‘जैसे-जैसे व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर बढता है, वैसे-वैसे उसके स्पंदनों में परिवर्तन होता है । यह परिवर्तन उसका आध्यात्मिक स्तर बढने के साथ-साथ उसके पंचतत्त्वों में होनेवाले परिवर्तन के कारण होता है । इस विषय से संबंधित सारणी आगे दी है ।
१. व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर, उसमें मुख्य रूप से कार्यरत पंचतत्त्व एवं उसके देह से मुख्य रूप से प्रक्षेपित हो रहे सूक्ष्म स्पंदन
पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश इन पंचतत्त्वों के क्रम में आकाशतत्त्व सर्वाधिक उच्च, अर्थात सर्वाधिक निर्गुण स्तर का है । इसलिए जैसे-जैसे व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर बढता है, वैसे-वैसे उसकी यात्रा सगुण स्तर से निर्गुण स्तर की ओर होती है । इसका अर्थ है कि आध्यात्मिक स्तर बढने पर व्यक्ति का सूक्ष्म का कार्य बढता जाता है ।
२. व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर एवं प्रभावित होनेवाले सप्तपाताल तथा सप्तलोक
व्यक्ति का सूक्ष्म स्तरीय कार्य अर्थात उसके कार्य का सूक्ष्म लोकों तक होनेवाला प्रभाव ! आध्यात्मिक स्तर बढने पर व्यक्ति का कार्य केवल भूलोक तक संबंधित नहीं रहता, वह सप्तलोक तथा सप्तपाताल तक पहुंचता है । इसकी जानकारी आगे की सारणी में दी है ।

३. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का आध्यात्मिक स्तर और उनके सगुण-निर्गुण तत्त्व का किया गया अध्ययन
उपरोक्त सारणी से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के संदर्भ में निम्नलिखित सूत्र ध्यान में आते हैं ।
३ अ. वर्ष १९८७ – ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर : ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर अर्थात व्यक्ति की जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति ! इस आध्यात्मिक स्तर पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में शक्ति के स्पंदन सर्वाधिक मात्रा में हैं । इसलिए वे सर्वाधिक सगुण स्थिति में हैं । व्यक्ति द्वारा ६१ प्रतिशत स्तर प्राप्त करना, अर्थात उसके भीतर आध्यात्मिक भाव जागृत होना । तत्पश्चात उस व्यक्ति की आगे की आध्यात्मिक यात्रा में उसके आध्यात्मिक भाव में वृद्धि होने लगती है ।
३ आ. वर्ष १९९१ – ७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर : इस आध्यात्मिक स्तर पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ‘संत’ पद पर पहुंचे । ६१ प्रतिशत स्तर से ७० प्रतिशत स्तर की इस आध्यात्मिक यात्रा में व्यक्ति का आध्यात्मिक भाव बढता जाता है । यही सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के संदर्भ में ध्यान में आया । उस समय उनके शक्ति के स्पंदन अल्प हो गए । शक्ति की अपेक्षा आध्यात्मिक भाव के स्पंदन अधिक उच्च, अर्थात अधिक निर्गुण स्तर के होते हैं । इसलिए ७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में सगुण स्पंदन अल्प होकर उनके भीतर के निर्गुण स्पंदनों में वृद्धि हुई । ७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर व्यक्ति में चैतन्य की जागृति होती है ।
३ इ. वर्ष १९९९ – ८४ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर : ८० प्रतिशत स्तर पर ‘सद्गुरु’ पद प्राप्त होता है । व्यक्ति की ७० प्रतिशत से ८० प्रतिशत स्तर की इस आध्यात्मिक यात्रा में उसका चैतन्य बढता जाता है । इसलिए ८४ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में चैतन्य के स्पंदन सर्वोच्च हैं । इसी प्रकार ८० प्रतिशत स्तर से आगे की प्रगति में आनंद के स्पंदन बढने लगते हैं । इसलिए ८४ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में आनंद की मात्रा भी बढी है, साथ ही उनके भीतर शक्ति की मात्रा अत्यधिक अल्प हो गई है । चैतन्य और आनंद जैसे उच्च स्तर के स्पंदनों में वृद्धि होने से एवं शक्ति के स्पंदन अत्यधिक कम होने से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में निर्गुण तत्त्व की मात्रा और अधिक बढ गई है ।
३ ई. वर्ष २०१० – ९१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर : ९० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर ‘परात्पर गुरु’ पद प्राप्त होता है । ९१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में शक्ति की मात्रा और थोडी कम हो गई । इसलिए उनके भीतर निर्गुण तत्त्व की मात्रा और अधिक बढ गई ।
३ उ. वर्ष २०१६ – ९३ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर : ९० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के आगे व्यक्ति में शांति के स्पंदनों में वृद्धि होती है । इसलिए ९३ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में शांति की मात्रा थोडी बढी, साथ ही निर्गुण तत्त्व की मात्रा भी बढी ।
३ ऊ. वर्ष २०२२ – सच्चिदानंद परब्रह्म स्थिति : इस आध्यात्मिक स्थिति में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में शक्ति की मात्रा केवल ५ प्रतिशत है और देहधारण (शरीर को बनाए रखने) के लिए शक्ति की उतनी मात्रा आवश्यक होने के कारण वह उससे अल्प नहीं हो सकती । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की इस स्थिति में सगुण और निर्गुण तत्त्वों की मात्रा समान (५० प्रतिशत) है । इसलिए उनकी यह स्थिति ‘सगुण – निर्गुण में कोई भेद नहीं’, ऐसी है । वर्ष २०२१ में उनका आध्यात्मिक स्तर ९४ प्रतिशत होने पर भी उनके स्पंदन वर्ष २०२२ की ‘सच्चिदानंद परब्रह्म’ स्थिति के समान ही थे । इसका अर्थ है कि ‘अब उनके स्पंदनों की स्थिति अधिकतम है और इसके आगे उसमें परिवर्तन नहीं होगा’, ऐसा प्रतीत होता है ।
४. सारांश
जैसे-जैसे सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का आध्यात्मिक स्तर बढता गया, वैसे-वैसे उनके भीतर के पंचतत्त्वों में परिवर्तन होते गए । इस लेख के ‘सूत्र १’ की सारणी में दिए अनुसार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी में विशिष्ट पंचतत्त्व संबंधित आध्यात्मिक स्तर के अनुसार सर्वाधिक थे । उनके भीतर मुख्य पंचतत्त्व पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश, इन पंचतत्त्वों के क्रमानुसार बढते जाने से उनके भीतर का सगुण तत्त्व कम होता गया एवं निर्गुण तत्त्व बढता गया । अंततः ‘सच्चिदानंद परब्रह्म’ स्थिति में उनके भीतर सगुण एवं निर्गुण, दोनों तत्त्वों की मात्रा ५० प्रतिशत हो गई । इसलिए साधकों को सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के संदर्भ में ‘सगुण-निर्गुण में कोई भेद नहीं’ यह अनुभूति होती है । साथ ही उनकी इस स्थिति में उनका चल रहा सूक्ष्म का कार्य सभी सप्तलोक एवं सभी सप्तपाताल में व्याप्त है । उनके इसी सूक्ष्म स्तरीय व्यापक कार्य के कारण ही उनके द्वारा होनेवाला स्थूल का कार्य विश्वभर में फैल रहा है !
– (सद्गुरु) डॉ. मुकुल गाडगीळ (रसायनशास्त्र की पीएच.डी., मुंबई विद्यापीठ), महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (५.७.२०२५)




सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !