्योंकि उनका मार्गदर्शन माया के संदर्भ में नहीं है, अपितु व्यष्टि साधना एवं राष्ट्र-धर्म के विषय में आवश्यक समष्टि साधना तथा ईश्वरप्राप्ति के विषय में ही होता है । ये विषय शाश्वत सत्य हैं । इसलिए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में सत्त्वगुण है, साथ ही यह मार्गदर्शन अधिकतर तारक तत्त्व का है । यह मार्गदर्शन करते समय सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की ओर से अधिक स्तर पर चैतन्य प्रक्षेपित होता है ।

गुरुदेवजी का औक्षण करतीं श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी
श्रीमती मधुरा धनंजय कर्वे

२ इ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के औक्षण के समय : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की यह कृति सबसे अधिक सत्त्वगुणी है । जिस व्यक्ति का औक्षण किया जाता है, उसकी ओर ईश्वरीय तत्त्व आकर्षित होता है, साथ ही औक्षण करने के कारण सच्चिदानंद परब्रह्म
डॉ. आठवलेजी में विद्यमान सगुण तत्त्व एवं तारक तत्त्व सर्वाधिक रहा । उनमें विद्यमान अनुभूतिजन्य स्पंदनों में से आनंद एवं शांति, इन घटकों का अनुपात औक्षण करने के कारण बढा ।

२ ई. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी जब कुछ भी नहीं कर रहे होते, उस समय (सहज स्थिति) : इस स्थिति में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में विद्यमान सत्त्व-रज-तम के स्पंदन तथा जब वे सोए होते हैं, उस समय उनमें विद्यमान सत्त्व-रज-तम के स्पंदन एक जैसे ही हैं । इससे यह ध्यान में आता है कि सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी यदि सोए हुए हों, तब भी उनमें विद्यमान सत्त्वगुण अल्प नहीं होता । इसमें एक और बात ध्यान में आई, ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी कोई कृति न कर रहे हों, तब भी उनमें आनंद के स्पंदन अधिक होते हैं । वे सहज स्थिति में भी आनंदावस्था में होते हैं ।’

३. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी कीविभिन्न कृतियों के छायाचित्रों का लोलक द्वारा परीक्षण कर की गई प्रविष्टियां तथा उनका विवेचन, प्रथम यहां दी सारणी देखें- तदुपरांत अगला भाग पढें ।

प्रविष्टियों से ध्यान में आता है कि गुरुदेवजी में मूलतः ही बडे स्तर पर सकारात्मक ऊर्जा है । गुरुपूर्णिमा के दिन विभिन्न कृतियां करते समय उनमें विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा का अनुपात भिन्न-भिन्न है ।

३ अ. विश्लेषण : सर्वसामान्य व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा होती ही है, ऐसा नहीं है । सकारात्मक ऊर्जा को चैतन्य भी माना जा सकता है । वर्तमान कलियुग में अनेक लोगों में नकारात्मक ऊर्जा भी होती है । साधना करनेवाले व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल लगभग १ से २ मीटर या उससे भी अधिक हो सकता है । इसका अनुपात उसकी साधना पर निर्भर होता है । गुरुदेवजी अध्यात्म की अति उच्च स्थिति में हैं; इसलिए उनमें मूलतः ही प्रचुर मात्रा में चैतन्य है । उनमें विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल सहस्रों किलोमीटर है  । गुरुपूर्णिमा के दिन विभिन्न कृतियां करते समय उनमें विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा का स्तर भिन्न-भिन्न है । इसका कारण यह है कि उनकी ओर से समष्टि के कल्याण हेतु निरंतर चैतन्य प्रक्षेपित होता रहता है । कार्य के अनुसार उनकी ओर से प्रक्षेपित चैतन्य का स्तर बदलता रहता है । इसलिए उनमें विद्यमान सगुण तत्त्व एवं निर्गुण तत्त्व का स्तर; साथ ही शक्ति, भाव, चैतन्य, आनंद एवं शांति, इन स्पंदनों का स्तर भी बदलता रहता है, उदा. जब वे सोए होते हैं, उस समय अन्य स्पंदनों की तुलना में उनकी ओर से निर्गुण स्पंदन अधिक मात्रा में प्रक्षेपित होते हैं । इसलिए उस स्थिति में निर्गुण तत्त्व का स्तर अधिक है । इसके विपरीत, औक्षण के समय खींचे गए छायाचित्र में सकारात्मक ऊर्जा सबसे अधिक दिखाई दी है । गुरुदेवजी के स्पंदनों से इसका कारण ध्यान में आता है । उस समय गुरुदेवजी में सत्त्वगुण सबसे अधिक है !’

– (सद्गुरु) डॉ. मुकुल गाडगीळ (रसायनशास्त्र में पीएच.डी., मुंबई विश्वविद्यालय) व श्रीमती मधुरा कर्वे, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (२०.१२.२०२५)

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की (गुरुदेवजी) विभिन्न कृतियों के छायाचित्रों का लोलक द्वारा परीक्षण कर की गई प्रविष्टियां तथा उनका विवेचन

‘गुरुदेवजी के छायाचित्रों में नकारात्मक ऊर्जा दिखाई नहीं दी । इन छायाचित्रों में स्थित सकारात्मक ऊर्जा की प्रविष्टियां आगे दी गई हैं –

  • सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।
  • इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक
  • सूक्ष्म-परीक्षण : कुछ घटना अथवा प्रक्रिया के विषय में चित्त को (अंतर्मन को) जो अनुभव होता है, उसे ‘सूक्ष्म परीक्षण’ कहते हैं ।