डॉ. आनंद रंगनाथन् का जन्म विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक परिवार में हुआ । इसलिए उनकी पृष्ठभूमि ही आजीवन ज्ञान एवं सत्य को स्वीकारने की है । उनके पिता स्वर्गीय सुब्रमण्यम् रंगनाथन् प्रख्यात ‘बायोऑर्गेनिक कैमिस्ट’ (जैविक रसायनशास्त्र) एवं ‘आई.आई.टी. कानपुर’ में प्राध्यापक थे और उनकी मां डॉ. दर्शना रंगनाथन् ‘ऑर्गेनिक कैमिस्ट’ (सेंद्रिय रसायनशास्त्रज्ञ) के क्षेत्र में अग्रणी थीं । ऐसे बौद्धिक रूप से संपन्न वातावरण में पले-बडे होने से डॉ. आनंद को युवावस्था से ही वैज्ञानिक एवं चिकित्सक दृष्टि से विचार करने में रुचि निर्माण हुई । देहली के सेंट स्टीफन्स महाविद्यालय से उन्होंने ‘रसायनशास्त्र’ में ‘बी.एस.सी. (ऑनर्स)’ की पदवी प्राप्त की । तदुपरांत उन्हें इंग्लैंड में कैंब्रिज विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित ‘नेहरू सेन्टेनरी शिष्यवृत्ति’ मिली । केंब्रिज में पेमब्रोक महाविद्यालय से उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान में ‘बी.ए. (ट्रीपोस)’ की पदवी, तदुपरांत ‘एम.एम.’ की पदवी एवं ‘पीएच.डी.’ की पदवी प्राप्त की । यह पदवी प्राप्त होने के पश्चात ‘बायोकेमिस्ट्री’ (जीवरसायनशास्त्र) में प्रवीणता पाई । इस प्रकार ‘समाज के विद्वान’ की भूमिका की नींव रची गई ।

विशेष सदर

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी मावले और सैनिकाें का त्याग सर्वोच्च है, ठीक वैसे ही आज भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ तथा राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा के लिए ‘सैनिक’ के रूप मे कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्म-रक्षण के संघर्ष की जानकारी देने वाले ‘हिन्दुत्व के वीर योद्धा’ इस लेखमाला के द्वारा दूसरों को भी प्रेरणा मिलेगी । इन उदाहरणों से अपने मन की चिंता दूर हो कर उत्साह उत्पन्न होगा ! – संपादक
१. वैज्ञानिक कार्यकाल
‘डॉक्टरेट’की पदवी मिलने के पश्चात डॉ. रंगनाथन् केंब्रिज विश्वविद्यालय के ‘बायोकेमिस्ट्री’ विभाग में ‘पोस्ट डॉक्टरल फेलो’ वर्ष १९९८-९९ में अपने कार्यकाल का शुभारंभ किया । उन्होंने विदेश में स्थायी होने के बजाय भारत की वैज्ञानिक प्रगति में अपना योगदान देने हेतु हाथ लगाने के लिए स्वदेश पुन: लौटने का निर्णय लिया । वर्ष १९९९ में नई देहली के ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी’ में शोधकर्ता वैज्ञानिक के रूप में काम देखते हुए उन्होंने १६ वर्षाें तक प्रयोगशाला में काम किया । इस काल में उन्होंने ‘मॉलिक्युलर बायोलॉजी’ (आण्विक जीवशास्त्र) के क्षेत्र में विशेषरूप से ‘डायरेक्टेड इवल्यूशन एंड पैथोजिनेसिस’ में अभूतपूर्व शोधकार्य किया । उनके इस शोधकार्य से क्षयरोग एवं मलेरिया जैसे रोगों पर सीधा प्रभाव पडा था । इस नए शोधकार्य के कारण उन्हें ‘एक बुद्धिमान शास्त्रज्ञ’ के रूप में मान्यता मिली ।

वर्ष २०१५ में नई देहली के जवाहरलाल नेहरू विद्यापीठ के ‘स्पेशल सेंटर फॉर मॉलिक्युलर मेडिसिन’ केंद्र में सहायक प्राध्यापक के रूप में काम किया । वर्ष २०१९ में वे विद्यार्थियों के मार्गदर्शक एवं संक्रामक रोगों के विषय में ‘प्रगत संशोधक’ के रूप में जवाहरलाल नेहरू विद्यापीठ में पूर्णकालिक प्राध्यापक हुए । उनके कार्यकाल में उन्हें ‘इंडियन नेशनल सायन्स अकैडमी’ द्वारा ‘यंग साइंटिस्ट पदक (२००७)’ (युवा शास्त्रज्ञ) एवं ‘वर्ल्ड अकैडमिक फोरम’ का ‘यंग साइंटिस्ट पुरस्कार (२०१२)’, ये दो प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले ।

२. लेखक, समीक्षक एवं समाज के विद्वान के रूप में सार्वजनिक मान्यता
एक वैज्ञानिक के रूप में कार्य करते हुए डॉ. रंगनाथन् ने एक लेखक, स्तंभ लेखक एवं पत्रकार के रूप में लेखन करते हुए समाज में प्रख्यात बुद्धिजीवी के रूप में अपनी विशेष पहचान बनाई है । उन्होंने अब तक ५ पुस्तकें लिखी हैं । उन्होंने वर्ष २०१२ में ‘द लैंड ऑफ विल्टेड रोज’, वर्ष २०१५ में ‘फॉर लव एंड ऑनर’, वर्ष २०१९ में सहलेखिका चित्रा सुब्रमण्यम् के साथ ‘द रैट ईटर’, वर्ष २०२३ में ‘सौफल’ एवं ‘हिन्दू इन हिन्दू राष्ट्र’, ये पुस्तकें लिखीं । (उनकी आगामी पुस्तक भारत के विस्मृत वैज्ञानिकों के विषय में है और इससे उनकी रुचि का पता चलता है ।) स्तंभलेखक के रूप में उनके लेख ‘न्यूज लाँड्री’, ‘डी.एन्.ए.’, ‘फर्स्टपोस्ट’, ‘दी न्यूज माइन्यूट’ में प्रकाशित हुए हैं । तदुपरांत ‘स्वराज्य’ नामक मासिक पत्रिका में ‘परामर्शदाता संपादक’ अर्थात सलाहकार संपादक के रूप में निरंतर लेखन किया । उनके लेखन में दांभिकता और आलोचकों के प्रति तीक्ष्ण विश्लेषण एवं उपहास झलकता है । केवल लेखन ही नहीं, अपितु वह भारतीय समाचार वाहिनी पर एक परीचित चेहरा बन गया है । वर्ष २०१० के उपरांत प्रमुख समाचार वाहिनियों के (न्यूज चैनलों के) चर्चासत्रों में वे नियमित रूप से दिखाई देने लगे हैं । अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और घटनाओं की जानकारी पर प्रभुत्व से उन्होंने अपनी पहचान बना ली है । ‘स्वराज्य’ पत्रिका के लेखों से सामाजिक माध्यमों के समीक्षकों में वे सर्वाधिक फॉलोअर्सवाले ‘समीक्षक’ हैं । ‘एक्स’ एवं ‘दूरदर्शन’ पर उनके संदेश परिणामकारक सिद्ध हो रहे हैं । वे अपने ‘@A Ranganathan72’ इस ‘एक्स’ हैंडल द्वारा निडरता से ट्वीट करते हैं । उनके ट्वीट प्रखर एवं जानकारीपूर्ण होने से उनके सहस्रों ‘फॉलोअर्स’ हैं ।

३. इस्लाम के कट्टरतावाद की निर्भयता से आलोचना
डॉ. रंगनाथन् को सार्वजनिक मान्यता मिलने का मुख्य कारण है इस्लाम के कट्टरतावाद एवं धार्मिक मूलतत्त्ववाद के विषय में निर्भयता से आलोचना ! जिस काल में अनेक बुद्धिमान लोग इस विषय पर बेधडक बोलना टालते थे, तब डॉ. रंगनाथन् बेधडक बोलते थे । वे युक्तिवाद करते हुए ‘तथाकथित इस्लामी कट्टरतावादी मूल सीख का शब्दशः अर्थ लेकर छिपे रहने के स्थान पर इस वास्तविकता का सामना करो’, इस प्रकार समाज का आवाहन करते हैं । ‘दूरदर्शन’ पर चर्चाओं में किसी प्रकरण एवं उससे संबंधित वास्तविक घटना बताने में वे आगे-पीछे कुछ नहीं देखते, उदा. कट्टरतावादियों द्वारा प्रयुक्त कुरान के परिच्छेद वे निर्भयता से प्रस्तुत करते हैं । उनके स्पष्टवादिता के कारण मूलतत्त्ववादी क्रोधित होकर उन्हें अपना लक्ष्य बनाने का प्रयत्न करते हैं; परंतु वे उसमें भी शांत एवं स्थिर रहते हैं ।
| Anand Ranganathan Launches his Book Hindus in Hindu Rashtra | Sudhanshu Trivedi | #TJD2023
(सौजन्य : The Jaipur Dialogues) |
४. डॉ. आनंद रंगनाथन् की वैज्ञानिक बुद्धि, लेखन की प्रतिभा एवं योद्धा वृत्ति जैसे गुणों द्वारा विषयों का प्रस्तुतीकरण
डॉ. आनंद रंगनाथन् का अदम्य साहस और उनके वक्तव्यों में सुस्पष्टता, इस कारण वे जनमानस में लोकप्रिय हैं । विद्यापीठ में व्याख्यान हो अथवा पुस्तक का प्रकाशन हो या दूरदर्शन पर चर्चासत्र, वे नपे-तुले अच्छे शब्दप्रयोग कर अंग्रेजी बोलते हैं । उनकी बोलने की शैली में विनोद भी होता है । साथ ही विरोधकों को झुकाने के लिए ऐतिहासिक घटनाएं अथवा आंकडेवारी सहित अपना विषय सुस्पष्ट करते हैं । दूरदर्शन पर होनेवाली चर्चाओं में जब नेता आरोप करते हैं, तब वे शांत रहते हैं; परंतु जब उन्हें अपना विषय रखने का समय दिया जाता है, तब वे उनके युक्तिवाद का खंडन कर, उस प्रकरण का खुलासा करते हैं, उदा. एका चर्चासत्र में हिन्दुओं के उत्सव में नामस्मरण करने के विषय में की गई आलोचना पर उन्होंने कहा, ‘‘अब हमें अपराधीपन की भावना से ग्रस्त हिन्दू बनकर नहीं रहना है । हम ऐसा करते-करते थक चुके हैं ।’’ डॉ. रंगनाथन् का सामाजिक माध्यमों में सहभाग बचावात्मक चर्चा तक सीमित नहीं है । भारत एवं हिन्दू सभ्यता किसलिए है, वे इससे संबंधित प्रेरणादायी दृष्टि देते हैं । स्वामी विवेकांनद अथवा म. गांधी के अपरीचित विचार बताने के स्थान पर वे दर्शकों को सनातन धर्म की धर्मनिरपेक्षता एवं सर्वसमावेशक विशेषता पर प्रकाश डालते हैं । वे कहते हैं, ‘हिन्दू धर्म का सौंदर्य यह है कि वह संयुक्त सभ्यतावादी परिवार में विश्वास न रखनेवालों को भी आश्रय देता है । महाविद्यालय एवं यू ट्यूब पर कार्यक्रमों से उन्होंने युवाओं को प्रोत्साहित किया कि ‘किसी के प्रति द्वेष न रखते हुए उनकी परंपराओं का आदर करें, इतिहास का अध्ययन करें और निडरता से अपने अधिकारों की मांग करें !’ ‘बहुसंख्यकों के लिए समान अधिकार’ उनका यह मंत्र सामाजिक माध्यमों द्वारा युवा पीढी तक पहुंचा और अब युवकों की निराशा के विषय में आवाज उठा रहा है ।
हिन्दुत्व के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य करनेवाले ही मेरे प्रेरणास्थान ! – डॉ. आनंद रंगनाथन्

डॉ. आनंद रंगनाथन् को किससे प्रेरणा मिली ?, इस विषय में बताते हुए वे विनम्रता से कहते हैं, ‘‘मेरी इसमें कोई भूमिका नहीं । जिन लोगों ने हिन्दुत्व के लिए कुछ किया है, उनसे मुझे प्रेरणा मिली । उन्हें निःस्वार्थ भाव से कार्य करते देख, मैं नतमस्तक हो जाता हूं । उनमें से कुछ नाम यदि लेने हों, तो अधिवक्ता जे. साईदीपक, विक्रम संपथ, टी.आर. रमेश जैसे अनेक जन हैं । वास्तव में ये सभी प्रसिद्ध व्यक्तित्व ही मेरे प्रेरणास्थान हैं ।’’
डॉ. रंगनाथन् का विवेक से विचार प्रस्तुत करने के कारण बुद्धिमानों में उनका नाम भी स्थायी हो गया है । साहित्यिक उत्सव, विचारकों की परिषद एवं वेबिनार में सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता जे. साईदीपक एवं इतिहासकार विक्रम संपथ जैसे स्पष्टतावादियों के साथ वे विविध व्यासपीठों पर होते हैं । इस व्यासपीठ से वे ‘मॉलिक्युलर बायोलॉजी’ एवं मध्ययुगीन इतिहास’ की समकालीन राजनीति का संबंध स्पष्ट करते हैं । धार्मिक दंगे अथवा न्यायालय के निर्णय के विषय में प्रमाण एवं जानकारी पर जोर देने से उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्पष्ट होता है । उनमें वैज्ञानिक बुद्धि, लेखन की प्रतिभा और योद्धा वृत्ति जैसे अनोखे गुणों का मिलाप है । इस कारण उन्हें आधुनिक काल के ‘हिन्दुत्व के योद्धा’ संबोधित किया जाता है ।
५. प्रेरणादायी स्पष्टता और निडरता
डॉ. रंगनाथन् का केंब्रिज विद्यापीठ के सभागृह, जवाहरलाल विद्यापीठ, खचाखच भरे हुए समाचार वाहिनियों के कक्ष एवं देहली में दूरदर्शन का स्टूडियो, उनकी यह यात्रा स्पष्टता और धैर्य का प्रेरणादायी उदाहरण है । वे अपनी प्रयोगशाला के प्रयोगों के रिजल्ट और उनकी जर्नल में प्रसिद्धि से संतुष्ट होकर शांत प्रवृत्ति के वैज्ञानिक बन सकते थे; परंतु उसके स्थान पर उन्होंने कुछ बलवान धार्मिक कट्टरता और धर्मनिरपेक्ष उच्चभ्रू वर्ग की आत्मसंतुष्टता को आवाहन देने के लिए घटना एवं निर्भय विश्वास के आधार पर सार्वजनिक व्यासपीठ पर कदम रखा । ऐसा करते समय उन्होंने अनेक भारतीयों को बोलने की प्रेरणा दी । प्रभावी कथानकों के कारण युवाओं को डॉ. रंगनाथन् के व्याख्यान सुनने पर अथवा उनका साहित्य पढने पर उन्हें अपनी आवाज मिली । तार्किक युक्तिवाद और नैतिकता पर आधारित सार्वजनिक व्याख्यानों पर बल देकर उन्होंने दिखा दिया कि कोई भी अध्ययनशील व्यक्ति प्रखर विचार प्रस्तुत करनेवाला और तत्त्वनिष्ठ बन सकता है । रंगनाथन् का प्रभाव राजनीति के परे है, यह महत्त्वपूर्ण है । चर्चासत्रों से हिन्दुत्व का पक्ष रखते समय वे राजनीति अथवा राजनैतिक दल की असफलता के विषय में नहीं बोलते रहते । सत्य एवं न्याय की खोज, उनका ध्येय है । डॉ. रंगनाथन् को अनेक विशेषण मिले हैं । शास्त्रज्ञ, प्राध्यापक, लेखक, स्तंभलेखक, भडकानेवाला, मतभेद करनेवाला, देशभक्त, इस प्रकार उनके विशेषण हैं; परंतु ‘हिन्दुत्व का योद्धा’, यह विशेषण सटीक है । वे केवल हथियारों का उपयोग कर द्वेष फैलानेवाले योद्धा नहीं, अपितु शब्दों का उपयोग करनेवाले और समाजजागृति करनेवाले योद्धा हैं । किसी हिन्दुत्व की धरोहर को लेकर कैसे स्वाभिमानी हो सकते हैं, इसके साथ ही विश्वबंधुत्व की भावना रखनेवाले, तर्कशुद्ध और सर्वसमावेशक हो सकते हैं, इसके कुछ उदाहरण दिए हैं । भय उत्पन्न करनेवाली और डगमगा जानेवाली आवाजों के काल में डॉ. रंगनाथन् की सुस्पष्टता एवं धैर्य के कारण अनेकों के मन में चिंगारियां उठने लगी हैं । इससे वे ‘नैरेटिव’(कथानक) विषय में प्रश्न पूछना, समानता के लिए मांग करना और सत्य के लिए घबराना नहीं, इस विषय में उन्होंने आवाहन किया है । वे लिखते हैं, सिखाते हैं और भाषण देने के कारण उनका प्रभाव बढ रहा है और भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में वे छाप छोड रहे हैं । आनंद रंगनाथन् को इस बात की निश्चिति है कि उनके सामने उपस्थित प्रश्न उपेक्षित रहने से बात नहीं बनेगी, इसलिए यह करते समय भारत की आत्मा की रक्षा करनेवाले आधुनिक योद्धाओं में उन्होंने स्थान पाया है ।
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