अधिवक्ता रामदास केसरकर द्वारा प.पू. डॉक्टरजी का द्रष्टापन अनुभव करना !

१. वर्ष १९९४ में द्रष्टा प.पू. डॉक्टरजी ने मुंबई के साधकों से ‘हमें एक वकील मिले हैं, जो आगे जाकर सनातन की न्यायालयीन लडाई लडेंगे’, ऐसा कहना

सत्संग संपन्न होने के उपरांत (१ ) श्री. बबन वाळूंज,  (२) श्री. दिलीप आठलेकर,  (३) अधिवक्ता रामदास केसरकर,  (४) श्री. रमेश शिंदे तथा उनके साथ घुलमिलकर प्रेमपूर्वक बातें करते प.पू. डॉक्टरजी (ठाणे २३.३.१९९९)

‘वर्ष १९९४ में प.पू. डॉक्टरजी का ठाणे में अभ्यासवर्ग संपन्न होने के उपरांत वर्ग में उपस्थित मुंबई के साधकों को उन्होंने बताया, ‘‘ठाणे के अभ्यासवर्ग का हमारा काम हुआ !’’उस दिन मैंने सफेद रंग का पजामा एवं कुर्ता पहना था । उस वेशभूषा का वर्णन कर उन्होंने कहा, ‘‘ठाणे में हमें एक वकील (अधिवक्ता) मिले हैं । आगे जाकर वे सनातन की न्यायालयीन लडाई लडेंगे !’’ मुंबई के उन साधकों में से एक श्री. शिवाजी वटकर (वर्तमान में पू. शिवाजी वटकरजी) ने एक वर्ष उपरांत मुझे यह प्रसंग बताया तथा आगे भी वैसा ही हुआ ! उस पहले अभ्यासवर्ग के उपरांत भले ही मैं घर वापस आया था, पर अपने द्रष्टापन के कारण प.पू. डॉक्टरजी ने उसी समय श्री. वटकर एवं अन्य साधकों के सामने मेरा उल्लेख किया था ।

अधिवक्ता रामदास केसरकर

२. ‘सनातन भारतीय संस्कृति संस्था’ की ओर से अक्टूबर २००० में न्यायालय में मानहानि का पहला दिवानी अभियोग तथा पहला आपराधिक अभियोग प्रविष्ट करने की सेवा मिलना तथा इसके माध्यम से न्यायालयीन सेवा पुनः आरंभ होकर इस सेवा का आनंद अनुभव होना

वर्ष १९९४ में प.पू. डॉक्टरजी की कृपा से मैंने साधना आरंभ की । उस समय मैं सत्संग लेना, प्रवचन लेना, साथ ही अभ्यासवर्ग लेना आदि जैसी प्रसार की सेवाएं करता था । वर्ष १९९९ में मैंने वकालत बंद की थी; इसलिए मेरा न्यायालय जाना पूर्ण रूप से बंद था । वर्ष २००० में सावंतवाडी के महान संत पू. भाऊ मसूरकरजी के अमृत महोत्सव का कार्यक्रम संपन्न हुआ । उसके उपलक्ष्य में बोलते हुए सिंधुदुर्ग जिले के तत्कालीन जिला प्रभारमंत्री हुसैन दलवाई ने प.पू. डॉक्टरजी द्वारा स्थापित ‘सनातन भारतीय संस्कृति संस्था’ की अपकीर्ति करनेवाले वक्तव्य किए । दै. लोकसत्ता, सकाळ, तरुण भारत जैसे अग्रणी समाचार-पत्रों ने उन वक्तव्यों को बडे स्तर पर प्रसिद्धि दी । उस संदर्भ में अक्टूबर २००० में ‘सनातन भारतीय संस्कृति संस्था’ की ओर से संबंधित समाचार-पत्रों के विरोध में न्यायालय में पहला मानहानि का दिवानी एवं आपराधिक अभियोग प्रविष्ट करने की सेवा मिली ।       तब से लेकर हिन्दूविरोधी तत्त्वों के विरुद्ध सनातन संस्था की न्यायालयीन लडाई आरंभ हुई, जो आज भी जारी है । उसके कारण सनातन संस्था की न्यायालयीन सेवा के लिए मैं अधिवक्ता के रूप में पुनः न्यायालय जाने लगा । ‘पहले व्यवसाय के रूप में मनचाहा शुल्क लेकर भी न्यायालयीन सेवा करते समय मुझे जो आनंद नहीं मिला, वह आनंद संस्था के लिए साधना के रूप में न्यायालयीन सेवा करते समय प्राप्त हुआ ।’

– अधिवक्ता रामदास केसरकर, सनातन संस्था के मानद कानूनी सलाहकार (६.१०.२०१७)

 

‘‘वीर बनो! वीर बनो!! मनुष्य तो केवल एक ही बार मरता है, मेरे शिष्यों को कभी कायर नहीं होना चाहिए। मुझे कायरता से अत्यंत घृणा है। घोर विपत्ति में भी अपने चित्त का संतुलन बनाए रखो। तुच्छ और बचकाने लोग तुम्हारे विरुद्ध क्या कहते हैं, इस ओर तनिक भी ध्यान मत दो।’’

– स्वामी विवेकानंद

 

इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक