
१. गर्भावस्था में ही यदि शिशु को साधना के संस्कार दिए गए, तो उससे पूर्वजन्म के संस्कार नष्ट होने में सहायता मिलती है !
‘बच्चे को तैयार करने का सबसे अच्छा आरंभ होता है गर्भावस्था में ही माता के द्वारा शिशु को साधना के संस्कार देना ! बालक के चित्त पर पूर्वजन्म के कोई अनावश्यक संस्कार हों, तो उन्हें दूर करने हेतु, बच्चे को सुरक्षा-कवच मिले, इसके लिए आध्यात्मिक स्तर के उपचार करना तथा बच्चे के साथ माता का बातें करना भी महत्त्वपूर्ण है । आरंभ से ही शिशु को ‘मैं तुम्हारी मां हूं’, ये संस्कार दें । इसके कारण शिशु के मन में माया के प्रति आसक्ति उत्पन्न नहीं होगी । जन्म लेनेवाले प्रत्येक साधक-जीव की सच्ची ‘गुरु’ तो माता ही होती है ।
२. बच्चे के माता-पिता ने स्वयं साधना की हो, तो उनके लिए बच्चे को साधना की घुट्टी पिलाना संभव है !
माता बच्चे को बताए, ‘हे बालक, तुम्हें राष्ट्र एवं धर्म के लिए कार्य करना है । तुम्हें गुरुसेवा कर उत्तम शिष्य एवं संत बनना है । तुम्हारा जन्म पृथ्वी में व्याप्त माया एवं गृहस्थी में संलिप्त होने के लिए नहीं हुआ है’, इसका तुम्हें अभी से भान हो । तुम्हारा जन्म ईश्वरप्राप्ति करने के लिए हुआ है ।’ इसके लिए बच्चे के माता-पिता को भी साधना का महत्त्व जानकर स्वयं साधना करनी चाहिए । साधना के संस्कारों से सुसंस्कृत माता-पिता ही बच्चों को साधना की घुट्टी पिला सकते हैं । इस आपातकाल में बच्चे को जन्म देना हो, तो माता-पिता ईश्वर से प्रार्थना करें, ‘हे ईश्वर, राष्ट्र एवं धर्म की सेवा, साथ ही गुरुसेवा तथा उनका कार्य करने हेतु आप हमारे गर्भ से सात्त्विक जीव को जन्म दें !’
३. बच्चे के पालन-पोषण का संपूर्ण दायित्व माता-पिता स्वयं पर लें !
जीव का जन्म होने के पश्चात उसे बडा करने का संपूर्ण दायित्व उसके माता-पिता स्वयं पर लें । वे यह अपेक्षा न रखें कि उनके बच्चे का पालन-पोषण करने में कोई अन्य सहायता करेगा । बच्चे के पालन-पोषण हेतु माता ही सर्वाेपरि परिश्रम उठाए । ‘आनेवाले आपातकाल में क्या हम यह दायित्व निभा सकते हैं ?’, इस पर भी विचार करें । सबकुछ अच्छा है तथा बच्चे के पालन-पोषण के लिए माता-पिता संपूर्ण रूप से सक्षम हैं, ऐसी स्थिति हो, तो कोई भी समस्या नहीं है; परंतु इसके लिए सभी की साधना आवश्यक है !
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ
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