उद्योग ही साधना है !
‘भक्तिरस से ओतप्रोत वातावरण तथा आध्यात्मिक ऊर्जा का अपार अनुभव जिससे प्राप्त हुआ, उस ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ का १७ से १९ मई २०२५ की अवधि में हम सभी ने अनुभव किया । ‘हम सभी ने ३ दिवसीय इस महोत्सव का प्रत्यक्ष अनुभव किया, उसमें हम सहभागी हुए तथा उन दिव्य क्षणों का अंश बन गए’, इसका पूरे जीवन में हमें स्मरण रहेगा । ‘न भूतो न भविष्यति ।’, इन शब्दों में वर्णन किया जाए, इस प्रकार यह महोत्सव संपन्न हुआ । इस महोत्सव का प्रमुख उद्देश्य था ‘हिन्दू राष्ट्र-निर्मिति हेतु शंखनाद’ । इस समारोह में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का ८३वां जन्मदिवस अत्यंत भव्य पद्धति से मनाया गया । उसके साथ ही सनातन संस्था की २५ वर्षाें कीपूर्ति के परमोच्च क्षणों के भी हम सभी साक्षी सिद्ध हुए । इस अवसर पर हम सभी भक्तिभाव, आनंद एवं कृतज्ञता से ओतप्रोत थे ।
इसी उपलक्ष्य में मेरे मन में विचार आए, ‘उद्योगपतियों का स्वयं का जीवन समृद्ध होगा, उनके व्यवसाय का विस्तार होगा, साथ ही देश के सर्वांगीण विकास में भी उनका योगदान रहेगा; इसका मैंने स्वयं अनुभव किया है । इस अनुभव की जानकारी अन्य उद्योगपतियों को मिले; इसलिए इसी अनुभव पर आधारित लेखमाला लिखी जाए, इस उद्देश्य से इस लेखमाला का आरंभ कर रहा हूं ।
लेखक : डॉ. रवींद्र प्रभुदेसाई (आयु ६२ वर्ष, आध्यात्मिक स्तर ६१ प्रतिशत), प्रबंध निदेशक, पितांबरी प्रॉडक्ट्स प्रा.लि., ठाणे

‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में देश-विदेश से आए लगभग ३० सहस्र साधक, हिन्दुत्वनिष्ठ एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे । कश्मीर के विस्थापितों से लेकर कन्याकुमारी तक, साथ ही मुंबई से लेकर कोलकाता तक के विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों के कार्यकर्ता एक ही स्थान पर एकत्रित हुए थे । देश के विभिन्न आंदोलनों में सहभागी कार्यकर्ता तथा हिन्दू धर्म के लिए कार्य करनेवाले संगठनों का इस महोत्सव में सहभाग था । लगभग १५० से अधिक संत एवं मान्यवर इस ३ दिवसीय कार्यक्रम में उपस्थित थे । उनके सान्निध्य के कारण महोत्सव में एक विलक्षण ऊर्जा फैली थी । स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था, ‘आप मुझे १०० युवक दीजिए, मैं भारत का चित्र बदल दूंगा ।’ उसी प्रकार से इस संतसमूह को देखते हुए ऐसा लगा, ‘यदि इतने संत-महात्माओं के एकत्रित आशीर्वाद मिले, तो हिन्दू राष्ट्र साकार होगा ।’

१. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का आरंभ !
‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के करकमलों से गोमाता का पवित्र चिन्ह अंकित सनातन धर्मध्वज का ध्वजारोहण किया गया तथा उसी समय शंखनाद कर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का आरंभ किया गया ।
२. प्रदर्शनी का विलक्षण अनुभव !
इस महोत्सव में महाराष्ट्र एवं कर्नाटक, इन राज्यों के विभिन्न संतों की चरणपादुकाओं के दर्शन, छत्रपति शिवाजी महाराज के पराक्रम का स्मरण दिलानेवाली शस्त्रों की प्रदर्शनी, ‘सनातन संस्था’ के विभिन्न उपक्रमों का दर्शन, साथ ही गोसंवर्धन की परियोजना जैसे सभी अनुभव विलक्षण थे ।
३. ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ की उत्तम व्यवस्था
इस महोत्सव में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का मार्गदर्शन होने के कारण वातावरण अधिक ही पवित्र बन गया । जब-जब सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी व्यासपीठ पर आते, तब-तब अपनेआप ही संपूर्ण वातावरण में चैतन्य का संचार
होता । संतों का मार्गदर्शन, साधकों के अनुभव एवं नेताओं के भाषणों से उपस्थित धर्मप्रेमियों को अपार ज्ञानसंपदा प्राप्त हुई । भोजन एवं अन्य सभी बातों का अत्यंत उत्तम प्रकार से प्रबंध किया गया था । अनुशासित, उत्साहित तथा अत्यंत प्रभावी पद्धति से इस महोत्सव का आयोजन किया गया था । गोवा के मुख्यमंत्री तथा उनके मंत्रीमंडल के सहयोग के कारण यह संपूर्ण कार्यक्रम निर्विघ्न रूप से संपन्न हुआ ।
४. आद्य शंकराचार्यजी ने पुनः जन्म लेकर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के कार्य का पुनः आरंभ किया है, यह भावना जागृत होना !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने साधकों को यह मूल मंत्र दिया है कि हिन्दू राष्ट्र का गतवैभव यदि पुनः प्राप्त करना है, तो उसके लिए गुरुकृपायोग के अनुसार’ साधना करनी पडेगी । ‘सनातन संस्था’ की स्थापना से लेकर अर्थात ही वर्ष १९९९ से वर्ष २०२५ तक उन्होंने सभी को अत्यंत अनुशासित पद्धति से यह मूल मंत्र सिखाया तथा उसका विराट स्वरूप ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में प्रत्यक्ष अनुभव करने को मिला । इससे पूर्व आद्य शंकराचार्यजी ने संपूर्ण विश्व में सनातन विचारों के सिद्धांत पहुंचाए, उसी प्रकार इस महोत्सव ने संपूर्ण विश्व के जनमानस में सनातन संस्कृति की महिमा जगाई । ‘मानो पुनः एक बार आद्य शंकराचार्यजी ने जन्म लिया है तथा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के कार्य का पुनः आरंभ हुआ है’, यह भावना सभी के मन में जागृत हुई ।
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के रूप में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के असंभव कार्य के प्रति विश्वास जगाया जाना !
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। – भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ७ अर्थ : ‘जब-जब धर्म की हानि होती है (अर्थात लोग धर्माचरण नहीं करते) तथा अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूं’, इस वचन के अनुसार ‘भगवान श्रीकृष्ण मानो सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के रूप में आए तथा उन्होंने इस महोत्सव के माध्यम से लाखों हिन्दुओं को संगठित कर यह विश्वास सभी के मन में जगाया कि ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का असंभव कार्य संभव है ।’ |
५. सनातन संस्था द्वारा साधना के मूलभूत सिद्धांत सरल भाषा में उपलब्ध कराना
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने अध्यात्म के विषय में एक गहन सूत्र बताया, ‘जितने व्यक्ति, उनकी प्रकृतियां, उतने साधनामार्ग’, जो अध्यात्म का मूलभूत सिद्धांत है । प्रत्येक व्यक्ति का परमेश्वर तक पहुंचने का मार्ग भिन्न हो सकता है । पृथ्वी पर यदि ८०० करोड लोग रहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर तक ले जाने के लिए ८०० करोड साधनामार्ग होंगे ।’
आज तक हमें अनेक गलत व्याख्याएं बताई गईं, जैसे कि ‘सनातन’ अर्थात संकीर्ण, पुरानी अथवा पुरातन विचारधारा’; परंतु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने ‘सनातन’ शब्द की जो व्याख्या विशद की है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है । उसके अनुसार ‘नित्य नूतन: इति सनातन: ।’ अर्थात जो प्रतिदिन नए सिरे से पल्लवित होता है तथा जो निरंतर नया ज्ञान देता है, वही सच्चा ‘सनातन’ है ! जो इससे पहले था, वर्तमान में है तथा इसके आगे भी अबाधित रहेगा । सच्चा सनातन का अर्थ है वेदों से चला आया अद्वितीय ज्ञान ! जिसे संतों ने काल के अनुसार अपनी भाषा में विशद किया। ‘जैसे विज्ञान की एक वैश्विक भाषा होती है, वैसे ही धर्म एवं संस्कृति, इन दोनों विषयों को विज्ञान की भाषा में समझाकर बताना चाहिए’, यह गुरुदेवजी का आग्रह था । वास्तव में देखा जाए, तो अध्यात्म भी आत्मा एवं परमात्मा से संबंधित शास्त्र है । इसके अनुसार शास्त्रोक्त पद्धति से की जानेवाली ईश्वर की साधना से निरंतर आनंद प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव है । इसके कारण ही ‘सनातन संस्था’ ने रामायण, महाभारत, भगवद्गीता एवं वेदों का सारगर्भ लोगों तक पहुंचाया है । उसके अंतर्गत सनातन संस्था द्वारा अत्यंत सरल भाषा में निर्मित ३६८ ग्रंथ प्रत्यक्ष जीवन में कार्यान्वयन करना संभव हो, इस स्वरूप के हैं ।
६. अध्यात्म की भाषा में ‘नौकरी’ करना ‘व्यष्टि साधना’, जबकि ‘व्यवसाय करना’ ‘समष्टि साधना’ !
मेरे मन में विचार आया कि ‘उद्योजकता के लिए इस आध्यात्मिक ज्ञान का कैसे उपयोग किया जा सकेगा ?’ अध्यात्म की भाषा में ‘नौकरी करना’ ‘व्यष्टि साधना’, जबकि ‘व्यवसाय करना’ ‘समष्टि साधना’ है; क्योंकि नौकरी करनेवालों का कार्य प्रमुखता से स्वयं के साथ उनके परिवार तक सीमित होता है; परंतु व्यवसाय करनेवालों के कारण समाज के विकास में सहायता होती है ।
उसके पश्चात मेरे मन में विचार आया, ‘उद्योगपति ही परिवर्तन के सच्चे शिल्पी हो सकते हैं; क्योंकि वे समष्टि साधना करते हैं ।’ जैसे इंग्लैंड में क्रांति आई, उस समय राजतंत्र को एक ओर रखकर उद्योगपतियों एवं व्यापारियों ने लोकतंत्र की स्थापना कराई । उद्योगपति एक प्रकार से राजा ही होता है; क्योंकि उसके पास रोजगार हेतु सैकडों-सहस्रों लोग होते हैं । महाभारत में ‘राजा कालस्य कारणम् ।’, ऐसा कहा गया है अर्थात ही समाज को बनाने में उद्योगपति ही राजा जैसी भूमिका निभा सकते हैं । उद्योगपतियों का यह प्रभाव इतना व्यापक होता है कि उनके साथ नौकरी करनेवाले २ सहस्र, ५ सहस्र; तो कभी-कभी लाखों लोग जुडे होते हैं । वे लोगों को अत्यंत अनुशासित पद्धति से काम करने के अभ्यस्थ बनाते हैं । उद्योगपति व्यवस्थापन के (‘मैनेजमेंट’ के) विभिन्न सिद्धांतों का अचूकता से उपयोग करते हैं ।
७. उद्योगों की वृद्धि के लिए कारण बने अध्यात्म के सिद्धांत तथा यह लेखमाला लिखने की प्रेरणा !
मन में यह विचार आया, ‘यदि इस व्यवस्थापन शास्त्र को आध्यात्मिक आधार मिला, तो उसका निश्चित ही बडा लाभ मिलेगा । इसके कारण उद्योगपतियों का स्वयं का जीवन समृद्ध होने के साथ ही उनके व्यवसाय का विस्तार होगा तथा देश के सर्वांगीण विकास में भी सहायता मिलेगी ।’ मैंने स्वयं भी इसका अनुभव लिया है । पितांबरी उद्योग की वृद्धि का कारण यही आध्यात्मिक सिद्धांत थे । ‘इसकी जानकारी अन्य उद्योगपतियों को मिले’, यह मन से इच्छा थी । ‘इसी अनुभव पर आधारित लेखमाला लिखी जाए’, यह विचार मन में आया तथा सभी के लिए उपयुक्त लेख लिखना आरंभ किया ।
‘अध्यात्मशास्त्र में सिद्धांतों का २ प्रतिशत तथा कृति का ९८ प्रतिशत महत्त्व है; इसीलिए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के आशीर्वाद से ही इस विचार का कार्यान्वयन होकर इस लेखमाला का यह पहला लेख पाठकों के सामने रखा है ।

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