सनातन धर्म की साक्षात मूर्ति सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी तथा उनका अद्वितीय कार्य !

सनातन धर्म की साक्षात मूर्ति तथा धर्मसंस्थापना का कार्य करनेवाले सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी !

‘जिस प्रकार वेद अपौरुषेय हैं, उसी प्रकार सनातन धर्म भी अपौरुषेय है । यह अपौरुषेय सनातन धर्म प्राणिमात्र का अभ्युदय करता है । प्राणिमात्र को ‘धर्म क्या है ?’, यह समझ में आए तथा उसके अनुसार अनुसरण करना उन्हें सुलभ हो; इसके लिए ईश्वर सगुण रूप में पृथ्वी पर आते हैं । ईश्वर धर्म के लिए ही पृथ्वी पर आते हैं । श्रीराम का वर्णन करते समय मारीच असुर रावण से कहता है, रामो विग्रहवान् धर्मः ।’ (वाल्मीकिरामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग ३७, श्लोक १३) अर्थात ‘श्रीराम धर्म की साक्षात मूर्ति हैं’ अर्थात श्रीराम स्वयं धर्म का साकार रूप हैं । कलियुग में धर्म का इस प्रकार का मूर्तिमान रूप मिलना असंभव है । २६०० वर्ष पूर्ण ईश्वर ने दक्षिण भारत में ‘आदि शंकराचार्यजी’ के रूप में आकर धर्मसंस्थापना का कार्य किया । उसके उपरांत सनातन धर्म के साकार रूप में किसी ने पृथ्वी पर धर्मसंस्थापना का कार्य किया हो, तो वे हैं सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा स्थापित ‘सनातन संस्था’ !

श्री. विनायक शानभाग

गुरुदेवजी द्वारा प्रदान किया गया साधना का मार्ग है स्वभावदोष एवं अहं का निर्मूलन करते-करते ईश्वरप्राप्ति हेतु भक्ति का मार्ग ! इस मार्ग पर अग्रसर सहस्रों साधकों का समूह है ‘सनातन संस्था’ ! ‘सनातन संस्था’ गुरुदेवजी द्वारा स्थापित की गई केवल एक पंजीकृत आध्यात्मिक संस्था नहीं है, अपितु वह कलियुग के अंधकार में जन्म-मृत्यु के चक्र में संलिप्त जीवों के लिए ईश्वर द्वारा दिखाया प्रकाशमय एवं ज्ञानमय पथ है ।

‘सनातन संस्था के मार्ग पर चलते समय साधकों को प्राप्त दैवी अनुभव अगले १ सहस्र वर्षाें तक मानवजाति को मार्गदर्शक सिद्ध हों तथा यह जिनके कारण हुआ, ऐसे सनातन धर्म की साक्षात मूर्ति, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की कीर्ति दसों दिशाओं में अविनाशी हो’, यह श्रीमन्नारायण के चरणों में प्रार्थना है !’

अहंकार का युग कहे जानेवाले कलियुग में साधकों से स्वभावदोष एवं अहं का निर्मूलन कर लेनेवाले ‘धर्ममार्तंड सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी’ !

कलियुग अहंकार एवं असत्य का युग है । ‘वृषभ’ धर्म का एक रूप है तथा ‘सत्य, तप, शौच एवं दया’, ये धर्म के ४ स्तंभ हैं, जो वृषभ के पैर हैं । धर्म के इन ४ स्तंभों में केवल ‘सत्य’ के एक ही स्तंभ पर खडा युग है ‘कलियुग’ ! इसका अर्थ कलियुग में धर्म केवल ‘सत्य’ के एक ही पैर पर खडा है । ‘काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, माया’ इत्यादि विभिन्न विकारों से भरा हुआ युग है कलियुग ! इस युग में बिना किसी विकार का मनुष्य मिलना कठिन है । ‘योगी, महंत, स्वामी, तपस्वी, संत, महापुरुष’ आदि विशेषणों को कालिख पोतनेवालों का यह युग है । विकार बाहर से दिखाई नहीं देते; क्योंकि वे मायावी होते हैं तथा उसके कारण ही कलियुग को ‘मायावी युग’ कहा गया है । ऐसे इस कलियुग में वर्तमान का यह घोर कलियुग है । ऐसा होते हुए ‘विकारों पर नियंत्रण प्राप्त कर, साथ ही विकारों को उछालने न देकर संयमित राष्ट्र एवं प्रजा तैयार की जा सकती है’, इसे जिन्होंने जान लिया है, वे धर्ममार्तंड ही हैं । उन्होंने साधकों को माध्यम बनाकर उनके द्वारा विकार एवं अहंकार के निर्मूलन हेतु अधिक से अधिक प्रयास करवा लिए । साधकों द्वारा विकारों द्वारा प्राप्त किया हुआ नियंत्रण तथा उसके लिए उठाए गए परिश्रम को गुरुरूप में आशीर्वाद देकर ऐसे कुछ साधकों में चैतन्यरूपी ऊर्जा प्रक्षेपित कर साधकों की माला में कुछ आदर्श साधक तैयार किए । ‘विकारों से भरे इस कलियुग में संयमित एवं विकार नियंत्रित सत्ययुग लाया जाता है’, यह जिन्होंने मानवजाति को सिखाया है, वे धर्ममार्तंड हैं सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा सर्वसामान्य मनुष्य को धर्म के सिद्धांत तथा उसके गहन सिद्धांत समझ में आएं, इसके लिए वैज्ञानिक परिभाषा में ग्रंथ लिखा जाना

पिछले २००० वर्ष में मनुष्य को धर्म के सिद्धांत तथा उसके गहन सिद्धांत केवल संस्कृत भाषा में ही उपलब्ध हुए; परंतु वर्तमान के वैज्ञानिक युग में सर्वसामान्य मनुष्य को संस्कृत की शिक्षा लेकर धर्म का ज्ञान प्राप्त करना असंभव था । पिछले २०० वर्षाें में विज्ञान का उपयोग बढा तथा मनुष्य को विज्ञान की भाषा अच्छी लगने लगी । ‘औसत, विषयों के अनुसार वर्गीकरण, वैज्ञानिक परीक्षण, अनुभव तथा अनुभूति लेनेवालों का प्रत्यक्ष प्रमाण’ इत्यादि मनुष्य को अच्छा लगने लगा । सनातन धर्म के सिद्धांत तथा ज्ञान को सरल न बनाकर मनुष्य की समझ में आए, इस प्रकार की परिभाषा में लेखन करने के लिए बहुत बडे धैर्य की आवश्यकता होती है । ‘धर्म, वर्णाश्रमव्यवस्था, अध्यात्म, साधनामार्ग, धर्माचरण, त्योहार, उत्सव, व्रत, मंदिर’ इत्यादि विषयों का वर्गीकरण, पुनर्लेखन तथा प्रस्तुतीकरण कर नए ग्रंथों की रचना करने हेतु धर्मनारायण के एक रूप की ही आवश्यकता होती है । ऐसा कार्य करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने अब तक ३६६ ग्रंथों का संकलन किया है तथा विभिन्न १३ भाषाओं में छापे गए १ करोड से अधिक ग्रंथों का पूरे विश्व में वितरण किया गया है ।

धर्मग्रंथों के अध्येता पंडित, आचार्य, स्थापित मठों के मठाधिपति, विश्लेषक, वेदाध्ययन करनेवाले वेदमूर्ति आदि सभी के विचारों में विरोधाभास उत्पन्न किए बिना ‘धर्मशास्त्र उजागर कर धर्मकार्य के लिए पूरक लेखन करना’ गुरुदेव प.पू. डॉ. आठवलेजी की विशेषता है ।

विरोध की चिंता किए बिना सूक्ष्म की अनिष्ट शक्तियोें का अस्तित्व तथा उनके मनुष्य पर होनेवाले प्रभाव को निर्भयता से विश्व के सामने लानेवाले ‘धर्ममूर्ति सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी’ !

हिन्दू समाज तथा हिन्दुओं के धर्मगुरुओं में देवताओं के प्रति निकटता है । हिन्दुओं के मन में देवताओं के प्रति श्रद्धा एवं सम्मान है । देवताओं का अस्तित्व है तथा मनुष्य को उनसे विभिन्न प्रकार के लाभ होते हैं । पिछली अनेक शताब्दियों से इस विषय में विचारमंथन चल रहा है; परंतु देवताओं की भांति बलवान तथा धर्म का विरोध करनेवाली अनिष्ट शक्तियां भी सूक्ष्म रूप से इस विश्व में कार्य करते हैं । उनका अस्तित्व मनुष्य जीवन के प्रत्येक अंग पर प्रभाव डालता है । हिन्दू समाज इस विषय पर मंथन करने अथवा उसकी सामान्य चर्चा करने के लिए भी तैयार नहीं था । ऐसे समय में भारत के पश्चिम की ओर एक धर्मसूर्य का उदय हुआ । उस धर्मसूर्य का नाम था सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी !

वर्तमान कलियुग में ‘जैसे देवता सूक्ष्म रूप में हैं, वैसे अनिष्ट शक्तियां भी सूक्ष्म रूप में हैं’, यह विश्व को दिखा देनेवाले वे एकमात्र हैं । गुरुदेवजी ने अनिष्ट शक्तियों को पाताल से बाहर निकलने पर विवश कर, उनके विभिन्न रूप वे विश्व के सामने ले आए । ‘अनिष्ट शक्तियां कार्य कैसे करती हैं ? मनुष्य के मन एवं बुद्धि पर किस प्रकार आक्रमण करते हैं ?’, यह गुरुदेवजी ने दिखा दिया । आरंभ में धर्म के कुछ जानकार, समाज के व्यक्ति तथा साधकों के परिजनों ने इसका विरोध किया; परंतु इस विरोध की चिंता किए बिना गुरुदेवजी ने अनेक वर्षाें तक अविरत यह कार्य किया । केवल ‘देवता’, इस विषय को स्वीकार करना; परंतु ‘अनिष्ट शक्ति’ इस अंग को ध्यान में न लेने का अर्थ है, ‘धर्म का केवल एक ही अंग जान लेना !’ यह अप्रिय सत्य हिन्दुओं को बताना तथा उसके प्रमाण देने की क्षमता रखना’, ऐसा अवतारी कार्य किसी ने किया है, तो वे हैं सच्चिदानंद परब्रह्म
डॉ. आठवलेजी !

जो साधकों के लिए हलाहल प्राशन कर सकते हैं, वे निश्चित ही ईश्वर के अंश होने चाहिए । वे हम सभी जैसे सामान्य मनुष्य तो हैं ही नहीं ! कलियुग में ‘माया’ नाम के पर्दे के पीछे छिपा यह ईश्वरीय अभिनेता प्रशंसा एवं कीर्ति की अपेक्षा किए बिना सनातन धर्मसंस्थापना का लक्ष्य सामने रखकर अग्रसर मनुष्य रूप में नारायण है । ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना’ ही उनका लक्ष्य है । उनका जन्म श्रीविष्णु की मकर राशि में हुआ है, जो भारत के पश्चिम में अवतरित हुए हैं, जिन्होंने मनुष्य रूप में साधकों की विशाल सेना तैयार की है तथा जो वैकुंठ के श्रीमन्नारायण के पृथ्वी पर विद्यमान साक्षात मूर्ति हैं, वे ही हैं सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी !

श्री. विनायक शानभाग (आध्यात्मिक स्तर ६८ प्रतिशत, आयु ४२ वर्षे), कांचीपुरम्, तमिलनाडू. (१९.३.२०२५)

  • सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।
  • बुरी शक्ति : वातावरण में अच्छी तथा बुरी (अनिष्ट) शक्तियां कार्यरत रहती हैं । अच्छे कार्य में अच्छी शक्तियां मानव की सहायता करती हैं, जबकि अनिष्ट शक्तियां मानव को कष्ट देती हैं । प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के यज्ञों में राक्षसों ने विघ्न डाले, ऐसी अनेक कथाएं वेद-पुराणों में हैं । ‘अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर अनिष्ट शक्तियां, उदा. असुर, राक्षस, पिशाच को प्रतिबंधित करने हेतु मंत्र दिए हैं ।’ अनिष्ट शक्तियों से हो रही पीडा के निवारणार्थ विविध आध्यात्मिक उपचार वेदादि धर्मग्रंथों में वर्णित हैं ।