विभूति अर्थात पवित्र राख ! हिन्दू धर्म में अनादिकाल से विभूति माथे पर लगाई जाती है । विभूति, मंत्रजपसहित किसी धुनी, होम अथवा यज्ञ में उपयोग की गई विशिष्ट लकडी, घी, औषधि वनस्पतियों तथा कुछ अन्य पवित्र वस्तुओं से तैयार की जाती है । हमारी संस्कृति में इस प्रकार से तैयार की गई पवित्र विभूति को माथे पर लगाना महत्त्वपूर्ण माना जाता है । इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी देनेवाला यह लेख !

भस्म एवं विभूति

हिन्दू धर्म में पवित्र राख के दो प्रकार बताए हैं । एक है भस्म, जो श्मशानभूमि से प्राप्त किया जाता है । भस्म का संबंध शंभो महादेव के साथ है । भस्म शब्द सुनकर आपकी आंखों के सामने अघोरी साधु आए होंगे; क्योंकि वे पूरे शरीर पर भस्म विलेपन करते हैं ।
‘यह शरीर नश्वर है तथा एक दिन वह भी राख होनेवाला है; इसलिए हमें अपनी देह के प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिए’, भस्म इसका स्मरण कराता है । दूसरा प्रकार है विभूति ! गाय का सूखा गोबर, चावल का भूसा, अश्मंतक, पीपल एवं बरगद की लकडी तथा अन्य पदार्थाें को एकत्र कर जलाया जाता है । उस पर उचित मंत्रोच्चारण किया जाता है ।
इन वस्तुओं को जलाए जाने के उपरांत जो राख तैयार होती है, उसे कपडे से छानने के उपरांत पवित्र विभूति तैयार होती है । विभूति का अर्थ है गौरव तथा विभूति लगानेवालों को वह गौरव प्राप्त होता है । उचित पद्धति से तैयार की जानेवाली विभूति में एक विशिष्ट गुण होता है, जिसके कारण ऊर्जा हस्तांतरित अथवा प्रसारित होती है । शिवलिंग पर त्रिपुंड लगा होता है । उसके लिए विभूति का उपयोग किया जाता है ।
भस्म का महत्त्व

धार्मिक प्रसंगों में एवं उपासना में त्रिपुंड का विशेष महत्त्व है । माथे पर तथा बांह पर त्रिपुड लगाने की पद्धति है । माथे के मध्य में आज्ञाचक्र पर त्रिपुंड अर्थात विभूति लगाई जाती है । इससे मन में बुरे विचार नहीं आते, जिससे नकारात्मकता भी दूर हो जाती है तथा मन में सात्त्विकता बनी रहती है । विभूति हममें सकारात्मकता बढाती है, साथ ही हमारे शरीर में स्थित ७ चक्रों को नियंत्रित करती है ।
विभूति लगाने के लाभ
१. दो भौंहों के मध्य में भस्म अथवा विभूति लगाने से कडी धूप के कारण होनेवाला सिरदर्द अल्प हो सकता है । तीसरी आंख हमारे अंतर्मन का प्रतिनिधित्व करती है तथा वह हमारे मन के विचारों के माध्यम से कार्यरत होती है । हमारे शरीर के इस चक्र में नकारात्मक विचारों से शरीर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती रहती है; परंतु वहां विभूति लगाने के कारण नकारात्मक ऊर्जा को शरीर में प्रवेश करने से रोका जा सकता है ।
२. विभूति लगाने के कारण शरीर में स्थित अतिरिक्त नमी खिंच जाती है, जिससे सर्दी से भी बचाव होता है ।
३. शरीर में ऊर्जा के स्रोत को प्रवाहित करने में बाधा आ रही हो, तो विभूति लगाने से शरीर के वे द्वार खुल जाते हैं, जिनसे ऊर्जा के स्रोत प्रवेश करते हैं तथा उससे शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा की आपूर्ति होती है ।
४. मंदिर अथवा पवित्र स्थानों पर प्रसाद के रूप में विभूति दी जाती है । यह एक प्रकार का पवित्र भस्म है । यह विभूति हम पहले माथे पर लगाते हैं तथा उसका कुछ अंश अपनी जीभ पर रखते हैं । उसके कारण विभूति के पवित्र कण हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं ।
५. विभूति को दाहिने हाथ में लेकर उसका सम्मान करना चाहिए ।
भस्म का पहाड

क्या आपको श्री क्षेत्र गाणगापुर में स्थित भस्म का पहाड ज्ञात है ? भगवान परशुराम ने विश्वकल्याण हेतु यहां बडा यज्ञ किया था । उस यज्ञ की विभूति इकट्ठी होकर वहां एक पहाड तैयार हो गया । अनेक वर्षाें से श्रद्धालु यह विभूति अथवा पवित्र राख लेकर जाते हैं; परंतु आज भी यह पहाड जैसा था वैसा ही बना हुआ है । श्रीक्षेत्र गाणगापुर की यह विभूति अथवा पवित्र भस्म वहां का मुख्य गुरुप्रसाद है । आप यहां जाकर उसकी अनुभूति अवश्य लें । विभूति हमें नकारात्मक ऊर्जा से दूर रखती है, साथ ही यह संदेश भी देती है, ‘हमारा जीवन नश्वर है, इसलिए अहंकार न करें ।’
– श्री. यशवंत नाईक, मलेशिया
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