गूढ विद्या एवं अष्टसिद्धियां : एक अध्यात्मशास्त्रीय विवेचन !

सनातन भारत : समाज, राष्ट्र, धर्म एवं अध्यात्म के संबंध में प्रासंगिक सूत्रों पर भाष्य करनेवाला स्तंभ

फरवरी २०२६ में वैश्विक वैज्ञानिक वृत्त में ‘क्वांटम एंटैंगलमेंट’ (Quantum Entanglement) विषय पर चीन के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी प्रयोग किया । उससे उन्होंने यह सिद्ध किया कि दो परमाणु एक-दूसरे से सहस्रों मील दूर होते हुए भी एक ही क्षण में एक-दूसरे के साथ संवाद कर सकते हैं । इस समाचार से आधुनिक विश्व अचंभित रह गया; परंतु भारतीय योगशास्त्र के अध्येता इस पर केवल स्मितहास्य कर रहे थे; क्योंकि सहस्रों वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलिजी ने ‘योगसूत्रों’ में यही सिद्धांत ‘प्राप्ति’ एवं ‘दूरश्रवण’, इन सिद्धियों के माध्यम से लिख रखा था । आज जब हम ‘मेटावर्स’ (आभासी ब्रह्मांड), ‘टेलिपोर्टेशन’ (अदृश्य वहन) अथवा ‘माईंड रीडिंग’ (दूसरे के मन के विचारों का वाचन) की बातें करते हैं, तब अज्ञानवश हम उसी रहस्यमयी विद्या के दहलीज पर खडे होते हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने ‘अष्टसिद्धियां’ कहा था । यह केवल चमत्कारों की कहानी नहीं है, अपितु मानवीय चेतना की प्रचंड क्षमता का एक उन्नत अध्यात्मशास्त्रीय समीकरण है ।

१. रहस्यमयी विद्या : छिपी सच्चाई की खोज

१ अ. रहस्यमयी विद्या कोई संदेहजनक प्रकार नहीं है ! : वर्तमान में अमेरिका में जब ‘एपस्टीन फाइल्स’ खुल रही थीं, उस समय प्रसारमाध्यम एपस्टीन को ‘रहस्यमयी विद्यावादी’ (Occult)’ कह रहे हैं । मूलरूप से रहस्यमयी अथवा गुप्त विद्याएं क्या होती हैं, इस विषय में पूरे विश्व में चर्चा चल रही है, अपितु इस शब्द की ओर संदेहजनक भूमिका से देखने की मनोवृत्ति बढ रही है । ‘रहस्यमयी’ (Occult) शब्द का अर्थ है ‘छिपा हुआ’ अर्थात जो चर्मचक्षुओं को दिखाई नहीं देता; परंतु उसके अस्तित्व का अनुभव किया जा सकता है ।

सृष्टि के दो स्तर हैं – एक है स्थूल (Physical) तथा दूसरा है सूक्ष्म (Subtle) ! हमने विज्ञान की सहायता से स्थूल विश्व के नियम समझ लिए हैं, उदा. गुरुत्वाकर्षण अथवा प्रकाश !; परंतु रहस्यमयी विद्या सूक्ष्म जगत एवं ऊर्जा के नियमों से संबंधित है । सष्टिके स्थूल नियम, (Physical Laws), जो विज्ञान को ज्ञात होते हैं; परंतु सूक्ष्म नियमों को (Metaphysical Laws) केवल आध्यात्मिक साधना से जाना जा सकता है ।

१ आ. रहस्यमयी विद्याओं का अध्यात्मशास्त्र : रहस्यमयी विद्या अर्थात ऐसी शक्तियों का अध्ययन, जिसके द्वारा मनुष्य उसकी पंचेंद्रियों की मर्यादाएं लांघकर विश्व के सूक्ष्म तरंगों से संपर्क कर सकता है । इसमें मंत्रशक्ति, यंत्रशक्ति एवं तंत्र का समावेश होता है । तंत्रशास्त्र के अनुसार यह संपूर्ण विश्व ‘शिव’ एवं ‘शक्ति’ (पदार्थ एवं ऊर्जा) का मिलन है । जो साधक स्वयं के शरीर में विद्यमान कुंडलिनी शक्ति जागृत करता है, उसे इस विश्व के गुप्त रहस्यों का ज्ञान प्राप्त होता है ।

भारतीय परंपरा में रहस्यमयी विद्या को ‘गुप्त विद्या’ भी कहा जाता है । इसका कारण यह है कि यह विद्या यदि अयोग्य व्यक्ति के हाथ लगी, तो स्वार्थ के लिए उसका दुरुपयोग हो सकता है । मंत्रों में विद्यमान ध्वनि तरंगें (Vibrations), यंत्रों में विद्यमान भूमितीय ऊर्जा एवं तंत्र में विद्यमान प्राणशक्ति का उपयोग कर प्रकृति के सामान्य नियमों को मोड देना रहस्यमयी विद्या का सारगर्भ है । जब कोई साधक अपने शरीर एवं मन को एक विशिष्ट ऊर्जा के स्तर तक ले जाता है, तब उसे विश्वात्मक ऊर्जा के साथ (‘कॉस्मिक एनर्जी’ के साथ) सीधा संवाद करना संभव होता है ।

श्री. चेतन राजहंस
  • ‘अध्यात्म में सिद्धियों का उपयोग केवल ‘जन-कल्याण’ के लिए करना ही अभिप्रेत (उचित) है, स्वार्थ के लिए नहीं ।’
  • ‘अध्यात्म एक उन्नत विज्ञान है, यह इन तथाकथित ‘तर्कवादियों’ (विवेकवादियों) को कौन समझाएगा ?’

– श्री. चेतन राजहंस

२. अष्टसिद्धियों का योगशास्त्र

योगशास्त्र के अनुसार मानवीय शरीर पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश, इन पंचमहाभूतों से बना है । जब कोई योगी ध्यान एवं ‘संयम’ के द्वारा इन ५ तत्त्वों पर संपूर्ण विजय प्राप्त करता है, तब उसे ८ प्रकार की अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं, जिन्हें ‘अष्टसिद्धियां’ कहते हैं ।

२ अ. अष्टसिद्धि के प्रकार

१. अणिमा (सूक्ष्मत्व का अनुभव) : अणिमा सिद्धि प्राप्त योगी अपना शरीर परमाणु जितना छोटा कर सकता है । अध्यात्मशास्त्र की भाषा में यह ‘अहंकार के संपूर्ण विसर्जन’ की अवस्था है । जब मनुष्य स्वयं को ‘शून्य’ मानता है, तब वह विश्व के छोटे से छोटे कण में प्रवेश कर सकता है । हनुमानजी ने लंका प्रवेश के समय इसी सिद्धि का उपयोग कर सूक्ष्म रूप धारण किया था ।

२. महिमा (विराट स्वरूप) : स्वयं के शरीर को प्रचंड बडा करने की क्षमता है महिमा ! यह केवल शारीरिक विस्तार नहीं, अपितु ‘चेतना का विस्तार’ है । योगी जब स्वयं को संकीर्ण शरीर के उस पार लेकर संपूर्ण विश्व के साथ एकरूप मानता है, तब वह विराट बन जाता
है । ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिखाया गया ‘विश्वरूप दर्शन’ महिमा सिद्धि का सर्वोच्च आध्यात्मिक उदाहरण है ।

३. लघिमा (गुरुत्वाकर्षण के उस पार चले जाना) : लघिमा अर्थात शरीर का वजन रूई से भी हल्का करना ! साधक जब शरीर में स्थित ‘उदान वायु’ पर नियंत्रण प्राप्त करता है, तब वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त हो जाता है । ‘हवा में तैरने (Levitation) अथवा पानी पर चलने की क्रियाएं लघिमा सिद्धि के कारण संभव होती हैं’, ऐसा योगशास्त्र बताता है ।

४. गरिमा (अभेद्य स्थिरता) : महिमा के विपरीत है गरिमा ! इसमें शरीर को इतना भारी किया जाता है कि विश्व की कोई भी शक्ति उस साधक को नहीं हिला सकती । मन एवं शरीर की अटल एकाग्रता एवं पृथ्वीतत्त्व पर स्थापित पकड का यह प्रतीक है ।

५. प्राप्ति (अंतर की मर्यादा समाप्त करना) : प्राप्ति का अर्थ केवल भौतिक वस्तुएं प्राप्त करना नहीं है, अपितु ‘स्पेस-टाइम’ (स्थल एवं काल) पर विजय प्राप्त करना ! इस सिद्धि के द्वारा साधक एक ही समय पर अनेक स्थानों पर उपस्थित रह सकता है अथवा जो वस्तु दूर होती है, उसे स्वयं की संकल्पशक्ति से निकट ला सकता है ।

६. प्राकाम्य (इच्छाशक्ति का सामर्थ्य) : प्राकाम्य अर्थात साधक की शुद्ध इच्छाशक्ति का वास्तविकता में रूपांतरण होना ! ऐसा साधक जब मन में यह विचार लाता है कि उसे प्रकृति का कोई नियम बदलना है, तो उसके इस प्रबल संकल्प के सामने सृष्टि को झुकना पडता है । यही सिद्धि प्राप्त करने के लिए मन का संपूर्ण शुद्धीकरण होना आवश्यक है ।

७. ईशित्व (सृष्टि का अधिपत्य) : ईशित्व अर्थात प्रकृति की शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित करना ! वर्षा कराने, प्राकृतिक आपदाओं को रोककर रखने तथा पदार्थ का स्वरूप परिवर्तित करने की क्षमता इस ईशित्व सिद्धि से आती है । यह अवस्था साधक को ईश्वरीय गुणों के निकट ले आती है ।

८. वशित्व (विश्व पर नियंत्रण) : वशित्व का अर्थ है संपूर्ण सृष्टि को स्वयं के प्रभाव में ले आना ! यह सिद्धिप्राप्त साधक हिंसक पशुओं को भी प्रेम से शांत कर सकता है । यह केवल सम्मोहन नहीं होता, अपितु आत्मबल का ऐसा दिव्य प्रभाव होता है कि सामने का व्यक्ति अथवा वस्तु स्वचालित पद्धति से साधक की आज्ञा में तथा तरंगों में रहता है ।

२ आ. अष्टसिद्धियों का अध्यात्मशास्त्र : अध्यात्मशास्त्र बताता है कि स्वयं का शरीर विश्व का एक छोटा रूप (Microcosm) है । हमारे शरीर में ७ चक्र होते हैं । साधक जब प्राणायाम अथवा ध्यान के द्वारा प्राणशक्ति को मूलाधारचक्र तक ले जाता है, तब उसके शरीर में स्थित सुप्त केंद्र (Latent Centers) जागृत होते हैं ।

इस जागृति के कारण मस्तिष्क के उन अंगों को ऊर्जा मिलती है, जो सामान्यरूप से सुप्त होते हैं । इससे ही दूरदृष्टि (Clairaudience) जैसी शक्तियां विकसित होती हैं । सिद्धियां प्राप्त होना कोई जादू नहीं है, अपितु मानवीय चेतना का (Consciousness) प्रकृति के सूक्ष्म नियमों के साथ हुआ संवाद है ।

संक्षेप में कहा जाए, तो अध्यात्मशास्त्र इन सिद्धियों की ओर केवल चमत्कार के रूप में नहीं देखता, अपितु इसके पीछे एक योजनाबद्ध प्रक्रिया है । जो साधना के कारण जागृत हुए ७ चक्रों की जागृति का परिणाम होता है । इसके उदाहरण आगे दिए गए हैं ।

– श्री. चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था.