छत्रपति शिवाजी महाराज का अपमान मैं सपने में भी नहीं कर सकता यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हों तो क्षमा चाहता हूं – Pandit Dhirendra Krishna Shastri

पंडित धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री

नागपुर – छत्रपति शिवाजी महाराज हमारे आदर्श हैं । उन्हीं के कारण आज देश में हिन्दुत्व जीवित है । ऐसे महान पुरुष का अपमान करने का विचार मैं सपने में भी नहीं कर सकता । फिर भी मेरे वक्तव्य से यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हों, तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूं – इन शब्दों में बागेश्वर धाम के प्रमुख पंडित धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री ने अपनी भूमिका स्पष्ट की । यहां प्रवचन के समय शिवाजी महाराज तथा समर्थ रामदास के संदर्भ में दिए गए वक्तव्य के कारण उत्पन्न विवाद के बाद उन्होंने यह स्पष्टीकरण दिया ।

उन्होंने आगे कहा कि मैंने अपने शब्दों के माध्यम से शिवाजी महाराज के प्रति अपना सम्मान ही व्यक्त किया था, परन्तु कुछ लोगों ने मेरे वक्तव्य का अनुचित अर्थ निकाला । जिनके स्वराज्य से प्रेरणा लेकर हम ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित करने का संकल्प लेते हैं, उनकी निंदा हम कभी सहन नहीं करेंगे । जो शिवाजी महाराज को मानते हैं, वे सभी हमारे अपने हैं । यदि हम आपस में ही लड़ेंगे, तो इसका लाभ केवल धर्मविरोधियों को ही होगा ।

‘हर व्यक्ति एक पुत्र संघ को दे’ – इस कथन का अर्थ क्या है ? इसका मतलब यह है कि वह पुत्र कट्टर राष्ट्रभक्त एवं सनातनी विचारों वाला बने – यही मेरा उद्देश्य था । वह जिलाधिकारी हो, शिक्षक हो या कुछ अन्य पद पर हो, परन्तु उसके विचार दृढ सनातनी होने चाहिए ।

असल विवाद क्या था ?

नागपुर के एक कार्यक्रम में पंडित धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री ने कहा था कि ‘युद्ध से थकने के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपना मुकुट समर्थ रामदास के चरणों में अर्पित किया था ।’ इस पर कुछ संगठनों ने इतिहास को तोड-मरोड कर प्रसार करने का आरोप लगाते हुए उनकी आलोचना की थी ।

संपादकीय भूमिका

  • पंडित धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री लगातार हिन्दू राष्ट्र तथा सनातन धर्म का समर्थन कर रहे हैं । ऐसे समय में उनके किसी वक्तव्य का आधार लेकर हिन्दू समाज में फूट डालने का कार्य धर्मविरोधी तत्वों द्वारा रचा जा सकता है, इसे नकारा नहीं जा सकता ।
  • क्षमा मांगकर उन्होंने अपना बडप्पन सिद्ध किया है । अब अन्य लोगों को भी इस विवाद को न बढाते हुए हिन्दू एकता के लिए संगठित होना समय की आवश्यकता है ।