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(एन.सी. ई.आर.टी. : (नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) – राष्ट्रीय शैक्षणिक संशोधन एवं प्रशिक्षण परिषद)

नई दिल्ली – एन.सी. ई. आर.टी. की कक्षा ९वीं की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में ‘मनु स्मृति’ के एक श्लोक का उल्लेख किया गया है । पुस्तक में कहा गया है कि वैदिक काल में महिलाओं को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था; परंतु समय के साथ उनकी सामाजिक स्थिति में विविध परिवर्तन आए एवं कुछ कालखंडों में उसमें पतन भी दिखता है ।
📚 NCERT Corrects Historical Narrative
New Social Science textbook (Class 9) highlights:
• Women were respected in the Vedic period (citing Manusmriti)
• Women sages like Apala, Vishvavara, Ghosha & Lopamudra
• Early varna system was based on duties, not birthPresenting… pic.twitter.com/DeTIjd2ygs
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) June 26, 2026
प्रश्न: पाठ्यपुस्तक में मनुस्मृति का उल्लेख किस अध्याय में किया गया है ?
पाठ्यपुस्तक के ‘ईस्वी संवत १०००० तक के राज्य एवं समाज’ अध्याय में कहा गया है कि वैदिक काल का वर्णन उस कालखंड के रूप में किया जाता है, जब महिलाओं को समाज में उच्च एवं सम्मानजनक स्थान प्राप्त था ।
स्त्री-ऋषियों का भी उल्लेख !
अध्याय में आगे लिखा गया है कि महिलाएं विद्वत्ता-पूर्ण शिक्षा में भाग लेती थीं । कुछ विशेष परिस्थितियों में महिलाएं पुरुषों के समकक्ष धार्मिक विधियां करती थीं एवं सार्वजनिक समारोहों में भी भाग लेती थीं । ऋग्वेद की कई ऋचाओं का श्रेय पारंपरिक रूप से अपाला, विश्ववारा, घोषा एवं लोपामुद्रा जैसी विदुषियों को दिया जाता है ।
इसके उपरांत मनु स्मृति ३.५६ का संदर्भ दिया गया है, जिसके अनुसार ‘जहां महिलाओं का सम्मान किया जाता है, वहां देव प्रसन्न होते हैं; जहां उनका सम्मान नहीं किया जाता, वहां सारे धार्मिक कर्म निष्फल हो जाते हैं ।’
पाठ्यपुस्तक के अन्य प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं… !
१. मनु स्मृति एक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें समाज एवं कानून से संबंधित नियम बताए गए हैं । जाति एवं स्त्रियों के स्थान को लेकर यह ग्रंथ दीर्घकाल से चर्चा एवं विवाद का विषय रहा है ।
२. तथापि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि समय के साथ स्त्रियों की स्थिति स्थिर नहीं रही । विभिन्न युगों में सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों के कारण कभी स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ, तो कभी पतन हुआ । तदापि महिलाएं अनेक क्षेत्रों में सक्रिय रहीं । गृहकार्य, कृषि, हस्तकला एवं धार्मिक कार्यों में उन्होंने निरंतर योगदान दिया ।
३. गुप्त-वाकाटक काल के साहित्य में ऐसी स्त्रियों का वर्णन मिलता है, जो सुशिक्षित एवं कलाओं में निपुण थीं । ऐतिहासिक अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि कई रानियों ने राज्य प्रशासन एवं धार्मिक क्रियाकलापों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
४. इस संदर्भ में वाकाटक राज्य की शासक प्रभावती गुप्त का उदाहरण दिया गया है । उस समय के संगम साहित्य में महिलाओं को समाज एवं अर्थव्यवस्था में सक्रिय सहयोगी के रूप में चित्रित किया गया है ।
सामाजिक भूमिकाओं के आधार पर विकसित वर्णव्यवस्था !
अध्याय में यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रारम्भिक वैदिक समाज में व्यक्ति की सामाजिक पहचान केवल जन्म पर आधारित नहीं थी; अन्य कारक भी महत्वपूर्ण थे । प्रारम्भिक वैदिक ग्रंथों में जन्म पर आधारित निश्चित सामाजिक स्तर का उल्लेख नहीं मिलता । इसके स्थान पर माना जाता है कि सामाजिक पहचान वांशिक समूह, उप-समूह, प्रदेश, गांव, भाषा, व्यवसाय एवं विशेषतः सांस्कृतिक संबंधों जैसे तत्वों के जटिल परस्पर संबंधों से निर्मित होती थी । ऋग्वेद के प्रमाण बताते हैं कि एक ही परिवार में भी व्यवसायगत विविधता थी एवं एक सूक्ति का उदाहरण दिया गया है, जिसमें कहा गया है, ‘मैं कवि हूं; मेरे पिता वैद्य हैं; मेरी मां अनाज पीसने का कार्य करती है ।’
मूल्य-आधारित वर्ण !
अध्याय में आगे कहा गया है कि समय के साथ समाज में चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) की विशिष्ट भूमिकाएं विकसित हुईं । तथापि प्रारम्भिक काल में इन वर्णों को कठोर सामाजिक समूह के रूप में नहीं देखा जाता था, अपितु लोगों की कर्म-कार्य एवं दायित्वों के आधार पर उनकी पहचान होती थी । दूसरे शब्दों में, वर्णव्यवस्था का प्रारम्भिक उद्देश्य लोगों को कठोरतापूर्वक वर्गीकृत नहीं करना था, अपितु समाज में कार्यों का विभाजन करना था । इस प्रकार वर्ण एक ऐसी मूल्य-प्रणाली पर आधारित अवधारणा थी जहां ज्ञान को सर्वोच्च स्थान मिला एवं उसके उपरांत राजनीतिक शक्ति तथा संपत्ति का स्थान था । ‘सुत्त निपात’ नामक बौद्ध ग्रंथ का संदर्भ देते हुए यह भी कहा गया है कि सामाजिक प्रतिष्ठा जन्म पर नहीं, अपितु व्यक्ति के कर्म पर निर्भर करती है ।
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