
नवमी के दिन ब्रह्माण्ड में रजोगुणी पृथ्वी एवं आप तत्त्वों से संबधित शिवतरंगों की अधिकता होती है, जिसके कारण इन तरंगों की सहायता से श्राद्धविधि से प्रक्षेपित मन्त्रोच्चारण युक्त तरंगें शिवरूप में ग्रहण करने का सूक्ष्म बल सम्बन्धित सुहागिन की लिंगदेह को प्राप्त होता है । इस दिन कार्यरत शिवतरंगों का पृथ्वी एवं आप तत्त्वात्मक प्रवाह सम्बन्धित लिंगदेह के लिए आवश्यक तरंगों का अवशोषण करने में पोषक एवं पूरक होता है । इस दिन सुहागिन में निहित शक्तितत्त्व का संयोग सूक्ष्म शिवशक्ति के साथ सरलता से सम्भव होता है तथा सुहागिन की लिंगदेह तुरन्त ऊर्ध्व गति धारण करती है । इस दिन शिवतरंगों की अधिकता के फलस्वरूप सुहागिन को सूक्ष्मरूपी शिव-तत्त्व का बल प्राप्त होता है । उसके स्थूल शिवरूपी पुरुषप्रकृति से जुडे पृथ्वी के संस्कारों संबंधी घनिष्ट आसक्ति युक्त बन्धनों का विघटन होता है, जिससे उसे पतिबन्धन से मुक्त होने में सहायता मिलती है । इसलिए रजोगुणी शक्तिरूप की प्रतीक सुहागिन का श्राद्ध महालय में शिवतरंगों की अधिकता दर्शानेवाली नवमी के दिन करते हैं ।
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