हाल ही में प्रसारित हुई ‘द बंगाल फाइल्स’ में वर्ष १९४६ के कलकत्ता एवं नौखाली नरसंहार को यथार्थ रूप से चित्रित किया गया है । ११ अप्रैल २०२५ को बंगाल के मुर्शिदाबाद का दंगा ७९ वर्ष पहले घटित उन्हीं दंगों का एक लघु रूप है, ऐसे यह लेख पढने पर ध्यान में आएगा । मुर्शिदाबाद के एक प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ ने ‘सनातन प्रभात’ को इस दंगे के बारे में बताया । उनके ही शब्दों में यह लेख प्रकाशित कर रहे हैं । – एक धर्मनिष्ठ, बंगाल

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| दंगो के समय ध्वस्त हुए मोहल्लों एवं अन्य वस्तुओं के छायाचित्र | |
माहों बाद भी, मुर्शिदाबाद ११ अप्रैल की चोटों को नहीं भूल पाया है । परिवार विस्थापित रहे, आजीविका नष्ट हुई और सुरक्षा का आभास समाप्त नहीं हुआ । दंगे केवल कानून और व्यवस्था की विफलता नहीं थे; ये राजनीतिक रणनीति का परिणाम थे, जिसमें संरक्षण को न्याय से ऊपर रखा गया ।
ममता बनर्जी की सरकार आकस्मिक रूप से नहीं फेल हुई । यह जानबूझकर फेल हुई । दंगाइयों को सुरक्षित मार्ग देकर, पीडितों को चुप कराकर और सूचना को रोककर हिंसा की नहीं, मुख्यमंत्री ने अपने संवैधानिक कर्तव्य की उपेक्षा की । मुर्शिदाबाद की त्रासदी अब चेतावनी बन चुकी है, जब संरक्षण की राजनीति शासन पर हावी होने दी जाती है, तो इसका मूल्य खून, आस्था और आम नागरिकों के टूटे जीवन के रूप में चुकाई जाती है ।
११ अप्रैल को मुर्शिदाबाद में अभूतपूर्व रक्तपात हुआ । वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध में आरंभ हुए विरोध प्रदर्शन तेजी से संगठित दंगों में बदल गए । कई घंटों तक भीड ने लूट, आगजनी और हत्याएं की, जबकि राज्य मशीनरी तटस्थ रही । इसके पीछे का विनाश केवल साम्प्रदायिक क्रोध नहीं दिखाता, बल्कि ममता बनर्जी सरकार की चौंकानेवाली विफलता और उसकी निष्क्रियता उजागर करता है ।
पूरा मोहल्ला ध्वस्त हो गया । पुलिस वाहन और निजी घर जलाए गए, दुकानों को लूट लिया गया और पवित्र मूर्तियां नष्ट कर दी गईं । यहां तक कि २०० वर्ष पुराने मंदिर की पवित्रता भी नष्ट कर दी गई और उसमें रखी भेंट सामग्री बिखेर दी गईं । यह केवल भीड की हिंसा नहीं थी; यह योजनाबद्ध, लक्षित और प्रशासनिक मौन द्वारा समर्थित थी ।
सडकों पर खून
चंदन दास और उनके पिता हरिगोविंद दास की निर्मम हत्या ने भयावहता को चरम पर पहुंचाया । उन्हें उनके घर से खींचकर खुले दिन में मार डाला गया । उनके आवास के बाहर खून के धब्बे, टूटे दरवाजे और बिखरी सामग्री यह प्रमाण बन गए कि राज्य ने अपने नागरिकों को छोड दिया था । साक्षी बताते हैं कि पत्थरबाजी लगातार चार घंटे चली और पुलिस स्टेशन पास में होते हुए भी एक भी अधिकारी उपस्थित नहीं हुआ । यह अनुपस्थिति संयोग नहीं थी । यह राजनीतिक षड्यंत्र का परिणाम था ।
ममता की ‘सुरक्षित राह’ की राजनीति
दंगे ने बंगाल में लंबे समय से भयभीत लोगों की शंका को सत्य साबित किया : ममता बनर्जी की सरकार ने हिंसक तत्त्वों को सुरक्षित मार्ग प्रदान किया । अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ हिस्सों को जवाबदेही से बचाकर, उनका प्रशासन भीड को निडर होकर हिंसा करने के लिए प्रोत्साहित करता रहा ।
पीडितों ने बार-बार सरकार पर जानबूझकर निष्क्रिय रहने का आरोप लगाया । एक निवासी ने कहा, ‘यह प्रशासन, पुलिस और खुफिया की विफलता थी ।’ वास्तव में यह केवल विफलता नहीं थी । यह विश्वासघात था । जब हिंदुओं को घर से खींचकर मारा गया, राज्य ने मुंह मोड लिया । जब मंदिर लूटे गए, राज्य मौन रहा । जब दुकानों को आग लगी, सरकार ने इंटरनेट बंद किया, हिंसा को नहीं । ममता की यह चयनात्मक संरक्षण नीति ऐसा वातावरण बनाती रही, जहां दंगाई अछूते अनुभव करते थे । संदेश स्पष्ट था : जब तक हिंसा वोट बैंक की सेवा करती रहेगी, राज्य मशीनरी निष्क्रिय रहेगी ।
मानवीय हानि
घरबार छोड चुके परिवारों को पैरालमपुर हाईस्कूल जैसे अस्थायी राहत शिविरों में ठूंस दिया गया, जहां सैकडों लोग दो पंखोंवाले कमरे में जीने को मजबूर थे । खुले शौचालय, कम भोजन और अनिश्चितता ने उनके जीवन को कठिन बना दिया । एक पुरुष ने कहा : ‘‘सबकुछ चला गया… मेरे जीवन की कमाई खत्म हो गई ।’’ यह कष्ट सहज क्रोध का परिणाम नहीं था, बल्कि प्रणालीगत उपेक्षा का परिणाम था ।
जबकि हिन्दू नागरिक सुरक्षा की गुहार लगा रहे थे, ममता बनर्जी उदासीन रहीं । कानून और व्यवस्था सुनिश्चित करने के बजाय, उनका प्रशासन अराजकता के लिए उत्तरदायी लोगों को संरक्षित करता रहा ।
खतरनाक बयानबाजी
दंगे के बीच, खतरनाक बयान दिए गए, परंतु उन्हें दंडित नहीं किया गया । किसी ने कहा : ‘यदि कोई इस्लाम के बारे में गंदी बात करेगा, तो हम पाकिस्तान बना देंगे । ऐसी अलगाववादी बयानबाजी, जिसे राज्य ने नहीं रोका, लंबे समय से किया जा रहा राजनीतिक संरक्षण राजनीति के परिणाम को दर्शाता है । कट्टरपंथी तत्त्वों के विरुद्ध कार्रवाई से इनकार कर, ममता बनर्जी ने बंगाल की धरती पर भारत की एकता को खुले तौर पर संकट में डाल दिया ।
विश्वासघात किए गए लोग
मुर्शिदाबाद के निवासियों की मांग स्पष्ट थी : सुरक्षा । उन्होंने राष्ट्रपति शासन और बी.एस.एफ. शिविर की मांग की, यह विश्वास करते हुए कि केवल केंद्र सरकार का सक्रिय हस्तक्षेप ही उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है । उनकी यह मांग स्वयं राज्य सरकार के प्रति कटु आलोचना थी । अर्थात वे अब ममता बनर्जी पर भरोसा नहीं करते ।
| मुर्शिदाबाद की इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि बंगाल में हिन्दू कितना असुरक्षित जीवन जी रहे हैं । बल्कि ऐसे कहें कि आज के बंगाल में हिन्दू हितरक्षा के लिए युद्ध स्तर पर उचित कदम नहीं उठाए गए, तो पश्चिम बंगाल कुछ ही वर्षों में ‘पश्चिम बांग्लादेश’ बन जाएगा । बंगाल के हिन्दुओ, क्या आपको वर्ष १९४६ के कलकत्ता-नौखाली दंगों को पुन: वर्ष २०४६ में होते देखना है ? यदि नहीं, तो अपने धर्म एवं सम्मान की रक्षा हेतु अब तो संगठित होकर आवाज उठाओ ! – संपादक |




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