SANATAN PRABHAT EXCLUSIVE : महाराष्ट्र में गंभीर अपराधों के अभियोगों के निर्णय की स्थिति चिंताजनक !

बलात्कार, हत्या इत्यादि हेतु त्वरित न्यायालय (फास्ट ट्रैक कोर्ट) की मांग, वास्तव में डेढ लाख से अधिक अभियोग लंबित !

श्री . प्रीतम नाचणकर, विशेष प्रतिनिधि, सनातन प्रभात

मुंबई – विगत एक वर्ष में राज्य में बालकों, अल्पायु कन्याओं तथा महिलाओं पर होने वाले अत्याचार, बलात्कार, हत्या इत्यादि गंभीर स्वरूप के अपराधों की मात्रा अत्यधिक बढ गई है । अमानवीय, अमानुष एवं पाशविक अत्याचारों के अपराधियों को शीघ्र अति शीघ्र दंड प्राप्त हो, इसके लिए नागरिक सडकों पर उतरते हैं तथा ऐसे अभियोग त्वरित न्यायालयों में चलाने की मांग करते हैं । वास्तव में, त्वरित न्यायालयों में भी अभियोग निर्णय हेतु वर्षों से लंबित हैं । महाराष्ट्र के त्वरित न्यायालयों में दीवानी तथा फौजदारी के प्रलंबित अभियोगों की संख्या १ लाख ६१ सहस्त्र ९३७ है । यह संख्या अगस्त २०२५ की है । वर्तमान स्थिति में इसमें कुछ मात्रा में वृद्धि अथवा न्यूनता होने की संभावना है ।

श्री. प्रीतम नाचणकर

‘सनातन प्रभात’ के विशेष प्रतिनिधि श्री . प्रीतम नाचणकर ने त्वरित न्यायालयों में प्रलंबित अभियोगों की स्थिति के विषय में सूचना के अधिकार के अंतर्गत मुंबई उच्च न्यायालय से जानकारी मांगी थी । इस पर मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा यह आधिकारिक आंकडे प्रदान किए गए हैं । मुंबई उच्च न्यायालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार ११ वें वित्त आयोग के अनुसार ८१ तथा १४ वें वित्त आयोग के अनुसार २१ , महाराष्ट्र में वर्तमान में १०२ त्वरित न्यायालय कार्यरत हैं । इन न्यायालयों की कालावधि मार्च २०२७ तक है । ( कालावधि पूर्ण होने के पश्चात विधि एवं न्याय विभाग द्वारा राज्य सरकार न्यायालयों को समय सीमा बढाकर देती है तथा उसके लिए सरकार द्वारा आर्थिक प्रावधान किया जाता है । )

८-१० वर्षों से अभियोग प्रलंबित !

इसमें फौजदारी अभियोगों की संख्या ५९ सहस्त्र ८८७ है । इनमें बालिकाओं तथा महिलाओं पर होने वाले अत्याचार एवं लैंगिक शोषण सम्मिलित हैं । ऐसे अभियोगों की सटीक संख्या प्राप्त नहीं हुई है; किंतु प्रलंबित अभियोगों की मात्रा को देखते हुए महिलाओं पर अत्याचार तथा लैंगिक शोषण की संख्या सहस्त्रों में होने की संभावना है । गंभीर विषय यह है कि न्यायाधीशों की न्यूनता, साक्षियों की अनुपस्थिति, जांच तंत्रों द्वारा जांच में तथा आरोपपत्र प्रविष्ट ( दाखिल ) करने में होने वाले विलंब के कारण इनमें से कुछ अभियोग ८ से १० वर्षों से प्रलंबित हैं । यह अत्यंत चिंताजनक है । सरकार द्वारा इस पर गंभीरता से उपाय करना अपेक्षित है ।