संपादकीय : नागरिक शास्त्र केवल पुस्तक में ?

कानाडा, अमेरिका और मेक्सिको में चल रही फीफा फुटबॉल विश्वकप प्रतियोगिता में घटित एक घटना पुनः एक बार संपूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षित करनेवाली सिद्ध हुई । डैलास में नीदरलैंड्स विरुद्ध जापान का यह मैच २-२ से बराबरी पर समाप्त हुआ । मैच समाप्त होने के पश्चात सदैव की भांति अन्य दर्शक उठकर जाने लगे; परंतु जापानी दर्शकों ने अपनी परंपरा के अनुसार स्टेडियम में अपने-अपने स्थानों के निकट पडा हुआ कचरा एकत्रित कर परिसर को स्वच्छ किया और उसके उपरांत ही वे वहां से बाहर निकले । विशेष बात यह है कि चलने में असमर्थ एक ‘व्हीलचेयर’ पर बैठे जापानी नागरिक ने भी स्वयं ही अपनी ‘व्हीलचेयर’ ढकेलते हुए उसे जहां भी कचरा दिखाई दिया, उसे चुनकर एक बडी प्लास्टिक की थैली में डाला । विजय का उल्लास अथवा पराजय की निराशा, ऐसी किसी भी बात का विचार न करते हुए जापानी नागरिक सदैव ही इस कृत्य से विश्वभर के लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं और प्रशंसा के पात्र बनते हैं । डैलास में भी ‘हमारी किसी कृति से अन्यों को कष्ट न हो और सार्वजनिक स्थान स्वच्छ रहे’, यही भावना उनके व्यवहार से परिलक्षित हुई । यह घटना कोई नई नहीं है । इसके पूर्व कतर, रूस और ब्राजील में संपन्न हुई फुटबॉल विश्वकप प्रतियोगिताओं में भी जापानी नागरिकों ने ऐसी ही अनुशासनप्रियता और कर्तव्यदक्षता प्रदर्शित की थी । वर्ष २०२२ में कतर में आयोजित विश्वकप फुटबॉल प्रतियोगिता में कतर और इक्वाडोर के मध्य हुए मैच के पश्चात जापानी नागरिकों ने वहां का खलीफा अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम इसी प्रकार स्वच्छ किया । विशेष यह है कि यह मैच कतर और इक्वाडोर के मध्य हुआ था । जापान की टीम के न खेलने पर भी जापानी नागरिकों ने कर्तव्य समझकर स्टेडियम का कचरा उठाया था । यह देखने पर एक प्रश्न खडा होता है कि जापानी नागरिकों को ऐसा करने की इच्छा क्यों होती है ? सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता उन्हें सामूहिक

दायित्व क्यों प्रतीत होती है ?

इसका उत्तर जापान की ‘मेइवाकू’ संस्कृति में प्राप्त होता है । अपने व्यवहार के कारण दूसरों को कष्ट न हो, उन पर अतिरिक्त भार न आए और सार्वजनिक जीवन में कोई बाधा उत्पन्न न हो, इसकी चिंता करना ही ‘मेइवाकू’ है ! यह केवल जापानी संस्कृति नहीं, अपितु जीवन पद्धति है । जापान में बालकों को बाल्यावस्था से ही अपनी कक्षा, खेल का मैदान और सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने की आदत ‘मेइवाकू’ द्वारा डाली जाती है । इस कारण स्वच्छता करना केवल स्वच्छता कर्मचारियों का ही दायित्व है, ऐसा विचार उनके मन में कभी आता ही नहीं । इसके सर्वथा विपरीत चित्र भारत की प्रत्येक गली में दिखाई देता है । नागरिक शास्त्र की पुस्तकों में अधिकार, कर्तव्य, सामाजिक दायित्व आदि के विषय में विस्तृत जानकारी दी गई है । हम सभी उसे पढ चुके हैं । विद्यार्थी अब भी पढ रहे हैं; परंतु इन मूल्यों का रूपांतरण प्रत्यक्ष कृति में किस सीमा तक होता है ?, यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है । सार्वजनिक स्थानों पर पान-गुटके की पीक मारना, कचरा डालना, प्लास्टिक की बोतलें और खाद्य पदार्थों के आवेष्टन फेंकना, रेलवे स्टेशनों पर अस्वच्छता करना, पर्यटन स्थलों की दुर्दशा करना, ऐतिहासिक स्थलों का विरूपण करना, यह चित्र हमारे यहां सर्वत्र दिखाई देता है । अपना घर स्वच्छ रखनेवाले नागरिक घर से बाहर निकलते ही उनकी प्रवृत्ति में ऐसा परिवर्तन क्यों हो जाता है ?, यह समझने का कोई मार्ग नहीं है ।

प्रश्न है मानसिकता का !

अनेक बार कुछ अति-बुद्धिमान लोग ऐसा तर्क देते हैं कि भारत जैसे विशाल जनसंख्यावाले देश में जापान जैसा अनुशासन लाने का आग्रह करना अथवा वैसी अपेक्षा करना अतिशयोक्ति है; परंतु यह वस्तुस्थिति के अनुकूल नहीं है; क्योंकि अनुशासन जनसंख्या पर नहीं, अपितु नागरिकों की मानसिकता पर निर्भर करता है । सार्वजनिक स्थान पर कचरा फेंकनेवाला कोई भी व्यक्ति यह विचार करता है कि ‘मेरे द्वारा फेंके गए इस एक प्लास्टिक के वेष्टन से क्या अंतर पडनेवाला है ?’ प्रत्येक व्यक्ति ऐसा ही विचार करता है और देखते ही देखते कचरे का ढेर लग जाता है । अतः यही मानसिकता हमारे यहां की समस्या का मूल कारण है, यह ध्यान में रखना चाहिए । वरन्, यदि वह कचरे का ढेर उठाया नहीं गया, तो यही लोग स्थानीय प्रशासन को दोष देते हैं । यह अंतर्विरोध है । समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने दायित्व से विमुख होकर दूसरों से मात्र आदर्श व्यवहार की अपेक्षा करता है । परिणामस्वरूप स्वच्छता का प्रश्न केवल प्रशासन का बन जाता है और नागरिक स्वयं को उससे अलिप्त रखते हैं । हमारे यहां का प्रशासन भी तत्पर नहीं है । समस्त स्थानीय प्रशासनों में स्वच्छता विभाग होने पर भी गांव, तहसील, जिला कभी स्वच्छ नहीं होता । इसलिए अस्वच्छता आज हमारे यहां दुर्भाग्य से एक सामान्य बात बन गई है । ऐसी ‘अस्वच्छ मानसिकता’ के साथ अनेक पीढियां बीत चुकी हैं और जा रही हैं । बालक बडों का अनुकरण करते हैं । यदि वे सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकना, नियमों का उल्लंघन करना अथवा सामूहिक दायित्व की ओर सभी को उपेक्षा करते हुए बार-बार देखते हैं, तो बालकों को वही व्यवहार सही लगने लगता है और वे वैसा ही आचरण करने लगते हैं । हमारे यहां स्वच्छता केवल तब की जाती है जब कोई मंत्री, प्रधानमंत्री आदि आनेवाले हों । एक ओर विद्यार्थियों को विद्यालय में नागरिक शास्त्र के पाठ पढाए जाते हैं; परंतु बाहरी वास्तविकता उसके सर्वथा विपरीत होती है । इस कारण पुस्तक के मूल्यों का प्रभाव न्यून हो जाता है । शिक्षा और प्रत्यक्ष कृति में यही अंतर है । अतः हमारे भीतर ‘मेइवाकू’ संस्कृति को अंकुरित करने की नितांत आवश्यकता है । वास्तव में हमारे यहां पुरातन काल से ‘सत्यं, शिवं, सुंदरम्’ यह बताया ही गया है । यहां सुंदर एक अर्थ में स्वच्छता से ही संबंधित है, ऐसा कहने में कोई आपत्ति नहीं है । हम ‘मेइवाकू’ से दो पग आगे हैं; क्योंकि सत्य और सुंदर का संबंध ईश्वर से, अर्थात भगवान शिव से जोडे जाने की बात केवल हमारे यहां ही कही गई है । ‘स्वच्छता ईश्वर का एक गुण है’ , यह वाक्य निश्चित ही हमने अपने पूर्वजों के मुख से सुना होगा । केवल हमने इसका अनुकरण नहीं किया, इसी कारण आज हमारी यह दुर्दशा हुई है ।

स्वच्छता एक जनआंदोलन बने !

यदि देखा जाए, तो हमारे यहां भी अनेक गांवों में जनसहयोग से स्वच्छता अभियान चलाए जाते हैं । नगरों में भी स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय प्रशासन द्वारा संयुक्त रूप से स्वच्छता अभियान चलाए जाते हैं; परंतु इतना ही पर्याप्त नहीं है, यहां जनसंख्या का तर्क उचित सिद्ध होगा । इसलिए पुनः इन अभियानों को सर्वत्र चलाना और उनमें सहभाग लेना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है । यह एक जनआंदोलन बनना चाहिए । जापानी दर्शकों द्वारा उठाया गया कचरा केवल स्वच्छता से संबंधित नहीं है, अपितु वह आदर्श नागरिकता का एक पाठ है । तो क्या अब हम भी ‘जो दिखाई दे वह कर्तव्य’ इस भावना से कचरा उठाएंगे न ?