‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है’, इसकी १८ वर्ष उपरांत हुई प्रतीति !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी

१. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की कृपा से ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ का आयोजन निर्विघ्न रूप से संपन्न होना

१७ से १९ मई २०२५ की अवधि में फोंडा, गोवा में सनातन संस्था की ओर से ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ का आयोजन किया गया था । इस महोत्सव में २५ सहस्र से अधिक साधक एवं धर्मप्रेमी उपस्थित थे । सनातन ने पहली बार ही इतने बडे स्तर पर तथा निरंतर ३ दिन के ऐसे निवासी कार्यक्रम का आयोजन किया था । सनातन संस्था की ओर से महोत्सव में उपस्थित सभी के निवास की, भोजन की, साथ ही आने-जाने की व्यवस्था की गई थी । केवल सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की कृपा से ही इतने बडे स्तर पर संपूर्ण आयोजन निर्विघ्न रूप से संपन्न हुआ ।

सद्गुरु राजेंद्र शिंदेजी

२. वर्ष २००७ में मुंबई में आयोजित हिन्दू धर्मजागृति सभा में आईं समस्याएं बताने पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी द्वारा ‘उतने ही पैर पसारिए, जितनी चादर हो’, ऐसा बताकर आश्वस्त किया जाना

महोत्सव के खर्चे की दृष्टि से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी ने वर्ष २००७ में जो एक सूत्र बताया था, उसका मुझे स्मरण हुआ । वर्ष २००७ में मुंबई में पहली बार ही हिन्दू धर्मजागृति सभा का आयोजन किया गया था । सभा के नियोजन के खर्चे का विवरण निकालने पर ‘इस सभा के लिए कुछ लाख रुपए का खर्चा होगा’, यह मेरे ध्यान में आया । साथ ही सभा के लिए बडी संख्या में साधकों की भी आवश्यकता थी; परंतु साधकों के पास उस प्रकार का नियोजन कौशल नहीं था । इस विषय में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी से हमने पूछा, ‘‘इस सभा के लिए बहुत खर्चा होगा, साथ ही साधकों को भी ऐसे आयोजन का कोई पूर्वानुभव नहीं है, तो अब क्या किया जाए ?’’ उस पर उन्होंने कहा, ‘‘एक कहावत है, ‘उतने ही पैर पसारिए, जितनी चादर हो !’; परंतु आप वैसे विचार मत कीजिए । आपको पैर पसारने के लिए जितनी चादर की आवश्यकता है, उतनी चादर ईश्वर उपलब्ध कराएंगे; इसलिए आप चिंता मत कीजिए ।’’ उस सभा के उपरांत जितनी भी सभाएं हुईं, उनमें मुझे इसकी अनुभूति हुई ।

३. सभी हिन्दू धर्मजागृति सभाएं निर्विघ्न रूप से संपन्न होना

हिन्दू धर्मजागृति सभाओं के लिए धन का कभी भी अभाव नहीं हुआ । समाज से आवश्यक अर्पण मिलता था । जिस समय सेवा के लिए साधकसंख्या अल्प थी, तब उत्तर एवं दक्षिण भारत के साधकों के संबंधी, साथ ही धर्मप्रेमी सहायता करते थे । उससे सभी सभाएं निर्विघ्न रूप से संपन्न हुईं ।

४. समाज से स्वप्रेरणा से मिलनेवाला अर्पण तथा कुशलता से दायित्व का निर्वहन करनेवाले साधकों के कारण शंखनाद महोत्सव भी सहजता से संपन्न होना

हिन्दू धर्मजागृति सभाओं की तुलना में सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव के लिए बहुत बडे स्तर पर आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी; परंतु ईश्वर की कृपा से समाज में स्वप्रेरणा से अर्पण मिला । साधकों द्वारा भी अनेक दायित्वों का कुशलतापूर्ण निर्वहन करने से इतना बडा कार्यक्रम सहजता से संभव हुआ । उक्त उदाहरण से ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने वर्ष २००७ में जो वाक्य कहा था, वह ब्रह्मवाक्य ही था’, यह ध्यान में आया ।

– सद्गुरु राजेंद्र शिंदे, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल. (२७.५.२०२५)