केरल में ‘इंडियन यूनियन ऑफ मुस्लिम लीग’ दल की पहली महिला विधायक फातिमा तहिलिया ने पेरांब्रा में एक उद्घाटन कार्यक्रम के समय पारंपरिक तेल का दीपक (निलविलक्कू) प्रज्वलित किया । इसे लेकर वहां बडा विवाद खडा हो गया है । उनके दल तथा अन्य कट्टर इस्लामी समूहों ने उनकी आलोचना की । कुछ लोगों ने तो उन्हें धर्म से बाहर निकालने जैसी बातें भी की, साथ ही ‘समस्त केरल जमीय्यतुल उलेमा’ इस सुन्नी विद्वान संस्था ने भी तीव्र आपत्ति व्यक्त की । केरल में ऐसा विवाद पहले भी हो चुका है । पूर्व शिक्षामंत्री अब्दू रब्ब ने एक सरकारी कार्यक्रम में दीप प्रज्वलित करने से मना कर दिया था । उस समय प्रसिद्ध अभिनेता माम्मुटी ने सार्वजनिक रूप से कहा था, ‘दीप ज्ञान का प्रतीक है । इसलिए मुसलमानों को ऐसी बातों का अनावश्यक विवाद नहीं खडा करना चाहिए ।’

१. दीपप्रज्वलन के विरोधियों की ‘धर्म प्रथम’ भूमिका
प्रारंभ में दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ करना भारतीय संस्कृति का अंग है । इस परंपरा में मुसलमानों की सहभागिता का सलाफी, वहाबी आदि विचारधाराओं के लोग कठोर विरोध करते हैं । उनके अनुसार, ‘‘यदि ऐसी श्रद्धा है कि दीप प्रज्वलित करने से भाग्य उज्ज्वल होता है अथवा संकट टलते हैं, तो वह इस्लाम के विरुद्ध है । इस्लाम में अन्य धर्मों की धार्मिक प्रथाओं की नकल करना पूर्णत: वर्जित है ।’’ ‘इंडियन यूनियन ऑफ मुस्लिम लीग’ दल का समर्थन करनेवाले मौलवियों और धार्मिक नेताओं का स्पष्ट मत है कि राजनीतिक पद से अधिक किसी धार्मिक व्यक्ति की धार्मिक पहचान और उसके नियम महत्त्वपूर्ण होते हैं । यदि दल के नेताओं ने खुले रूप से फतवों का उल्लंघन किया, तो दल का पारंपरिक मुस्लिम मतदाता वर्ग अप्रसन्न हो सकता है, ऐसा भी उनका कहना है ।
२. ‘दीपप्रज्वलन करना चाहिए’, ऐसा कहनेवाले मुसलमानों की भूमिका

‘इंडियन यूनियन ऑफ मुस्लिम लीग’ दल के कुछ आधुनिक विचारधारावाले नेताओं का मत है कि ‘लोकतंत्र में सभी धर्मों के लोगों का प्रतिनिधित्व करते समय सामाजिक सद्भाव बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है । दीप प्रज्वलित करना केवल ज्ञान और एक सांस्कृतिक समारोह का प्रतीक है; उसमें किसी प्रकार की धार्मिक पूजा नहीं होती ।’ इन युवाओं का नेतृत्व एक समय विधायक फातिमा ने ही किया था । इनके अतिरिक्त फातिमा तहिलिया के समर्थन में एम.एन. कारस्सेरी जैसे मुस्लिम समाज के सुधारवादी विचारक तथा केरल के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक और सामाजिक नेता भी खडे हुए हैं । यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, डॉ. जाकिर हुसैन तथा फखरुद्दीन अली अहमद – ये तीनों ही राष्ट्रपति इस प्रकार के दीपप्रज्वलन में सहभागी होते थे । डॉ. कलाम कुरान और उपनिषद – दोनों के अध्येता थे । उनके अनुसार, ‘‘दीप की ज्योति केवल ज्ञान, वैज्ञानिक प्रगति और अज्ञान के नाश का प्रतीक थी ।’’ डॉ. जाकिर हुसैन का विश्वास था कि ‘भारत की संस्कृति ‘गंगा-जमुनी’ अर्थात मिश्रित संस्कृति है ।’ वे मानते थे कि ‘देश की विविधता का सम्मान करने से अपना धर्म संकट में नहीं पडता ।’ डॉ. फखरुद्दीन अली अहमद ने इस कृत्य को धार्मिक अनुष्ठान न मानते हुए, राज्य के प्रमुख के रूप में अपने एक नागरिक कर्तव्य को स्वीकार किया ।
३. क्या महिला जनप्रतिनिधि वैचारिक स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं है ?
कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि ‘समस्त’ जैसी संस्थाओं के लिए ‘इस्लाम प्रथम’ है । वे उस महिला को वैचारिक स्वतंत्रता देने के लिए भी तैयार नहीं हैं । इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जो मुसलमान अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को केवल अपनी धार्मिक पहचान के साथ जोडकर नहीं देखना चाहते, उन्हें ही अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी । यदि दीपप्रज्वलन से दूर रहनेवाले मुसलमान व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर अपनी धार्मिक पहचान को प्राथमिकता दे सकते हैं, तो उसी स्वतंत्रता का उपयोग कर युवा सुधारवादी मुसलमान अपने विचार दृढतापूर्वक क्यों न रखें ?
४. राष्ट्रीय एकता में संस्कृति का महत्त्व
राष्ट्र केवल भूमि नहीं होता । राष्ट्र केवल उसमें रहनेवाले लोगों का समूह भी नहीं होता । प्रत्येक राष्ट्र अपनी स्वतंत्र पहचान वाला एक सजीव व्यक्तित्व होता है । राष्ट्र की संस्कृति उस व्यक्तित्व की आत्मा होती है । यदि उस आत्मा अर्थात संस्कृति को स्वीकार कर लिया जाए, तो राष्ट्रीय एकता कैसे बनाए रखनी है, यह समस्या कभी बडी नहीं बनती । इंडोनेशिया विश्व का सबसे बडा इस्लामी राष्ट्र है । जब वह देश स्वतंत्र हुआ, तब इस्लामवादियों ने ‘शरीयत के अनुसार शासन लागू किया जाए’, ऐसी मांग की थी; परंतु वहां के नेताओं ने उसे अस्वीकार कर संविधान के लिए सर्वसमावेशक पंचशील सिद्धांतों को स्वीकार किया । उन्होंने सांस्कृतिक बंधुत्व और राष्ट्रकल्याण को ऐसी धार्मिक कट्टरता से श्रेष्ठ स्थान दिया । यह देश इस्लाम बहुल होने पर भी वहां अन्य धर्मों के लोग भी रहते हैं, इसे ध्यान में रखकर उन्होंने ऐसा किया और वहां के मुसलमानों ने भी उसे स्वीकार किया ।
भारतीय संस्कृति विशिष्ट है । यह भूमि पौरात्य धर्मों और पंथों की जन्मभूमि होने के कारण यहां उन धर्म-पंथों के अनुकूल संस्कृति का होना स्वाभाविक है । फिर यहां अन्य धर्मावलंबियों को संविधान द्वारा भी अच्छा संरक्षण प्राप्त है । भारत में तीन मुसलमान राष्ट्रपति हुए हैं, इससे यह बात स्पष्ट होनी चाहिए ।
आज जो लोग अपने अनुयायियों को सार्वजनिक समारोहों में भी धार्मिक नियमों का पालन कर अलग पहचान बनाए रखने का आग्रह कर रहे हैं, उनका प्रभाव और बढने पर वे दूसरों पर भी अपने दृष्टिकोण को थोपेंगे, यह स्पष्ट है । ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ की पहचान रखनेवाले पाकिस्तान में लाहौर की सडकों आदि के पूर्ववर्ती हिंदू नाम पुनः देकर उस नगर की मूल संस्कृति को सुरक्षित रखने का प्रयास वहां की सरकार ने हाल ही में किया था । वहां के कट्टर इस्लामियों ने उसका भी विरोध किया और प्रशासन को उनके सामने पीछे हटना पडा । इसलिए यदि आज मूल भारतीय संस्कृति का विरोध करनेवाले अधिक शक्तिशाली बन गए, तो वे भारत के व्यक्तित्व को उन अन्य राष्ट्रों के समान बना देंगे, जहां उस धर्म का प्रभुत्व है । वास्तविक प्रश्न उन लोगों के लिए है, जो यह कहते हैं कि ‘भारत में धर्म राष्ट्र की आत्मा नहीं हो सकता; क्योंकि यहां अनेक धर्मों और पंथों के लोग रहते हैं ।’ वह प्रश्न यह है कि यदि भारत बहुपंथीय और बहुधार्मिक राष्ट्र होने के कारण इस राष्ट्र की आत्मा हिन्दू धर्म नहीं हो सकती, तो उसके स्थान पर संस्कृति को ही वह स्थान प्राप्त होगा । यदि ऐसा है, तो वह संस्कृति कौन-सी होगी ? इस मिट्टी से उत्पन्न हुई संस्कृति अथवा बाहर के मरुस्थलीय प्रदेशों से आई हुई ?
श्रीगुरुचरणार्पणमस्तु ।
– डॉ. दुर्गेश सामंत (आयु ६५ वर्ष), एम.डी. (मेडिसिन), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (९.६.२०२६)
दीपप्रज्वलन मोमबत्ती से नहीं, अपितु तेल के दीप (सकर्ण दीप) से क्यों करें ?मोमबत्ती द्वारा प्रक्षेपित तरंगें तम-रजयुक्त होती हैं । इन तरंगों के कारण वातावरण तामसी बनता है व सात्त्विकता नष्ट हो जाती है । मोमबत्ती द्वारा दीप प्रज्वलित करने पर दीपस्तंभ के चारों ओर तमकणों का मंडल तैयार होता है । इस कारण दीपस्तंभ की ज्योति की ओर आकृष्ट ब्रह्मांड में विद्यमान देवताकी क्रियातरंगें बाधित होती हैं । इसके विपरीत, तेल रजोगुण का प्रतीक है । तेल की ज्योति ब्रह्मांड में विद्यमान देवताओं की क्रियातरंगों को जागृत कर कार्यरत करनेमें सहायक होती है; इसलिए दीपप्रज्वलन हेतु प्रयुक्त तेल के दीप (सकर्ण दीप) का प्रयोग श्रेयस्कर है । (संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘पारिवारिक धार्मिक व सामाजिक कृत्यों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’) |
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